Sunday, January 8, 2017


मित्रों ,यह वीणा का जनवरी २०१७ का अंक है। इसका कवर पृष्ट सुविख्यात चित्रकार और कहानीकार श्री प्रभु जोशी ने बनाया है। इसमें डॉ. कमल किशोर गोयनका, डॉ. विजय बहादुर सिंह, रमेश दवे, नर्मदा प्रसाद उपाध्याय, मनोज पांडेय, सूर्यकांत नगर, के आलेख तथा सूर्यवाला, मीनाक्षी स्वामी, प्रकाश कान्त की कहानियां तथा बुद्धिनाथ मिश्र के गीत सहित पठनीय सामग्री उपलब्ध है।
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मित्रो, यह "वीणा" पत्रिका का दिसम्बर 16 के अंक का कवर पेज है। "वीणा" के सम्पादन का भार आपके इस मित्र को सौंपा गया है। मेरे सम्पादन में यह पहला अंक है। आप सब को यह पता ही है कि "वीणा" हिंदी की अब तक प्रकाशित होने वाली सबसे पुरानी पत्रिका है। वीणा का प्रकाशन सन् 1927 से निरन्तर हो रहा है। आप के विचार और रचनाएँ सादर आमन्त्रित हैं।

Wednesday, May 14, 2014


    'समय के हस्ताक्षर

पुस्तक समीक्षा  -ओम द्विवेदी

परंपरानुसार आलोचक किसी कवि या कहानीकार पर बोलता, लिखता और मत व्यक्त करता रहा है। अपनी कसौटी पर कसकर उसे पुरस्कृत या दंडित करता रहा है। आलोचना के कई घराने किसी भी रचना को स्वीकृत या अस्वीकृत करने के फतवे जारी करते रहे हैं। यह भ्रम भी रहा है कि आलोचना की कसौटी पर कसकर ही कोई रचना कुंदन बनती है और फिर पाठकों के गले का हार। साहित्यिक परंपरा आलोचक को बहुत श्रेष्ठ मानती है। वह ज्ञान का बड़ा ख़ज़ाना है। इतना बड़ा कि उसके सामने रचनाकार अपने को बौना मानता है। आलोचक स्वयं को ज्ञान की इतनी ऊंचाई पर रखता है कि रचनाकार को तुच्छ समझता है। रचनाओं की शल्यक्रिया से रचनाकार घबराता है। हालांकि इस प्रक्रिया से गुज़रकर कई बार श्रेष्ठ रचनाएं बनती हैं तो कई बार रचनाकार अवसाद में चला जाता है और लिखना ही बंद कर देता है। केवल कवि या लेखक नहीं, बल्कि खुद आलोचक भी इसका शिकार होता है। ज़्यादातर आलोचक अपने लेखन की प्रारंभिक अवस्था में या तो कवि थे या कहानीकार, जैसे-जैसे उनके भीतर आलोचक बड़ा होता गया, कविता और कहानी की अकालमौत होती गई।
राकेश शर्मा आलोचकों की उस खलनायक वाली छवि से बिलकुल अलग हैं। उनका ज्ञान किसी दंड की तरह नहीं है, वह घात लगाए नहीं बैठा रहता कि कोई मिले और दे मारें उसके सिर पर। उनका ज्ञान मित्र की तरह रचनाकारों की मदद करता है, कबीर के कुम्हार की तरह भीतर हाथ रखकर बाहर आहिस्ता-आहिस्ता चोट करता है। अपना समूचा ज्ञान, हुनर घड़ा बनाने में समर्पित करता है। वे दूसरे आलोचकों से इसलिए भी अलग हैं क्योंकि उन्होंने लेखन की शुरुआत कविता से की और आज तक उसे बनाए रखे हुए हैं। वे लेखन की तमाम विधाओं को एक साथ साधे रहते हैं। कविता लिखते हैं तो आलोचक दूर खड़ा चौकीदारी करता है और जब आलोचना में लीन होते हैं तो कविता दूर खड़ी मुस्कुराती है। तलवार की धार पर चलते ही नहीं हैं, बल्कि दौड़ते हैं। इसीलिए दो संग्रह कविताओं के आते हैं तो दो निबंधों और आलोचनाओं के।
उनसे होने वाली बातचीत और बहसों के कारण ही यह किताब 'समय के हस्ताक्षर' मुझे किसी भी समय नई नहीं लगती। जो विषय बातचीत करते समय उनकी चिंता में रहते हैं, खाना खाते समय, चाय पीते समय या सफ़र करते समय वे जिन विषयों को समझते और समझाते रहते हैं, उन्हीं विषयों को वे अपने लेखन में शामिल करते हैं। जिन परंपराओं और मूल्यों को मानने का आग्रह वे लोक से करते हैं, उन्हें ही मानने के लिए वे पत्नी, बेटे, बेटी और खुद से भी करते हैं। इस तरह उनके जीवन और लेखन में पारदर्शिता भी है और विश्वसनीयता भी। जैसा कि किताब खुद मुनादी करती है कि इसके आलेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं, इसलिए भी पाठक जब अपनी स्मृतियों के दरवाज़े खटखटाएगा तो ये उसे पढ़े हुए और अपने से लगेंगे।
आलोचक की तरह नहीं, बल्कि एक पाठक की तरह पढ़ने पर यह किताब चार सर्गों में मेरे सामने खुलती है। ये चारों सर्ग, चारों अध्याय राकेश शर्मा की रुचियों के भी अध्याय हैं। 'समय के हस्ताक्षर' की सबसे बड़ी चिंता है भाषा, साहित्य और लिपि। किताब के 48 निबंधों में लगभग 14 निबंध इसी विषय के आसपास हैं। हमारे समय में साहित्य की स्थिति क्या है? साहित्य किस तरह समाज के हाशिए पर जा रहा है? देवनागरी लिपि पर किस तरह रोमन का तीखा आक्रमण हो रहा है? अंग्रेजी किस तरह हिन्दी पर हमले कर रही है? सत्ता किस तरह भाषा को आकार देती है? शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता का रिश्ता क्या है? लेखक, प्रकाशक और पाठक का क्या नाता है? इन तमाम विषयों पर बार-बार अलग-अलग सिरे को पकड़कर लिखते हैं और हमारी समझ साफ करते हैं -'आज का आदमी केवल साहित्य से ही नहीं कटा है, बल्कि समूचे संवेदना संसार से कट रहा है। वह अपनी निजी चिंताओं को लेकर अंतर्मुखी है। बहुजन हिताय की भावना संकुचित हुई है, जबकि साहित्य का केंद्र बिंदु ही बहुजन हिताय है। आज का मनुष्य संवेदना से इतना कट गया है कि कभी-कभी तो वह अपने आप से कटा हुआ दिशा भ्रमित है। यह परिवर्तन अनिवार्य रूप से ही है। यह धूल और धुंध भी छंटेगी और भौतिकता का भूत मनुष्य के सिर से उतरेगा। इस कठिन समय में साहित्कार को अपनी सच्ची साहित्यिक आस्था के साथ आशावान होकर डटे रहने की जरूरत है, लेकिन सच्चे साहित्यकार के पूरे संस्कार लेकर ही।' (साहित्य से दूर भागता समाज)

राकेश शर्मा नाम का लेखक कोई किताब लिखे और उसमे राम और रामविलास शर्मा न हों, ऐसा हो नहीं सकता। यहां भी दोनों अपनी गरिमा के साथ उपस्थित हैं। राम शर्माजी के आध्यात्मिक आराध्य हैं तो रामविलासजी साहित्यिक। आज भी हमारे उद्धारक हैं राम आलेख में वे कभी तो सीधे तौर राम को समाज का संकटमोचक मानते हैं तो कभी तुलसी, कबीर, गांधी और मैथिलीशरण गुप्त के माध्यम से वहां तक पहुंचते हैं। संग्रह के छह निबंध मेरे इस कथन की गवाही देंगे- 'आखिर राम की कथा में ऐसा क्या है जो इतने बड़े कालखंड को पार कर यह कथा आज भी हमारे जीवन को प्रेरणा देती है। राम की कथा में मानवीय जीवन के सभी पक्ष और एक आदर्श जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। एक शासक के रूप में राम को हमेशा कोड किया जाता है और आदर्श राज्य के रूप में रामराज्य की परिकल्पना की जाती है।' (राम ही हैं हमारे उद्धारक)  इसी तरह वे समय और समाज को रामविलासजी की दृष्टि से देखते हैं। उनकी नज़र से ऋग्वेद को देखते हैं, हिन्दी प्रदेश और आलोचना के सरोकारों को देखते हैं- 'डॉ. रामविलास शर्मा भारतीय समाज को एक समतामूलक समाज बनाने का सपना सहेजे थे। मार्क्सवाद की समतामूलक अवधारणाओं के सहारे वे इसे पूरा होते देख रहे थे और इसे पूरा करने के लिए वे जीवनभर जुटे रहे। अनेक स्थानों पर उन्होंने मार्क्स की स्थापनाओं से असहमतियां प्रकट कीं और यह स्थापना दी कि भारतीय संदर्भों में यह सब उचित मालूम नहीं पड़ता। उनके लिए मार्क्सवाद एक प्रकाश श्रोत की तरह था। हारिल की लकड़ी बनाकर उसे जकड़कर नहीं बैठे। (डॉ. रामविलास शर्मा के आलोचकीय सरोकार) ये उनकी किताब का दूसरा अध्याय है।
'समय के हस्ताक्षर' की तीसरी बड़ी चिंता है बाज़ार। बाज़ार का पैशाचिक स्वरूप जिस तरह से हमारी परंपराओं, संस्कृतियों और मूल्यों को निगल रहा है, उसे समझने में किताब मदद करती है। किताब का पहला ही निबंध है-स्त्री को बदलती चंचला पूंजी। पूंजीवाद ने स्त्री को किस तरह से स्त्री को उत्पाद में बदला है? वह परंपरागत शर्म और हया छोड़कर विज्ञापन की वस्तु बन गई है। तमाम स्त्रियों का आदर्श भी वह अपने इसी स्वरूप में बन रही है। मदर टेरेसा और लक्ष्मीबाई जैसे आदर्श पर्दे के पीछे जा रहे हैं, आलेख आत्मावलोकन के लिए बाध्य करता है। बाज़ार का यह आक्रमण केवल स्त्रियों पर नहीं है, बल्कि पुरुषों के उस सोच पर भी है जो केवल वहीं सोचना, देखना और पाना चाहता है। हमारी सनातन परंपराओं को बचाए रखने के लिए वे परंपराओं के वैज्ञानिक पक्ष और संस्कार की ज़रूरत आदि पर लिखते हैं- 'घूंघट, साड़ी, बुरका जैसे परंपरागत परिधानों को पूंजीवाद ने स्त्री की गुलामी का प्रतीक और उसकी प्रगतिशीलता का विरोधी बताकर उसके मन को इतना बदल दिया है कि वह इन्हें छोड़ने के लिए छटपटाने लगी है। यहां साड़ी, घूंघट और बुरका से आशय यह नहीं है कि स्त्री को वापस आदिम युग में भेजने की वकालत की जा रही है। कम से कम वस्त्र धारण कर वह स्वतंत्र और आधुनिक नारी में परिवर्तित होने के लिए उत्कंठित दिखाई दे रही है। महाभारत की कहानी में द्रोपदी का चीर दु:शासन खींचता है। दु:शासन सामंतवादी व्यवस्था का उदाहरण है। जहां स्त्री को नग्न देखने की लालसा में पुरुष छद्म कृत्यों और बाहुबल का प्रयोग करता है। पूंजीवाद में पुरुष की इस लालसा की पूर्ति पूंजी करने लगी है।' (स्त्री को बदलती चंचला पूंजी)

पुस्तक के चौथे सर्ग में राकेश शर्मा के वे तमाम सरोकार हैं, जो साहित्यकार और एक जागरूक नागरिक होने के नाते ज़रूरी हैं। साहित्यकार जब दो खेमों में बंटता है, तो वह दूसरे घाट पर बैठे साहित्यकार और पाठक की तरफ देखना भी नहीं चाहता। राकेशजी के यहां यह दुराग्रह नहीं है। वे अगर तुलसी, राम और रामविलास शर्मा पर झूमकर लिखते हैं तो मुक्तिबोध और शमशेर बहादुर सिंह पर भी उसी तन्मयता से लिखते और बोलते हैं। उनकी विचारधारा और उनके अवदान को सम्मान देते हुए ही वे उन्हें याद करते हैं। स्वदेशी, मार्क्सवाद, आंबेडकरवाद जैसी विचारधाराओं को भी वे समय की कसौटी पर कसते हैं। उनके लेखन में अगर भारत के अतीत की गौरवगाथा है तो वर्तमान में हवा और पानी में घुलते ज़हर की चिंता भी है।
कुल मिलाकर 'समय के हस्ताक्षर' समय पर हो रहे आक्रमण, भाषा और साहित्य, परंपराओं और मूल्यों को समझने में हमारी मदद करती है। हो सकता है यह कोई इंक़लाब न खड़ा करे, लेकिन इसे पढ़ते हुए पाठक के भीतर बदलाव की छटपटाहट ज़रूर महसूस होगी। यह कोई नया मार्ग भले न बनाए, नया पंथ न दे, लेकिन जब हम अपनी राह से भटकने लगेंगे तो हमे रोकेगी जरूर। कुपंथ पर जाने से बचाएगी। यह सयम की शल्यक्रिया है। समय का भाष्य है।

समय के हस्ताक्षर
लेखक-राकेश शर्मा
मूल्य-195 रुपए
प्रकाशक-रंग प्रकाशन, 33-बक्षी गली, राजबाड़ा इंदौर-452004


Wednesday, April 30, 2014

वर्तमान और अतीत के बीच पुल बनाती कविताएँ
राकेश शर्मा

जब कविता शौकिया और कवि जैसा दिखने के लिए लिखी जाती है तब उसकी तहसीर निरर्थक और निरुद्देश्य होती है। जब कोई कविता कवि की बेबसी और बेचैनी के कारण सृजित होती है तब वह पाठक के मन और प्राणों को स्पन्दित करती है। ब्रजेश कानूनगो के लिए कविता लिखना इसी बेबसी और बेचैनी का परिणाम मालूम पडता है। उनके हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह ‘इस गणराज्य में’ की कविताओं को पढते हुए सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कवि ने इन विचारों को यदि कागज पर न उतारा होता तो इनका बोझ कवि के मानस पर स्थायी रूप से प्रभाव जमा लेता। कवि ब्रजेश के लिए कविता जीवित बने रहने के लिए एक उपाय और जरूरी उपकरण की तरह प्रतीत होती है। कवि के अपने व्यक्तित्व की भरपूर परछाई इन कविताओं में नजर आती हैं। कोई भी रचना उसके रचनाकार के व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब होती है। कविताओं को पढते हुए यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि कवि ब्रजेश इस संसार को कैसे देखते हैं और उसके मौजूदा परिवेश में क्या परिवर्तन चाहते हैं।
कवि के मानस में बचपन और गुजरे समय  की मधुर यादें बहुत मजबूती के साथ चस्पा हैं। अतीत के खंडहरों में बैठा उनका कवि मन वहाँ जमी धूल और धुन्ध के बीच बीते समय की तस्वीरें देखता रहता है। हर दिन कवि एक अच्छी सुबह की प्रतीक्षा करता दिखाई देता है। कविता का जन्म कवि के मन में किसी भूकम्पीय हलचल की तरह होता है---

भूकम्प के बाद एक और भूकम्प आता है हमारे अन्दर/विश्वास की चटटाने बदलती हैं अपना स्थान/ खिसकने लगतीं हैं विचारों की आंतरिक प्लेंटें/ मन के महासागर में उमडती हैं संवेदनाओं की सुनामीं लहरें/ तब होता है जन्म कविता का।   (भूकम्प के बाद)

इन कविताओं में मौजूद स्मृतियाँ और अतीत कवि के लिए एक धरोहर है। वह अपने इतिहास से वर्तमान को बाँधे रखना चाहता है। ये कविताएँ वर्तमान और अतीत के बीच एक खूबसूरत सेतु बनाती हैं,जिस से गुजर कर पाठक यह जानने समझने में समर्थ होते हैं कि जिस समाज और समय से वे आज रूबरू हो रहे हैं उसका पुराना चेहरा कैसा हुआ करता था,देखिए इन पंक्तियों में –

धराशायी मकान की भस्म पर खडी हो गई है ऊंची इमारत/जिसकी ओट में छुप गया है नीला कैनवास/पतंग के रंगों से बनते थे जहाँ /स्मृतियों के अल्हड चित्र/ वैसा ही हो गया है मेरा मुहल्ला/जैसे कोई कहे कितना अलग है तुम्हारा छोटा बेटा।  (मेरा मुहल्ला)

यह कविता हर पाठक के साथ खडी दिखाई देती है। हम सब का अतीत इस तस्वीर में कैद है। कोई विकासवादी और व्यावहारिक व्यक्ति यह प्रश्न उठा सकता है कि खंडहरों  के बहुमंजिला ईमारतों में बदल जना तो विकास का प्रतीक है, शुभ संकेत है। लेकिन यहाँ कवि की चिंता उस विकास पर है जिसने हमारे मूल्यों और सामाजिक चेतना की बलि लेते हुए प्रगति का शंखनाद किया है। इस दृश्य से पाठकों को रूबरू कराना कवि का अभीष्ठ भी है।

जड और चेतन , मनुष्य और जीव जंतु, सभी के सामंजस्य से यह दुनिया कायम है। कविता ही यह ठिकाना है जहाँ जड चेतन का भेद समाप्त हो जाता है। जहाँ भावनाओं का मानवी करण सम्भव है ,जड में जान फूंकी जा सकती है। ब्रजेश की कविताओं में यह साकार हुआ है।

कांपते हैं जब सूरज के हाथ-पाँव/ कुहरे को भेदता हुआ/ठंडी हवा के साथ आता है मजा।
उड जाता है न जाने कहाँ/गुलाबी अनंत में चिडियों के साथ/छुप जाता है किसी बछडे की तरह/ घर लौटते रेवड में/ उडती हुई धूल के बीच दिखाई देती है/ मजे की झलक। 
(मजे के साथ)

आज जब मानवीय सम्बन्ध भी टूटने की कगार पर हैं ऐसे में यह संकल्पना कि जीव-जंतु भी हमारी जीवन यात्रा के सहयात्री हैं,बहुत सार्थक सन्देश है। मनुष्य के होने और बने रहने में प्रकृति,पेड-पौधों की अपनी भूमिका है। ब्रजेश की कविता इस बात को समझती है और समरसता का भाव-बोध कराती है। देखें-

जिस घर में रहता हूम/कैसे कहूँ कि अपना है।
चीटियाँ,कीट-पतंगे और छिपकलियाँ भी रहती हैं यहाँ बडे मजों से/
उधर कुछ चूहों ने बनाया है अपना बसेरा/ट्यूब लाइट की ओट में पल रहा है चिडियों का परिवार।  (कैसे कहूँ कि घर अपना है)

ब्रजेश की कविताओं का दायरा घर-परिवार से लेकर वैश्विक चिंताओं तक विस्तृत है। किसान के जीवन में सोयाबीन की फसल की भूमिका, ‘क्विज’ जैसे कार्यक्रमों से करोडों के पुरस्कारों के मोह में जीवन की सच्चाइयों पर पर्दा पडना , बेजुबान जानवर पर कविता ‘जिप्सी’ ,व्रत करती स्त्री, राष्ट्रीय शोक की औपचारिकता, घर-ग्रहस्थी की चिंताओं के साथ स्त्री का बाहर निकलना आदि विषयों पर मर्मस्पर्शी कविताएँ इस संकलन में हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं।
कवि के पास अपनी बात को पाठक तक पहुंचाने का कविता का एक सरल और सर्वग्राही मुहावरा है। भाषा बहुत सरल और सहज है। ये पंक्तियां देखिए-

मैं मिला नही तुमसे मदर टेरेसा/लेकिन जानता हूँ/ तुम्हारी साडी की किनारी में बहा करती थी/ मानवता की नदी।  (मदर टेरेसा)

यहाँ मदर टेरेसा की साडी की नीली किनारी को कवि ने नदी की बहती जलधारा में रूपायत किया है। मदर टेरेसा का जीवन ही नदी की तरह जीवन-धर्म पर बडा उपकार है। यह सन्देश कवि ने सहज ही पाठक तक पहुंचा दिया है।

कविता का काम महज नारेबाजी करना नही होता है। वह एक हथियार भी नही हो सकती,कविता एक सुई की तरह है जो फटे हुऎ हमारे स्मृति के केनवास को धीरे-धीरे सिलने का काम भी करती रहती है। जिससे बीत गया समय, धुन्धली हो चुकीं यादें फिर से साकार हो जाती हैं। कविताएँ इस सन्दर्भ में अपना यह कर्म करती दिखाई देती हैं। ‘रेडियो की स्मृति’, ‘सभागार’, जैसी कई कविताएँ अनायास हमारे अन्धेरे कोनों को प्रकाश से भर देतीं हैं। वहाँ के दृश्य पाठक के मन में बहुत मोहक रूप में उभरते हैं और असीम सुकून और आनन्द से भर देते हैं।

अनेक कविताएँ हमारे समय की विद्रूपताओं और दुखद सच्चाइयों पर व्यंग्य करती हैं। ‘इस गणराज्य में’,प्लास्टिक के पेड’, ‘ग्लोबल प्रोडक्ट’, ‘मनीप्लांट की छाया’, ‘लाल बारिश’ ‘रेल गाडी के वातानुकूलित डिब्बे में बैठे लोग’ आदि कविताएँ इसी श्रेणी में रखीं जा सकतीं हैं। कवि की विचारधारा से पाठक का आमना-सामना भी यहीं होता है। कविता का काम भी यही है कि वह पाठक के मानसरोवर की प्रशांत जल-राशि को धीरे से आन्दोलित कर दे जिससे ठहरे हुए जल में तरंगें पैदा हों और अपने समय को समझने के लिए कई चित्र उसमें बनें-बिगडें। ये कविताएँ हमारे विचारों को आन्दोलित करने का ये काम बखूबी करने का प्रयास करती हैं।  

पुस्तक-इस गणराज्य में।
मूल्य-रु.100/
कवि-ब्रजेश कानूनगो
प्रकाशक- दखल प्रकाशन
104,नवनीति सोसायटी
प्लॉट न.51,आई.पी.एक्सटेंशन
पटपडगंज
दिल्ली-110092

समीक्षक-
राकेश शर्मा
’मानस निलयम’
एम-2, वीणा नगर
इन्दौर-452011  

Tuesday, January 14, 2014

आज कल भाषा , साहित्य और समाज पर चिंताएं की जारही हैं।  शनिवार को उज्जैन के माधव कालेज के हिंदी विभाग द्वारा इसी विषय पर सेमिनार था।  एक  वक्ता के रूप मेंमुझे भी विचार प्रकट करने का अवसर मिला। ख्यात आलोचक डॉ विजय बहादुर सिंह की अध्यक्षता  थी।
   जनसता के रविवार १२ जनवरी के  अंक में श्री  अशोक  बाजपेई के लेख 'स्वतत्रता , लोकतंत्र और बहुसमयता' में भी इसी तरह की चिंताएं प्रकट की गयी हैं।
     इंदौर के रंग  प्रकाशन और शासकीय अहिल्या पुस्तकालय दुआरा ''हमारा समय और साहित्य '' विषय  १७ जनवरी को शाम ६.३० बजे आयोजन रखा गया है।  वक्ता  आलोचक डॉ विजय बहादुर सिंह होंगे।  विषय पर मुझे भी विचार करने है। इस समय हमारे लेखक जीती चिंताएं प्रकट कर रहे हैं उतनी ही चिंताएं अगर देशकी  संसद और विधान सभाएं करनें लगें और साथ ही अभिनेताओं जिनका, अनुकरण नई पीढ़ीबहुत ज्यादा करती है ,का भी सेहयोग मिल जायें तो  रंगत बदलते देर न लगेगी , 

Saturday, December 28, 2013

जबलपुर  में दिनांक २६व २७ दिसंबर १३ को पत्रकारिता पर केंद्रित एक राष्ट्रीय संगोष्टी थी।  इस संगोष्टी का केन्द्रीय विषय ;स्वातंत्रोत्तर जबलपुर के पत्रकारों का साहित्य और समाज में योग दान ; था।  वक्ताओं कि  चिताएं समाचार पत्रों में हिंदी शब्दों की जगह अंगरेजी शब्दों के बढ़ते प्रयोग , समाचार पत्रों में साहित्य के पन्नो का गायब होना  और भाषा के घटते मानक प्रयोग को लेकर थीं। मैं भी दो दिन इस  में शामिल था।  मुझे लगता है कि हमारे साहित्य्कार बंधु स्वतंत्रता  संग्राम के साहित्य्कारों की भाति  सब चाहते हैं।  उस समय के रचनाकारों जैसी प्रतिबधिताएँ  आज नही ही हैं।  उस समय के लेखक  आंदोलन के हिस्से होते थे साथ ही पत्रकार और रचनाकार भी थे।  इसलिए उनकी समाज में उपस्थिती कई रूपों में आदरणीय थी , युग की जरूरतें भी कुछ और थीं राष्ट्रीय स्व्प्न अलग था। आज  रिक्तता  है ,समाज अपने युग के अनकूल मानक तय करता है।  एक पुजारी यदि  यह चाहे के वह एक ऋषी को भाँती समादृत हो तो यह बात विचार करने जैसी है।  समाचारपत्रों  में  साहित्य के पन्ने होने चाहिए यह बिलकुल उचित बात है।  अर्ध नग्न चित्रों के बजाय संस्कार संपन्न और विचार संपन्न सामग्री तो पत्रों में होनी ही चाहिए।  आज भी जनसत्ता समाचारपत्र  में साहित्य और भाषा के लिए भरपूर जगह है।  हिन्दी का हर लेखक वहाँ छप रहा है
         जब तक लेखक , पत्रकार और नेता एक ही व्य्क्ति होता था तब तक इन में संतुलन बना रहा जैसे  जैसे  नेता नाम की संस्था बलवती होती गई  उसके और लिखक के बीच की खाई बढ़ती गई है।  मंच के विदूषक कवियों ने नेताओं के साथ मजाकिया रुख  अपनाया।  वे यह भूल गए की प्रजातंत्र में नेता शक्तिशाली संस्था है।  जब तक  नेता ,साहित्य्कार और पत्रकार तीनों मिल कर एक दिशा में साहित्य और भाषा के बारे में योजनापूर्वक विचार नहीं करेंगे तब तक संतुलन पैदा होगा इस पर मुझे संदेह है।  आज नेता और पत्रकार के बीच कुछ समन्वय है भी परन्तु साहित्य्कार और नेता के बीच के रिस्ते मधुर नही हैं  . आजदी के  बाद इंद्रा गांधी तक  साहित्य्कार से संवाद था।  पर आज यह संवाद बंद  है परिणाम  सवरूप भाषागत चिंताओं पर भाषण तो हैं पर समाधान    नहीं   हैं।  जानकीरमण महा विद्यालय के प्रधानाचार और मेरे मित्र  भाई अभिजात कृशन त्रिपाठी इस हेतु बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इस विषय पर चिंतन का अवसर उपलब्ध करवाया 

Thursday, April 19, 2012

भागवत भूमि यात्रा पर विमर्श

पुस्तक चर्चा में भाग लेते लेखक 

पुस्तक चर्चा में भाग लेते लेखक 

पुस्तक चर्चा प्रसंग  

हिंदी के कालजयी रचनाकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय ने दो ऐतिहासिक यात्राएं संपन्न करवाई थीं. पहली यारा " जानकी" थी. दूसरी यात्रा "भागवत भूमि यात्रा" थी. अज्ञेय ने अकेले ही जिन  यात्राओं  को पूरा किया था उनके नाम हैं "अरे यायावर रहेगा याद" और "एक बूँद सहसा उछली". भागवत भूमि यात्रा में अज्ञेय के साथ हिंदी के ग्यारह बड़े रचनाकार सहयात्री थे - मानिकलाल चतुर्वेद, विद्यानिवास मिश्र, भगवतीशरण सिंह] मुकुंद लाठ, रमेश चन्द्र  शाह, इला डालमिया, विष्णु कान्त शास्त्री, नरेश मेहता,  रघुवीर चोधरी, जडावलाल मेहता. अभी हाल ही में इस यात्रा का विस्तृत विवरण ख्यात आलोचक डॉ. कृष्ण दत्त  पालीवाल ने "भागवत भूमि यात्रा" पुस्तक में संपादित किया है. इंदौर में इस पुस्तक पर चर्चा  आयोजित  हुई. इस पुस्तक चर्चा में शहर के अनेक रचनाकाओं  ने भाग लिया -  चैतन्य त्रिवेदी, डॉ. जवाहर चौधरी , चन्द्रभान भारद्वाज,विकास  दवे, हरेराम  वाजपयी, रामचंद्र सौचे, नंदकिशोर वर्वे, रामचंद्र अवस्थी, गिरेन्द्र  सिंह भदौरिया , अरविन्द  जावलेकर, सुधीन्द्र  कमलापुर, मोहन रावल, श्रीमती नियति सप्रे, सुख देव  सिंह  कश्यप, वसंत सिंह जोहरी, नारायण प्रसाद शुक्ला, इसहाक असर और  श्याम दांगी.रचनाकारों नें माना कि यात्राएं लेखन  कर्म को गहराई देती हैं .जन और जीवन की समझ यात्राओं सी पैदा होती है . भक्ति काल के सभी कवि निरंतर यात्रों पर रहते थे परिणाम स्वरुप  उनकी रचनाओं में मानव ही नहीं बल्कि पूरी कायनात का दुःख- सुख बोलता है .और इसी लिए आज भी वे सब पूरी तरह प्रासंगिक हैं . शायद अज्ञेय भी रहनाकारों को इसी उदेश्य से देश के विभिन्न प्रान्तों की यात्रा करवाना चाहते थे . पुस्तक चचा में भाग लेते हुए सभी ने माना के इस पुस्तक का सम्पादन कर डॉ क्रष्ण दत्त पालीवाल ने हिन्दी साहित्य को अमर क्रति दी है . वास्तव में अनेक सन्दर्भ इस पुस्तक में मौजूद हैं . युगों - युगों की गाथा समझनें के लिए यह पुस्तक हमारी बहुत मदद करती है .