Thursday, November 20, 2008

स्त्री की मानसिकता को बदलती वित्तीयपूंजी

सामंतवादी व्यवस्था में स्त्री को दासियों, वैश्याओं आदि विभिन्न रूपों में जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ता था। जहा-जहा सामंतवादी व्यवस्था लंबे समय तक रही है वहा-वहा स्त्री के स्थिति आज भी दयनीय हैं। इसका आकलन आज भी किया जा सकता है। पूंजीवादी व्यवस्था मे स्त्री की आजादी का नारा इतनी जोर से लगाया जाता है की उसके शोर में स्वयं स्त्री को पता ही नही चलता वह कब मुक्त नारी में तब्दील हो गयी। पूंजीवाद में स्त्री को स्वतंत्र असली है या नकली। आश्चर्य तो तब होता है जब वह स्वयं को इस मृगमरीचिका में कब और कैसे पहुचाया गया। इसका पता उसे नही चल पाया। यह काम इतने छदम रूप में किया गया हैं की स्वयं स्त्री को न मालूम हो सका की यह स्वतंत्रता असली है या नकली। आश्चर्य तो तब होता है जब वह स्वयं को इस मृगमरीचिका में प्रसन्न पाती हैं। घूंघट, साडी, बुरका जैसे परंपरागत परिधानों को पूंजीवाद ने स्त्री के गुलामी का प्रतीक और उसकी प्रगतिशीलता का विरोधी बताकर उसके मन को इतना बदल दया है कि वह इन्हे छोड़ने के लिए छटपटाने लगी है। यहाँ साड़ी, घूंघट और बुरका की बात से आशय यह नही है स्त्री को वापस आदिम युग में भेजने की वकालत की जा रही है। कम से वस्त्र धारण कर वह स्वतंत्र और आधुनिक नारी में परिवर्तित होने के लिए उत्कंठित दिखाई दे रही है। महाभारत की कहानी में द्रोपदी का चीर दुशासन खीचता है। दुशासन सामंतवादी व्यवस्था का उदाहरण है। जहा स्त्री को nagna देखने की लालसा में पुरूष छदम कृत्यों और बाहुबल का प्रयोग करता है।
पूंजीवाद समय में पुरूष की इस लालसा की पूर्ति वित्तीय पूंजी करने लगती हैं। और दुशासन का काम करने के लिए स्त्री को ही तैयार किया जाता हैं। उसे धन, यश और स्वतंत्र नारी की कल्पना की मिश्रित शराब इस हद तक पिलाई जाती है की इसके नशे में धुत्त होकर वह अपने ही हाथों से अपने वस्त्र उतरकर आजाद नारी के रूप में प्रकट होना चाहती है। इस नशे में वह देह के उस पार जा कर विदेह में बदलना चाहती है। जहा सांसारिक लोक लाज मानवीय सम्बन्ध का तकाजा सब बेमानी हो जाए। स्त्री के मानसिक स्टार को वितत्य पूँजी के सहारे इतना बदल दिया जाए की उसे सभी वर्जनाये नागपाश की तरह दस्ती नजर आने लगे । इनसे जितने जल्दी हो सके वह मुक्त होना चाहती है। महाभारत की कहानी में बेबस द्रोपदी की प्रार्थना सुनकर कृष्ण दौड़ते हैं और उसकी लज्जा की रक्षा करते हैं लेकिन आज जो स्त्री अपना chirharan ख़ुद ही कर रही हैं उसे न तो कृष्ण की जरूरत है और न ही इसके लिए उसे प्रारथना ही करनी है। यहाँ तो शरीर की रासलीला जारी है।
आज स्त्री की आजादी की बात पुरूष करता है और स्त्री पर अंकुश लगाने की बात भी पुरूष करता है। यहाँ यह जरूरी है की स्त्री की स्वाधीनता की पक्षधर संस्थाएँ यह जांच ले की जो लोग उसकी आजादी की बात कर रहे हैं उनके निहितार्थ क्या है? अंकुश लगाने वालों की बात तो स्पष्ट है पर इन लोगों से सावधान रहने की आवशयकता है जो मुक्ति के लिए अपनी छाती लहूलुहान किए हुए घूम रहे हैं। असल में यह लोग छदम कर्मों के द्वारा स्त्री के मानसिक स्पंदन को जीत कर अपनी स्वार्थ सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं। गाँधी ने नारी की आजादी की बात की थी। इस आजादी में उसके जीवन की गरिमा सुरक्षित थी। वहा उसके पूर्ण व्यक्तित्व को निर्मित करने के उपाय मौजूद थे। लेकिन स्त्री स्वाधीनता का यह गाँधीवादी फार्मूला प्रयोग में नही लाया गया क्योकि वहा नग्नता और विलासिता के लिए जगह मौजूद नही है। यह बात पूंजीवाद को मंजूर नही है। स्त्री की आजादी के लिए लगे हुए लोग किसी अर्ध विकसित नारी को मॉडल banaakar समाज में पेश करते हैं। इस हित साधने वाली चालाक कोशिश के पीछे का छिपा हुआ भाव यह है कि उसके बहाने औरों को भी प्रलोभित किया जा सके। मछुआरे मछली को फसाने के लिए बंसी में केचुए का मांस फसाते हैं। आज स्त्री की मासलता को स्त्री के विरुद्ध प्रयोग में लाया जा रहा है। ऐसा करने वालो की हिकमत की दाद देना पड़ेगी कि ये न तो उस स्त्री को पीड़ा, लज्जा, ग्लानी महसूस होने देते हैं जिसकी मासलता का प्रयोग वे दूसरी के विरुद्ध करते हैं और न ही उस स्त्री को जो उनके जाल में फंसती है। असल में वित्तीय पूँजी स्त्री की दृष्टियों की रौशनी इस तरह से हरती है कि उसे wahi दिखाई पड़ता है जो उसे निर्देशित किया जाता है। वित्तियापूंजी का यह प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र पर भी पड़ता है। स्त्री समाज की तड़प यह है कि वह उन्मुक्त/मौड़ स्मार्ट दिखना चाहती हैं। सदियों से दबी कुचली इस भावना के विरुद्ध उसका जोश समझ में आता है लेकिन स्त्री की आजादी के बहाने पूँजी बनाने वालों के लिए उसकी यह कमजोरी फायदे का सौदा बन गई। परिणाम यह हुआ कि वे कहने लगे ''तुम्हे हो जो बात पसंद वही कहेंगे।'' बस इसी भाव के सहारे स्त्री का दोहन शुरू हुआ। इस झूठी आजादी के झांसे में स्त्री फँसी हुई दिखाई पड़ रही हैं।
जिन मूल्यों के सहारे इन महान नारियों के व्यक्तित्त्व का निर्माण हुआ है और जो नारी जाती के स्वाभिमान के प्रतिक बन सकते हैं उन पर बात नहीं की जाती क्योंकि इनसे वित्तीय पूँजी का न तो पेट भरता है और न उसकी विलासितापूर्ण लालसा की पूर्ति हो पाती। पिछले दिनों एक स्त्री की प्रसूति को नेट के जरीए सीधा प्रसारण किया गया। जिसके लिए उसे एक मोटी रकम भी दी गई। आप विचार कर देखे तो पाएंगे कि पक्षियों और पशुओं की मादाएं भी एकांत में प्रसूति करती हैं। यहाँ तो सभ्य कहलाने वाला मनुष्य, स्त्री के इन अत्यन्त निजी क्षणों को पूंजी के बल पर अपनी लालसा की पूर्ति के लिए खरीद रहा हैं। उसका यह कृत्य निसंदेह पशु प्रवृति से भी निचे का है। यह पूंजी की ताकत है कि उसने स्त्री के निजी क्षणों को न केवल ख़रीदा बल्कि खरीदने से पहले उसमे यह निर्लज्ज भाव पैदा किया कि उसका यह कृत्य न केवल ख़रीदा बल्कि खरीदने से पहले उसमे यह निर्लज्ज भाव पैदा किया की उसका यह कृत्य न तो लज्जास्पद है और न ही nafarat के योग्य। आप विचार करे तो आप इस कृत्य में अनुसन्धान या शोध का कोई विचार नही पाएंगे। बल्कि यह निपट निर्लज्जता और न्यूनतम दर्जे की विलासिता का प्रतीक हैं। विचार योग्य यह भी है के क्या bena पूँजी के यह सब कुकृत्य सम्भव था।
सच तो यह है की जिसे आज स्त्री की आजादी का समय कहा जा सकता है, यह स्त्री की आजादी का समय नही है। यह उसकी नयी पराधीनता की नयी कारागार है जिसकी दीवारे पारदर्शी बताई तो जा रही हैं पर वे पारदर्शी नही हैं।

10 comments:

Shastri said...

-- शास्त्री

-- हर वैचारिक क्राति की नीव है लेखन, विचारों का आदानप्रदान, एवं सोचने के लिये प्रोत्साहन. हिन्दीजगत में एक सकारात्मक वैचारिक क्राति की जरूरत है.

महज 10 साल में हिन्दी चिट्ठे यह कार्य कर सकते हैं. अत: नियमित रूप से लिखते रहें, एवं टिपिया कर साथियों को प्रोत्साहित करते रहें. (सारथी: http://www.Sarathi.info)

Shastri said...

एक अनुरोध -- कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन का झंझट हटा दें. इससे आप जितना सोचते हैं उतना फायदा नहीं होता है, बल्कि समर्पित पाठकों/टिप्पणीकारों को अनावश्यक परेशानी होती है. हिन्दी के वरिष्ठ चिट्ठाकारों में कोई भी वर्ड वेरिफिकेशन का प्रयोग नहीं करता है, जो इस बात का सूचक है कि यह एक जरूरी बात नहीं है.

वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिये निम्न कार्य करें: ब्लागस्पाट के अंदर जाकर --

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बस हो गया काम !!

शोभा said...

ब्लाग जगत में आपका स्वागत है।

संगीता पुरी said...

आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है। आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी बडी प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त करेंगे। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

प्रदीप मानोरिया said...

ब्लॉग जगत मना आपका हार्दिक स्वागत है ... समय निकल कर मेरे ब्लॉग पर दस्तक दें

Amit K. Sagar said...

एक गंभीर लेख. स्वागत है आपका. जारी रहें.

Abhishek said...

गंभीर विषय को तार्किक ढंग से रखा है अपने, स्वागत ब्लॉग परिवार और मेरे ब्लॉग पर भी.

रचना गौड़ ’भारती’ said...

चिट्ठा जगत में आपका स्वागत है ।
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है ।
लिखते रहिए लिखने वाले की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल,शेर के लिए मेरे ब्लोग पर स्वागत है
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका भी देखें
www.zindagilive08.blogspot.com

dr.bhoopendra singh said...

swagat bandhu aapka is nutan jagat mey,hum sabhi ek hi panth ke rahi hai ,lakshya bhee wahi ,sneh , bandhutwa aur abhivyakti.
bahut accha ,chintanparak lekh aapka .
hardik swagat.kabhi geet,ghazal ka man ho to mujh se miliye
aapka
dr.bhoopendra

नारदमुनि said...

good. narayan narayan