Wednesday, May 14, 2014


    'समय के हस्ताक्षर

पुस्तक समीक्षा  -ओम द्विवेदी

परंपरानुसार आलोचक किसी कवि या कहानीकार पर बोलता, लिखता और मत व्यक्त करता रहा है। अपनी कसौटी पर कसकर उसे पुरस्कृत या दंडित करता रहा है। आलोचना के कई घराने किसी भी रचना को स्वीकृत या अस्वीकृत करने के फतवे जारी करते रहे हैं। यह भ्रम भी रहा है कि आलोचना की कसौटी पर कसकर ही कोई रचना कुंदन बनती है और फिर पाठकों के गले का हार। साहित्यिक परंपरा आलोचक को बहुत श्रेष्ठ मानती है। वह ज्ञान का बड़ा ख़ज़ाना है। इतना बड़ा कि उसके सामने रचनाकार अपने को बौना मानता है। आलोचक स्वयं को ज्ञान की इतनी ऊंचाई पर रखता है कि रचनाकार को तुच्छ समझता है। रचनाओं की शल्यक्रिया से रचनाकार घबराता है। हालांकि इस प्रक्रिया से गुज़रकर कई बार श्रेष्ठ रचनाएं बनती हैं तो कई बार रचनाकार अवसाद में चला जाता है और लिखना ही बंद कर देता है। केवल कवि या लेखक नहीं, बल्कि खुद आलोचक भी इसका शिकार होता है। ज़्यादातर आलोचक अपने लेखन की प्रारंभिक अवस्था में या तो कवि थे या कहानीकार, जैसे-जैसे उनके भीतर आलोचक बड़ा होता गया, कविता और कहानी की अकालमौत होती गई।
राकेश शर्मा आलोचकों की उस खलनायक वाली छवि से बिलकुल अलग हैं। उनका ज्ञान किसी दंड की तरह नहीं है, वह घात लगाए नहीं बैठा रहता कि कोई मिले और दे मारें उसके सिर पर। उनका ज्ञान मित्र की तरह रचनाकारों की मदद करता है, कबीर के कुम्हार की तरह भीतर हाथ रखकर बाहर आहिस्ता-आहिस्ता चोट करता है। अपना समूचा ज्ञान, हुनर घड़ा बनाने में समर्पित करता है। वे दूसरे आलोचकों से इसलिए भी अलग हैं क्योंकि उन्होंने लेखन की शुरुआत कविता से की और आज तक उसे बनाए रखे हुए हैं। वे लेखन की तमाम विधाओं को एक साथ साधे रहते हैं। कविता लिखते हैं तो आलोचक दूर खड़ा चौकीदारी करता है और जब आलोचना में लीन होते हैं तो कविता दूर खड़ी मुस्कुराती है। तलवार की धार पर चलते ही नहीं हैं, बल्कि दौड़ते हैं। इसीलिए दो संग्रह कविताओं के आते हैं तो दो निबंधों और आलोचनाओं के।
उनसे होने वाली बातचीत और बहसों के कारण ही यह किताब 'समय के हस्ताक्षर' मुझे किसी भी समय नई नहीं लगती। जो विषय बातचीत करते समय उनकी चिंता में रहते हैं, खाना खाते समय, चाय पीते समय या सफ़र करते समय वे जिन विषयों को समझते और समझाते रहते हैं, उन्हीं विषयों को वे अपने लेखन में शामिल करते हैं। जिन परंपराओं और मूल्यों को मानने का आग्रह वे लोक से करते हैं, उन्हें ही मानने के लिए वे पत्नी, बेटे, बेटी और खुद से भी करते हैं। इस तरह उनके जीवन और लेखन में पारदर्शिता भी है और विश्वसनीयता भी। जैसा कि किताब खुद मुनादी करती है कि इसके आलेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं, इसलिए भी पाठक जब अपनी स्मृतियों के दरवाज़े खटखटाएगा तो ये उसे पढ़े हुए और अपने से लगेंगे।
आलोचक की तरह नहीं, बल्कि एक पाठक की तरह पढ़ने पर यह किताब चार सर्गों में मेरे सामने खुलती है। ये चारों सर्ग, चारों अध्याय राकेश शर्मा की रुचियों के भी अध्याय हैं। 'समय के हस्ताक्षर' की सबसे बड़ी चिंता है भाषा, साहित्य और लिपि। किताब के 48 निबंधों में लगभग 14 निबंध इसी विषय के आसपास हैं। हमारे समय में साहित्य की स्थिति क्या है? साहित्य किस तरह समाज के हाशिए पर जा रहा है? देवनागरी लिपि पर किस तरह रोमन का तीखा आक्रमण हो रहा है? अंग्रेजी किस तरह हिन्दी पर हमले कर रही है? सत्ता किस तरह भाषा को आकार देती है? शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता का रिश्ता क्या है? लेखक, प्रकाशक और पाठक का क्या नाता है? इन तमाम विषयों पर बार-बार अलग-अलग सिरे को पकड़कर लिखते हैं और हमारी समझ साफ करते हैं -'आज का आदमी केवल साहित्य से ही नहीं कटा है, बल्कि समूचे संवेदना संसार से कट रहा है। वह अपनी निजी चिंताओं को लेकर अंतर्मुखी है। बहुजन हिताय की भावना संकुचित हुई है, जबकि साहित्य का केंद्र बिंदु ही बहुजन हिताय है। आज का मनुष्य संवेदना से इतना कट गया है कि कभी-कभी तो वह अपने आप से कटा हुआ दिशा भ्रमित है। यह परिवर्तन अनिवार्य रूप से ही है। यह धूल और धुंध भी छंटेगी और भौतिकता का भूत मनुष्य के सिर से उतरेगा। इस कठिन समय में साहित्कार को अपनी सच्ची साहित्यिक आस्था के साथ आशावान होकर डटे रहने की जरूरत है, लेकिन सच्चे साहित्यकार के पूरे संस्कार लेकर ही।' (साहित्य से दूर भागता समाज)

राकेश शर्मा नाम का लेखक कोई किताब लिखे और उसमे राम और रामविलास शर्मा न हों, ऐसा हो नहीं सकता। यहां भी दोनों अपनी गरिमा के साथ उपस्थित हैं। राम शर्माजी के आध्यात्मिक आराध्य हैं तो रामविलासजी साहित्यिक। आज भी हमारे उद्धारक हैं राम आलेख में वे कभी तो सीधे तौर राम को समाज का संकटमोचक मानते हैं तो कभी तुलसी, कबीर, गांधी और मैथिलीशरण गुप्त के माध्यम से वहां तक पहुंचते हैं। संग्रह के छह निबंध मेरे इस कथन की गवाही देंगे- 'आखिर राम की कथा में ऐसा क्या है जो इतने बड़े कालखंड को पार कर यह कथा आज भी हमारे जीवन को प्रेरणा देती है। राम की कथा में मानवीय जीवन के सभी पक्ष और एक आदर्श जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। एक शासक के रूप में राम को हमेशा कोड किया जाता है और आदर्श राज्य के रूप में रामराज्य की परिकल्पना की जाती है।' (राम ही हैं हमारे उद्धारक)  इसी तरह वे समय और समाज को रामविलासजी की दृष्टि से देखते हैं। उनकी नज़र से ऋग्वेद को देखते हैं, हिन्दी प्रदेश और आलोचना के सरोकारों को देखते हैं- 'डॉ. रामविलास शर्मा भारतीय समाज को एक समतामूलक समाज बनाने का सपना सहेजे थे। मार्क्सवाद की समतामूलक अवधारणाओं के सहारे वे इसे पूरा होते देख रहे थे और इसे पूरा करने के लिए वे जीवनभर जुटे रहे। अनेक स्थानों पर उन्होंने मार्क्स की स्थापनाओं से असहमतियां प्रकट कीं और यह स्थापना दी कि भारतीय संदर्भों में यह सब उचित मालूम नहीं पड़ता। उनके लिए मार्क्सवाद एक प्रकाश श्रोत की तरह था। हारिल की लकड़ी बनाकर उसे जकड़कर नहीं बैठे। (डॉ. रामविलास शर्मा के आलोचकीय सरोकार) ये उनकी किताब का दूसरा अध्याय है।
'समय के हस्ताक्षर' की तीसरी बड़ी चिंता है बाज़ार। बाज़ार का पैशाचिक स्वरूप जिस तरह से हमारी परंपराओं, संस्कृतियों और मूल्यों को निगल रहा है, उसे समझने में किताब मदद करती है। किताब का पहला ही निबंध है-स्त्री को बदलती चंचला पूंजी। पूंजीवाद ने स्त्री को किस तरह से स्त्री को उत्पाद में बदला है? वह परंपरागत शर्म और हया छोड़कर विज्ञापन की वस्तु बन गई है। तमाम स्त्रियों का आदर्श भी वह अपने इसी स्वरूप में बन रही है। मदर टेरेसा और लक्ष्मीबाई जैसे आदर्श पर्दे के पीछे जा रहे हैं, आलेख आत्मावलोकन के लिए बाध्य करता है। बाज़ार का यह आक्रमण केवल स्त्रियों पर नहीं है, बल्कि पुरुषों के उस सोच पर भी है जो केवल वहीं सोचना, देखना और पाना चाहता है। हमारी सनातन परंपराओं को बचाए रखने के लिए वे परंपराओं के वैज्ञानिक पक्ष और संस्कार की ज़रूरत आदि पर लिखते हैं- 'घूंघट, साड़ी, बुरका जैसे परंपरागत परिधानों को पूंजीवाद ने स्त्री की गुलामी का प्रतीक और उसकी प्रगतिशीलता का विरोधी बताकर उसके मन को इतना बदल दिया है कि वह इन्हें छोड़ने के लिए छटपटाने लगी है। यहां साड़ी, घूंघट और बुरका से आशय यह नहीं है कि स्त्री को वापस आदिम युग में भेजने की वकालत की जा रही है। कम से कम वस्त्र धारण कर वह स्वतंत्र और आधुनिक नारी में परिवर्तित होने के लिए उत्कंठित दिखाई दे रही है। महाभारत की कहानी में द्रोपदी का चीर दु:शासन खींचता है। दु:शासन सामंतवादी व्यवस्था का उदाहरण है। जहां स्त्री को नग्न देखने की लालसा में पुरुष छद्म कृत्यों और बाहुबल का प्रयोग करता है। पूंजीवाद में पुरुष की इस लालसा की पूर्ति पूंजी करने लगी है।' (स्त्री को बदलती चंचला पूंजी)

पुस्तक के चौथे सर्ग में राकेश शर्मा के वे तमाम सरोकार हैं, जो साहित्यकार और एक जागरूक नागरिक होने के नाते ज़रूरी हैं। साहित्यकार जब दो खेमों में बंटता है, तो वह दूसरे घाट पर बैठे साहित्यकार और पाठक की तरफ देखना भी नहीं चाहता। राकेशजी के यहां यह दुराग्रह नहीं है। वे अगर तुलसी, राम और रामविलास शर्मा पर झूमकर लिखते हैं तो मुक्तिबोध और शमशेर बहादुर सिंह पर भी उसी तन्मयता से लिखते और बोलते हैं। उनकी विचारधारा और उनके अवदान को सम्मान देते हुए ही वे उन्हें याद करते हैं। स्वदेशी, मार्क्सवाद, आंबेडकरवाद जैसी विचारधाराओं को भी वे समय की कसौटी पर कसते हैं। उनके लेखन में अगर भारत के अतीत की गौरवगाथा है तो वर्तमान में हवा और पानी में घुलते ज़हर की चिंता भी है।
कुल मिलाकर 'समय के हस्ताक्षर' समय पर हो रहे आक्रमण, भाषा और साहित्य, परंपराओं और मूल्यों को समझने में हमारी मदद करती है। हो सकता है यह कोई इंक़लाब न खड़ा करे, लेकिन इसे पढ़ते हुए पाठक के भीतर बदलाव की छटपटाहट ज़रूर महसूस होगी। यह कोई नया मार्ग भले न बनाए, नया पंथ न दे, लेकिन जब हम अपनी राह से भटकने लगेंगे तो हमे रोकेगी जरूर। कुपंथ पर जाने से बचाएगी। यह सयम की शल्यक्रिया है। समय का भाष्य है।

समय के हस्ताक्षर
लेखक-राकेश शर्मा
मूल्य-195 रुपए
प्रकाशक-रंग प्रकाशन, 33-बक्षी गली, राजबाड़ा इंदौर-452004


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