शनिवार, 17 अप्रैल 2010

हिंदी और महात्मागांधी

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में गांधीजी का पदार्पण 1915 में हुआ। इससे पूर्व राष्ट् गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रयास कर चुका था। सन् 1857 की महान क्रांति के असफल हो जाने के बाद स्वतंत्रता संघर्ष अन्तर्मुखी हो चुका था। जनता अंग्रेजी राज्य से छुटकारा चाहती थी। जनता की भावनाओं की छाया साहित्य में प्रतिध्वनित हो रही थी। भारतीय समाज अनेक तरह के अनुभवों और संत्रसों से गुजर रहा था। सामाज का आन्तरिक संघर्ष और अधिक संगठित और पैना हो रहा था। इस संघर्ष को व्यक्त करने के लिए हिन्दी भी नए स्वरूप में ढल रही थी। सन् 1918 तक हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु बाबू हरिशचन्द का युग समाप्त हो चुका था और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती पत्रिका के द्वारा हिन्दी भाषा के नवनिर्माण में पूरी तरह लगे हुए थे। मध्य भारत में हिन्दी के व्यापक प्रचार को पूरा करने के लिए होलकर नरेश के मार्गदर्शन में सर सेठ हुकुमचन्द जैसे धनवान महापुरूषों ने इन्दौर में श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति का संचालन शुरू कर दिया था। सन् 1918 में इसी समिति के तत्वावधान में साहित्य सम्मेलन प्रयाग का 8 वां अखिल भारतीय अधिवेशन आयोजित हुआ। अधिवेशन की अध्यक्षता करने के लिए पहली बार इन्दौर आए। इन्दौर रेल्वे स्टेशन पर उनके स्वागत के लिए सर सेठ हुकुमचन्द सरजूप्रसाद तिवारी जैसे महानुभाव उपस्थित हुए। इन्दौर रेल्वे स्टेशन पर आज भी वह स्थान सुरक्षित है जहाओं रेलगाड़ी गांधी से उतरकर खडे़ हुए थे। इन्दौर में सभा की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा- भाषा का मूल करोड़ों मनुष्य रूपी हिमालय से मिलेगा और उसमें ही रहेगा। हिमालय से निकलती हुई गंगाजी अनन्तकाल तक बहती रहेंगी ऐसे ही हिन्दी का गौरव रहेगा। गाॅंधी का मनतव्य था कि राष्ट्र संचालन के लिए वही भाषा श्रेष्ठ है जो आम जनता की भाषा हो और यह शक्ति हिन्दी में है। सन् 1918 में गाॅंधीजी का भाषा चिन्तन उस स्तर पर पहुॅंच चुका था कि भारतवासियों के लिए हिन्दी और उनकी प्रान्तीय भाषाएं बहुत जरूरी हंै। भाषा और स्वराज्य गाॅंधीजी के लिए दो अलग-अलग बातें नहीं थीं। इन्दौर की इसी सभा में उन्होंने कहा- ’’ मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम भाषा को राष्ट्रीय और अपनी अपनी प्रान्तीय भाषाओं में उनका योग्य स्थान नहीं देंगे, तब तक स्वराज्य की सब बातें निर्थक हैं।’’ यह बात गाॅंधीजी ने सन् 1918 में कही थी यानी आज से 90 वर्ष पूर्व लेकिन भाषा से जुड़ा यह प्रश्न आज भी पूरे उत्तर की मांग कर रहा है। आज भी हिन्दी समेत प्रान्तीय भाषाएं अपना स्थान मांग रही हैं। गाॅंधाजी जानते थे कि केवल अंग्रेजी से राष्ट्र के आमजन को वाणी मिल सकेगी इसी सभा में उन्होंने कहा- अंग्रेजी का ज्ञान कितने भारतवासियों के लिए आवश्यक है। लेकिन इस भाषा को उसका उचित स्थान देना एक बात है, उसकी जड़ पूजा करना दूसरी बात।1918 में भाषाई परिदृष्य में गाॅंधीजी को अंगे्रजी के प्रति लोगों का समर्पण उसकी जड़ पूजा मालूम पड़ती थी। इसीलिए वे देश की आजादी को भाषाई आजादी के साथ जोड़कर देखते थे।जी हिन्दी के लिए अपने स्तर पर तो लड़ ही रहे थे साथ साथ वे देश के उन महान लोगों के साथ पत्र व्यवहार भी कर रहे थे कि हिन्दी को राष्ट्रीय आंदोलन के साथ जोड़कर उसे और अधिक व्यापक बनाकर राष्ट् भाषा के रूप में मान्यता दी जाए सन् 1918 में ही उन्होंने ठाकुर रवीन्द्र नाथ टैगोर को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए प्रयासों का उल्लेख किया जिसका उत्तर देते हुए ठाकुर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा -निःसंदेह अंतप्र्रांतीय व्यवहार केे लिए हिन्दी ही एक मात्र राष्ट्र भाषा हो सकती है सन् 1918 से लेकर 1935 के बीच के कालखण्ड में आजादी के आन्दोलन में अनेक उतार-चढ़ाव आए। इस दौर में देश के उद्योगपति भी भाषा के व्यापक प्रचार-प्रसार में लगे हुए थे। गाॅधीजी आन्दोलन का केन्द्र बने हुए थे। राष्ट्रीय आन्दोलन को चलाते हुए उन्होंने हिन्दी के महत्व को हमेशा ध्यान में रखा। सन् 1935 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग को 24 वां अखिल भारतीय अधिवेशन इन्दौर में आयोजित हुआ। इन्दौर के हिन्दी के पक्षधरों ने एक बार फिर से गाॅंधीजी को सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए बुलाया। राष्ट्रीय आन्दोलन का संचालन करते हुए गाॅंधीजी हिन्दी के महत्व को पूरी तरह जान चुके थे। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा ’’हिन्दी भाषा को बहुत आदमी बोलते हैं और यह भाषा सीखने और पढ़ने में सरल है, इसलिए यह राष्ट्रभाषा होने का अधिकार रखती है।’’ कदाचित यह पहला मौका था जब हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग गाॅॅंधीजी ने रखी। हिन्दी राष्ट्रीय एकता का सूत्र बन रही थी। ध्यान देने बात यह थी कि 1935 में राष्ट्र को आजाद होने में अभी 12 वर्ष का समय शेष था लेकिन गाॅंधीजी आजाद राष्ट्र के लिए राष्ट्रभाषा का चयन कर चुके थे। यह उनकी दूर दृष्टि का परिणाम था तथा हिन्दी की शक्ति का परिचायक भी। हिन्दी उनके लिए राष्ट्रीय सम्मान और आत्म गौरव का विषय थी उन्होंने कहा-’’किसी के सामने झुकने की जरूरत नहीं है। वायसराय से बात करना हो, तब भी अपनी भाषा का व्यवहार करो। लोग कहते हैं वायसराय आदि अंग्रेजी के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझते। इसलिए उसी का उपयोग करना आवश्यक हैं पर मैं कहता हूॅं कि यदि मैं बोलना जानता हूॅं और मेंरे बोलने में कोई ऐसी बात रहेगी जिससे वायसराय लाभ उठा सकें तो अवश्य ही वे मेरी बातें हिन्दी में बोलने पर भी सुन लेंगे। उन्हें आवश्यकता होगी तो उनका अनुवाद करा लेंगे।’’ (गाॅंधी, आम्बेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं पृष्ठ-41इसी अध्यक्षीय भाषाण में उन्होंने एक और महत्वपूर्ण सुझाव दिया कि सभी भारतीय भाषाओं की एक समान लिपि हो। लिपि की समरूपता भाषाओं को एक-दूसरे के समीप लाऐगी। जिससे राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी को प्रचारित करने में सहायता मिलेगी। गाॅंधीजी ने सुझाव दिया- ’’ अपने प्रान्त में वह भाषा तो चले किन्तु हिन्दी का प्रचार विशेष हो, जिससे यह राष्ट्रभाषा बन सके। यू ंतो बंगला का

साहित्य भी बहुत है। परन्तु वह राष्ट्रभाषा नहीं बन सकती। राष्ट्रभाषा तो केवल हिन्दी ही बन सकती है।’’ गाॅंधीजी के द्वारा लिपि के संबंध में व्यक्त किए गए विचारों को बाद में आचार्य विनोबा भावे ने आगे बढ़ाने की पुरजोर वकालत की। इसी अधिवेशन में उन्होंने काका कालेलकर की अध्यक्षता में लिपि परिषद् गठित की गयी लिपि की सम रूपता की ओर संकेत करते हुए कहा- ’’ हिन्दी प्रचार के लिए लिपि का एक होना भी आवश्यक है, हिन्दी भाषा संस्कृत से पैदा हुई है, आसामी और बंगला भी इसी से बहुत संबंधित है। दक्षिण भारत की भाषा द्राविडी मापी जाती है। में तो यह मानता हूॅं कि वह संस्कृत से पैदा हुई है। तमील, तेलगु, कनाडी आदि भाषाएं संस्कृत से भरी हुई हैं। बंगला भी संस्कृत से परिपूर्ण है। जब उनको अपनी भाषा में कोई शब्द नहीं मिलता तो वे इससे शब्द लेती है और उनका क्रप्रयोग करती हैं। अतः सब भाषाओं के लिए समान लिपि का होना आवश्यक है। (सन् 1935 में इन्दौर में दिए गए भाषण सेसभाओं, आन्दोलनों, बैठक की कार्रवाईयों और समाचार पत्रों के आलेखों तथा संपादकियों और साक्षात्कारों एवं वार्तालापों के द्वारा गाॅंधीजी निरंतर हिन्दी की स्थापना की लड़ाई लड़ रहे थे। उन्होंने कहा- अंग्रेजी में व्याख्यान देने की आदत ने हिन्दुस्तान के राजनीतिज्ञों के मन मैं जो घर कर लिया है, उसे मैं अपने देश और मनुष्यत्व के प्रति अपराध मानता हूॅ, क्योंकि हम लोग अपने ही देश की उन्नति में रोड़ा अटकाने वाले बन गए हैं।’’(29/312 गांधी वांड़मय) गांधीजी यह बात भली भांती समझ गये थे कि राष्ट्रीय अस्मिता का बोध अपनी जातीय भाषाओं के द्वारा ही सम्भव है। उन्होंने आगे कहा-’’जिस राष्ट्र ने अपनी भाषा का अनादर किया उस राष्ट्र के लोग अपनी राष्ट्रीयता खो बैठते है। हममें से अधिकांश लोगों की यही हालत हो गयी हो गयी है। पृथ्वी पर हिन्दुस्तान ही एक ऐसा देश है जहाॅं माॅं, बाप अपने बच्चों को अपनी मातृभाषा के बदले अंग्रेजी सिखाना पसन्द करेंगे (गांधी वांड़मय पृष्ठ क्रमांक 15/गांधीजी हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की बात कह रहे थे उस समय तक हिन्दी एक साहित्यिक भाषा के रूप में ही विकसित हुई थी। विज्ञान, तकनीक, पत्रकारिता और ऐसे ही अनेक रूपों में इसका ढलना अभिशेष था। गांधीजी यह बात भलीभांति जानते थे कि जब तक हिन्दी जीवन के सभी आयामों को लेकर ना चलेगी तब तक इसे राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठिापित करने में सफलता मिल सकेंगी इसीलिए उन्होंने कहाॅं- ’’केवल साहित्य की वृद्वि करे तो यह भाषा राष्ट्रभाषा कैसे बन सकती है? साहित्य की वृद्वि करना हमारा परम कर्तव्य है, किन्तु साहित्य की वृद्वि से यह भाषा राष्ट्रभाषा नहीं बन सकती। (सन् 1935 में इन्दौर में दिए गए भाषण सेगांधीजी हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने का प्रयास कर रहे थे और साथ ही हिन्दी के विद्ववानों को आगाह भी कर रहे थे कि एक भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में विकसित करने के लिए और क्या किया जाना चाहिए। आज आजादी के 60 वर्षो के बाद हिन्दी ज्ञान-विज्ञान की सभी विधाओं के संवाहन में सक्षम है। आवश्कता केवल इतनी है कि हम अंग्रेजी की जकडन से अपने को मुक्त करें और हिन्दी की शक्ति को पहचाने। साथ ही उस षड़यत्र को भी पहचानने की भी जरूरत है जिसके तहत अंग्रेजी का प्रभाव बढाने के कुचक्र रचे जा रहे हंै। गांधीजी का हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का सपना अभी शेष है। इसे पूरा करना हम सब की राष्ट्रीय जिम्मेदारी है। आज जब सब टूट रहा ऐसे में भाषा की चिंता किसे है । पर भाषा के बिना भारतीया

पहचान की रक्षा नहीं की जा सकती ।







मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

पश्चिम एशिया और ऋग्वेद - प्रथम संस्करण 1994 - भूमिका

these lines have been taken from historical book ' pashcim ashiya aur rigved'of Dr. Ramvilas sharma’ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनके लिए इतिहास, विषेष रूप से प्राचीन भारत के इतिहास की समस्याओं से जूझना वक्त की बर्बादी है। कुछ की दृष्टि में सभी समस्याएं हल हो चुकी हैं और उन्हें नए सिरे से उलझाने की कोषिष करना फिज़ूल है। कुछ अन्य के लिए आज के ज्वलंत प्रष्नों और वर्तमान चुनौतियों से मुॅह मोड़कर यह एक विषुध्द अकादमिक मषक्कत है। हैरानी तो यह देख कर होती है कि इतिहास और परम्परा का निषेध करने वालों में ऐसे विद्वान भी शामिल हैं जो ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिध्दान्तों से प्रतिबध्दता के दावे करते है।’’

पृष्ठ 01

’’सिन्धु सभ्यता का विनाष आर्यों से नहीं किया, बल्कि इस सभ्यता की नींव ऋग्वेद के रचनाकार आर्यों के वंषजों ने डाली थी। इस सभ्यता का हृास (लगभग 1750 ई.पू. में) कम से कम पंजांब में, यमुना और सतलुज नदियों के मार्ग परिवर्तन के फलस्वरूप सरस्वती में जल की भारी कमी के कारण हुआ था। यह आर्यों के तथाकथित हमलों और किसी बड़े विध्वंस की कहानी न होकर पर्यावरण में परिवर्तन के फल स्वरूप ही हुआ था। सिन्धु सभ्यता के मात्र मोहेंजोन्दड़ों और हडप्पा ही प्रमुख केन्द्र नहीं थे जो अब पाकिस्तान में चले गए, बल्कि इस सभ्यता का अत्यंत महत्वपूर्ण केन्द्र कालीवंगा जो राजस्थान में सरस्वती नदी के किनारे बसा हुआ था। इसके विनाष की वजह सरस्वती के जल में भारती कमी और जलमार्ग में आया हुआ परिवर्तन था। वह राजस्थान से होती हुई सिंध की तरफ बहने के बदले पूरब की ओर घूम यमुना के जलमार्ग से प्रयाग की ओर बहने लगी थी और राजस्थान में उसका लोप हो गया था।’’

पृष्ठ 12-13

’’दूसरी सहस्त्राब्दी ई.पू. बड़े-बड़े जन अभियानों की सहस्त्राब्दी है। इसी के दौरान भारतीय आर्यों के दल इराक से लकर तुर्की तक फैल जाते हैं। वे अपनी-अपनी भाषा और संस्कृति की छाप सर्वत्र छोड़े जाते हैं। पूंजीवादी इतिहासकारों ने उल्टी गंगा बहाई है जो युग आर्यों के बहिर्गमन का है उसे वे भारत में उनके प्रवेष का युग कहते हैं। इसके साथ वे यह प्रयास करते हैं कि पष्चिम एषिया के वर्तमान निवासियों की आॅखों से उनकी प्राचीन संस्कृति का वह पक्ष ओझल रहे जिसका संबंध भारत से है। सबसे पहले स्वयं भारतवासियों को यह संबंध समझना है, फिर उसे अपने पड़ोसियों को समझाना है। भुखमरी, अषिक्षा, अंधविष्वास और नए-नए रोज फैलाने वाली वर्तमान समाज व्यवस्था को बदलना है। इसके लिए भारत और उसके पड़ोसियों का सम्मिलित प्रयास आवष्यक है यह प्रयास जब भी हो, यह अनिवार्य है कि तब पड़ोसियों से हमारे वर्तमान संबंध बदलेंगे और उनके बदलने के साथ वे और हम अपने पुराने संबंधों को नए सिरे से पहचानेंगे। अतीत का वैज्ञानिक, वस्तुपरक विवेचक वर्तमान समाज के पुर्नगठन के प्रष्न से जुड़ा हुआ है।’’

पृष्ठ 20

बुधवार, 11 मार्च 2009

हिन्दी भाषा का इतिहास

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में मानी जाती है। इसकी प्राचीनता का एक प्रमाण यहाँ की भाषाएँ भी है। भाषाओँ की द्रष्टि से काल खंड का विभाजन निम्नानुसार किया जाता है :
वैदिक संस्कृत
लौकिक संस्कृत
पाली
प्राकृत
अपभ्रंश तथा अव्ह्त्त
हिंदी का आदिकाल
हिंदी का मध्यकाल
हिंदी का आधुनिक काल

हिंदी शब्द की उत्पति "सिन्धु" से जुडी है। "सिन्धु" "सिंध" नदी को कहते है। सिन्धु नदी के आस-पास का क्षेत्र सिन्धु प्रदेश कहलाता है। संस्कृत शब्द "सिन्धु" ईरानियों के सम्पर्क में आकर हिन्दू या हिंद हो गया। ईरानियों द्वारा उच्चारित किया गए इस हिंद शब्द में ईरानी भाषा का "एक" प्रत्यय लगने से "हिन्दीक शब्द बना है जिसका अर्थ है "हिंद का"। यूनानी शब्द "इंडिका" या अंग्रेजी शब्द "इण्डिया" इसी "हिन्दीक " के ही विकसित रूप है।
हिंदी की साहित्य1000 ईसवी से प्राप्त होता है। इससे पूर्व प्राप्त साहित्य अपभ्रंश में है इसे हिंदी की पूर्व पीठिका माना जा सकता है। आधुनिक भाषाओँ का जन्म अपभ्रंश के विभिन्न रूपों से इस प्रकार हुआ है :

अपभ्रंश - आधुनिक भाषाएँ
शोर्सेनी - पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, पहाड़ी , गुजराती
पैशाची - लहंदा, पंजाबी
ब्राच्द - सिंधी
महाराष्ट्री मराठी
मगदी - बिहारी, बंगला, उदिया, असमिया

1पश्चिमी हिंदी - खडी बोली या कौरवी २। ब्रिज ३। हरयाणवी ४। बुन्देल ५।कन्नौजी
२। पूर्वी हिंदी - १। अवधी २। बघेली ३। छत्तीसगढ़ी
३। राजस्थानी - १। पश्चिमी राजस्थानी (मारवारी ) पूर्वी राजस्थानी
४। पहाड़ी - १। पश्चिमी पहाड़ी २। मध्यवर्ती पहाड़ी (कुमौनी - गड्वाली )
५। बिहारी - १। भोजपुरी २। मागधी ३। मैथिलि

आदिकाल - (1000---1500)
अपने प्रारंभिक दौर में हिंदी सभी बातों में अपभ्रंश के बहुत निकट थी इसी अपभ्रंश से हिंदी का जन्म हुआ है। आदि अपभ्रंश में अ, आ, ई, उ, उ ऊ, ऐ, औ केवल यही आठ स्वर थे। t ई, औ, स्वर इसी अवधि में हिंदी में जुड़े । प्रारंभिक , 1000 से 1100 ईसवी के आस-पास तक हिंदी अपभ्रंश के समीप ही थी । इसका व्याकरण भी अपभ्रंश के सामान काम कर रहा था। धीरे -धीरे परिवर्तन होते हुए और 1500 इ- आते-आते हिंदी स्वतंत्र रूप से खडी हुई। 1460 के आस-पास देश भाषा में साहित्य सर्जन प्रारंभ होचुकाहो चुका था। इस अवधि में दोहा, चौपाई ,छप्पय दोहा , गाथा आदि छंदों में रचनाएं हुई है। इस समय के प्रमुख रचनाकार गोरखनाथ, विद्यापति, नरपति नालह, चंदवरदाई, कबीर आदि है।

मध्यकाल 1500-----1800 तक
इस अवधि में हिंदी में बहुत परिवर्तन हुए। देश पर मुगलों का शासन होने के कारन उनकी भाषा का प्रभाव हिंदी पर पड़ा। परिणाम यह हुआ की फारसी के लगभग 3500 शब्द, अरबी के 2500 शब्द, पश्तों से 50 शब्द, तुर्की के 125 शब्द हिंदी की शब्दावली में शामिल हो गए। यूरोप के साथ व्यापर आदि से सम्पर्क बढ़ रहा था। परिणाम स्वरुप पुर्तगाली, स्पेनी, फ्रांसीसी और अंग्रजी के शब्दों का समावेश हिंदी में हुआ। मुगलों के आधिपत्य का प्रभाव भाषा पर दिखाई पड़ने लगा था। मुग़ल दरबार में फारसी पड़े -लिखे विद्वानों को नौकरियां मिली थी परिणामस्वरूप पड़े-लिखे लोग हिंदी की वाक्य रचना फारसी की तरह करने लगे। इस अवधि तक आते-आते अपभ्रंश का पूरा प्रभाव हिंदी से समाप्त हो गया जो आंशिक रूप में जहा कही शेष था वह भी हिंदी की प्रकृति के अनुसार ढलकर हिंदी का हिस्सा बन रहा था। इस अवधि में हिंदी का स्वर्णिम साहित्य सरजा गया। भक्ति आन्दोलन ने देश की जनता की मनोभावना को प्रभअवित किया। भक्त कवियों में अनेक विदवान थे जो तत्सम मुक्त भाषा का प्रयोग कर रहे थे। राम और क्रष्ण जनम स्थान की ब्रिज भाषा में काव्य रचना की, जो इस काल के साहित्य की मुख्यधारा मानी जाती हैं। इसी अवधि में दखिनी हिंदी का रूप सामने आया। पिंगल, मैथली और खड़ी बोली में भी रचनाये लिखी जा रही थी। इस काल के मुख्य कवियों में महाकवि तुलसीदास, संत सूरदास, संत मीराबाई, मालिक मोहम्मद जायसी, केच्दास, बिहारी भूषण है। इसी कालखंड में रचा गया रामचरितमानस जैसा ग्रन्थ विश्व में विख्यात हुआ हिंदी में क, ख, ग, ज, फ, ये पाच नयी ध्वनियाँ, जिनके उच्चारण प्रायः फारसी पड़े-लिखे लोग ही karte थे। इस काल के भक्त निर्गुण और सगुन उपासक थे। कवियों का रामाश्रयी और कृष्णाश्रयी शाखाओं में बांटा गया। इसी अवधि में रीतिकालीन काव्य भी लिखा गया।
आधुनिक काल ( 1800 से अब तक )
हिंदी का आधुनिक काल देश में हुए अनेक परिवर्तनो का साक्षी है। परतंत्र में रहते हुए देशवासी इसके विरुद्ध खड़े होने का उपक्रम कर रहे थे। अंग्रेजी की का प्रभाव देश की भाषा और संस्कृति पर दिखाई पड़ने लगा। अंग्रेजी शब्दों का प्रचालन हिंदी के साथ बड़ा। मुगलकालीन व्यस्था समाप्त होने से अरबी, फारसी के शब्दों के प्रचालन में गिरावट आई फारसी से गृहीत क, ख, ग, ज, फ ध्वनियों का प्रचालन हिंदी में समाप्त हुआ। अपवाद स्वरुप कही कही ज और फ ध्वनि शेष बची। क, ख, ग ध्वनियाँ क, ख, ग में बदल गयी। इस पूरे कालखंड को 1800से 1850 तक और fir 1850 से1900 तक तथा 1900 का 1900 तक और 1950 se 2000 तक विभाजित किया जा सकता हैं।
संवत 1830 में जन्मे मुंशी सदासुख लाल नियाज ने हिंदी खड़ी बोली को प्रयोग में लिया । खड़ी बोली उस समय भी अस्तित्व में थी । खड़ी बोली या कौरवी का उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश के उत्तरी रूप से हुआ है । इसका क्षेत्र देहरादून का मैदानी भाग , सहारनपुर , मुज्जफरनगर, मेरुत , दिल्ली बिजनौर ,रामपुर ,मुरादाबाद है । इस बोली में पर्याप्त लोक गीत और लोक कथाएं मौजूद हैं । खड़ी बोली पर ही उर्दू , हिन्दुस्तानी और दक्खनी हिंदी निर्भर करती है । मुंशी सदा सुखलाल नियाज के आलावा इंशा अल्लाह खान इसी अवधि के लेखक है । इनकी रानी केतकी की कहानी पुस्तक प्रसिद्ध है । लल्लूलाल , इस काल खंड के एक और प्रशिध लेखक है । इनका जनम संवत 1820 में हुआ था कोल्कता के फोर्त्विलियम कॉलेज के अध्यापक जॉन गिल्ल्क्रिस्ट के अनुरोध पर लल्लूलाल जी ने पुस्तक प्रेम सागर खड़ी बोली में लिखी थी । प्रेम सागर के आलावा सिंघासन , बत्तीसी , बेताल पचीसी , शकुंतला नाटक , मधोनल भी इनकी पुस्तकें हैं जो कड़ी बोली में , ब्रज और उर्दू के मिश्रित रूप में हैं । इसी कालखंड इक और लेखक सदल मिश्र हैं । इनकी नासिकेतोपाख्यान पुस्तक प्रशिध है । सदल मिश्र ने अरबी और फारसी के शब्दों का प्रयोग न के बराबर किया है । कड़ी बोली में लिखी गयी इस पुस्तक में संस्कृत के शब्द अधिक हैं । संबत 1860से 1914 के बीच के समय में कालजई कृतियाँ पराया नहीं नहीं मिलती । 1860  के आस -पास तक हिंदी गद्य प्रया अपना निश्चित स्वरुप ग्रहण करचुका था । इसका लाभ लेने के लिये अंग्रेजी पादरियों ने ईसायत के प्रचार - प्रसार के लिए इंजील और बाइबिल का अनुबाद खड़ी बोली में किया यद्यपि इनका लक्ष्य अपने धर्म का प्रचार - प्रसार करना था । तथापि इसका लाभ हिंदी को मिला देश की साधारण जनता अरबी - फारसी मिश्रित भाषा में अपने पौराणिक आख्यानों को कहती और सुनती थी । इन पादरियों ने भी भाषा के इसी मिश्रित रूप का प्रयोग किया । अबतक 1857 का पहला स्वतंत्रता युद्ध लड़ा चूका था अतः अंगरेजी शासकों की कूटनीति के सहारे हिंदी के माध्यम से बाइबिल के धर्म उपदेशों का प्राचर - प्रसार खूब हो रहा था . भारतेंदुबाबू हरेश्चंद्र ने हिंदी नव जागरण की नीव रखी । उन्होंने अपनें नाटकों , कविताओं , कहावतों और किस्सा गोई के माध्यम से हिंदी भाषा और जातीय के उठान के लिय खूब काम किया । कविवचनसुधा के माध्यम से हिंदी का प्रचार -प्रसार किया । गद्य में सदल मिश्र , सदासुखलाल ,लल्लू लाल आदि लेखकों ने हिंदी खड़ीबोली को स्थापित करने का काम किया । भारतेंदु बाबू हरेश्चंद्र ने कविता को ब्रज भाषा से मुक्त किया उसे जीवन के यथार्थ से जोड़ा । सन 1866 देश में बहुत बड़ा अकाल पड़ा । जनता मरती रही और प्रशासक रंगरेलियां करते रहे । देश में दस से बीस लाख लोग मौत के शिकार हुए । ऐसे समय में भार्तेंदुबबू हरेश्चन्द्र ने आवाज दी " निज भाषा उन्नत अहै सब उन्नत को मूल , बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल " अंग्रेजों के अत्याचारों और सब तरह के शोशानो से दुखी जनता अपने देश पाना की ओर झुकी । इसी अवधि के लेखकों में पंडित बदरी नारायण चौधरी , पंडित प्रताप नारायण मिश्र । बाबू तोता राम । ठाकुर जग मोहन सिंह । लाल श्री निवास्दास । पंडित बाल क्रष्ण भट्ट पंडित केशवदास भट्ट ,पंडित अम्बिकादुत्त व्यास । पंडित राधारमण गोस्वामी आदि हैं । हिंदी भाषा और साहित्य को परमार्जित करने के उद्देश्य से इस काल खंड में अनेक पात्र - पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हुआ .इनमें चन्द्रिका । नवोदिता हरिश्चंद्र , हिन्दी बंगभाषी , आर्य व्रत , उचितवक्ता भारत मित्र , सरस्वती ।, दिनकर प्रकाश आदि । 1900 वी सदी का प्रारम्भ  हिदी भाषा के विकास की द्रष्टि से बहुत महत्वपूरण है । इसी समय में देश में स्वतंत्रता आन्दोलन प्रारंभ हुआ था । राष्ट्र में कई तरह के आन्दोलन चल रहे थे । इनमे कुछ गुप्त और कुछ प्रकट थे पर इनका माध्यम हिंदी ही थी अब हिंदी केवल उत्तर भारत तक ही सीमित न रह गई थी । हिंदी अब  तक पूरे भारतीय आन्दोलन की भाषा बन चुकी थी । साहित्य की द्रष्टि से बंगला, मराठी हिंदी से आगे थीं परन्तु बोलने बालों की द्रष्टि से हिंदी सबसे आगे थी । इसी लिए हिंदी को राज भाषा बनाने की पहल गाँधी जी समेत देश के कई अन्य नेता भी कर रहे थे । सन 1918 में हिंदी साहित्य सम्मलेन की अध्यक्षता करते हुए गाँधी जी ने कहा था की हिंदी ही देश की राष्ट्र भाष होनी चाहिए । सन 1900से लेकर 1950 अक हिंदी के अनेक रचना करों ने इसके विकास में योग दान दिया इनमे मुंशी प्रेम चंद ,जय शंकर प्रसाद , दादा माखन लाल चतुर्वेदी , मैथिलीशरण गुप्त , सुभद्राकुमारी चौहान , आचार्य रामचंद्र शुक्ल , सूर्य कान्त त्रिपाटी निराला । सुमित्रा नंदन पन्त , महा देवी वर्मा आदि । मुग़ल सल्तनत और अंग्रेजों की गुलामी के समय में भारतीय भाषाएँ राज भाषाएँ न बन पाई थी । देश की आजादी के साथ ही हिंदी को राज भाषा का दर्जा मिला । संविधान के अनुच्ग्चेद 343 (१) में हिंदी को राजभाषा बनाने का विवरण दिया गया है --'सघ की राज भाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी । संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए भारतीय अंको का अंतरराष्ट्रीय रूप प्रयोग में आएगा । भारत सरकार ने समरूपता बनाये रखने की द्रष्टि से देव नगरी लिपि को इस रूप में माना है ------- अ , आ , इ , ई , उ , ऊ , ऋ , ए , ऐ , ओ , औ ,अं ,अ: क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण ड़ ढ़ त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह क्ष त्र ज्ञ श्र ।

  अंकों के वारे में भारतीय संविधान में बहुत साफ़ - साफ़ कहा गया है कि अन्तर्ररास्ट्रीय  मान्यता प्राप्त अंक भारत सरकार प्रयोजनों के लिए काम में लिए जायेंगे . इस  तरह यह स्पष्ट है कि जिन अंकों को हम अंगरेजी का अंक कहते हैं , वे अंग्रेजी  के अंक न हो कर हिदी के अंक हैं . 

सोमवार, 5 जनवरी 2009

भाषा पर चिंतन करने वाले नेता नहीं बचे

यद्यपि गाँधी जी न तो इतिहासकार थे और न ही साहित्यकार तथापि उनके लेखन को समझने वाला कोई भी व्यक्ति उनके इन दोनों रूपों को खारिज नहीं कर सकता । उनकी किसी भी पुस्तक का शीर्षक इतिहास और साहित्यक प्रष्टभूमि पर केन्द्रित नहीं है । लेकिन उनकी ऐसी कोई रचना नहीं जिसमें इतिहास और साहित्य के वारे में विचार न किया गया हो । भाषा के वारे में गाँधी जी की द्रष्टि बहुत व्यापक थी । वे जानते थे की मानव जीवन के सभी व्यव्हार भाषा से ही अनुस्यूत हैं । भाषा से परे कुछ भी नहीं । यही कारन है की स्वतंत्रता के केन्द्र में रहकर भी भारतीय भाषाओँ के विकास के लिए निरंतर चिंतन करते रहे उनके वारे में लोक चेतना पैदा करते रहे । इस हेतु उन्होंने जितना श्रम किया उतना श्रम अन्य कोई नेता नहीं कर पाया । हिन्दी साहित्य सम्मलेन की अध्यक्षता सम्हालते हुए वे हिन्दी के विकास के लिए हमेशा उपलव्ध रहे। तब ये सम्मलेन भारत में ही होते थे । आज विश्व हिन्दी सम्मेलनों को संबोधित करनें के लिए हमें हमेशा राष्ट्रीय स्तर के नेता की कभी न ख़त्म होने वाली तलाश रहती है । यही बात स्थानीय स्तर पर भी लागू होती है। भाषा और साहित्य को समर्पित किसी छोटे से आयोजन को संबोधित करने वाले नेता उपलव्ध नहीं होते या फ़िर वे इस लायक ही नहीं पाए जाते की उन्हें इन विषयों पर सुना जा सके . अक्सर आज का नेता भाषा और साहित्य पर चिंतन नहीं करता जिसका दुखद परनाम यह हुआ की आज हमारी भाषाओँ के सामनें जो संकट है उससे आम आदमी अन्विग्य है। आज का सच यह है की देश का आम आदमी या तो नेताओं की आवाज सुनता है याफिर अभिनेताओं की । ऐसे कटिन समय में राज नेताओं की यह जिम्मेंदारी बनती है की वे समय की मांग को समझें और देश की जनता को अपनी भाषाओँ के प्रति अनुराग से भरें । यह kam अविलम्ब होना चाहिए ।
गाँधी जी हिन्दी को राष्ट्रीय भाष बनाना चाहते थे । यह बात और है की बाद में वे हिन्दुस्तानी के पक्ष में बात करने लगे थे । हिन्दुस्तानी का पक्ष उन्होंने इस लए लिया था कियोंकि वे नहीं चाहते थे की भाषा के कारन हिंदू और मुसलमानों के बीच झगडा न हो । सन १९१८ में साहित्य सम्मेलन प्रयाग के८वेन अधिवेशन को संवोधित करते हुए उन्होंने इंदौर में कहा था '' आज हिन्दी से स्पर्धा करने वाली कोई भाषा नहीं है । हिन्दी -उर्दू का झगडा छोड़ने से रास्ट्रीय भाषा का सबाल सरल हो जाता है । हिन्दुओं को फारसी शब्द थोड़ा बहुत जानना पड़ेगा इस्लामी भाइयों को संस्कृत शब्द का ज्ञान संपादन करना पड़ेगा । इसे लें देन से हिन्दी भाषा का बल बडेगा और हिंदू मुसलमानों में इकता का इक बड़ा साधन हमारे हाथों में आ जाएगा । अंग्रेजी भाषा का मोह दूर करने के लिए इतना अधिक श्रम करना पड़ेगा की हमें लाजिम है की हम हिन्दी -उर्दू का झगडा न उठाएं । लिपि की तकरार भी हमें न उतानी चाहिए । '' ( अनुभूति के स्वर प्रष्ट ८व ९ ) गाँधी जी हिन्दी के विकास के लिए उर्दू और हिन्दी की विभाजक रेखा मिटाना चाहते थे । उनकी यह व्हाहट कोरी कल्पना न थी बल्कि इसके बहुत मजबूत भाषाई आधार थे । हिन्दी के सुविख्यात आलोचक डा .रामविलास शर्मा ने इस विषय पर अपने चिंतन को इन शव्दों में लिखा है '' जब तक दो लिपियों का चलन रहता है,टीबी तक हिन्दी का बाजार विभाजित रहता है संयुक्त बाजार में हिन्दी और उर्दू के बिच होड़ हो , दोनों का साहित्य एक लिपि के मध्यम से आम पातकों तक पहुंचे , तो वे फ़ैसला क्र सकेंगे , कौन सी शैली उन्हें अधिक पसंद आयगी उसी का चलन होगा । पूरे भारत के मानचित्र को देखते हुए ऐसी सामान्य लिपि नागरी ही हो सकती है । फारसी और संस्कृत के शव्दों को तो एक भाषा में तो मिलाया जासकता है परन्तु फारसी और नागरी लिपि को मिलकर एक अजूबा लिपि नहीं बनाई जा सकती । इस लिए इन दो में एक को चुनना होगा ।अनपद किसानो और मजदूरों को शिक्षित करना हो तो उन पर दो लिपियाँ लड़ना उन पर भरी अत्याचार करना होगा । एक लिपि ही सीख लें तो बड़ी बात है । इसलिए जो लोग भी किसानों और मजदूरों के आन्दोलन से दिलचस्पी रखते हैं , उन्हें कम से कम हिन्दी प्रदेश में नागरी लिपि के व्यव्हार और प्रयोग पर जोर देना चाहिए ।'' (गाँधी , आम्बेडकर , लोहिया और भरतीय इतिहास की समस्यां -प्रष्ट ४१९ )

हिन्दी -उर्दू के बीच की बड़ाई गई है । इसा करने वालो न के निजी किंतु संकीर्ण स्वार्थ हैं विश्व में यही दो भाषायं है जिनके क्र्यापद सामान हैं केवल लिपि बदल देने से उसे एक अलग भाषा बनने की बात समझ में नहीं आती । अगर उर्दू को नागरी में लिखा गया होता तो इसके साहित्य के पातकों की संख्या आज भुत होती । गाँधी जी इसी लिए सामान लिपि की बात कर रहे थे । उनको इसी द्रष्टिकोण को श्री विनोवा भावे ने आगे बढाया था । इतना ही नहीं उन्होंने सभी भारतीय भाषाओँ के लिए सामान लिपि की वकालत की थी । ऐसा करने से भारतीय भाषाओँ के समक्ष आज मौजूद चुनौती का सामना सरलता सा किया जा सकता था । समांन लिपि होने से भाषाओ की पहचान को भी कोई खतरा नहीं होता । यौरोपे की सभी भाषाओँ की लिपि रोमन है फिर भी उनकी पहचान अलग अलग है इसी तरह भारत की भाषाओँ की लिपि देव नगरी हो सकती है । आज जब यह शोध सामने आगया है की सन २०४० तक हिन्दी के अलावा भारत की अन्य भाषाएँ समाप्त हो जाएँगी । ऐसे कठिन समय में भाषाओं को बचाने के लिए सामान लिपि वाला फार्मूला राम बाण है । गाँधी जी इतिहास के वारे में मौलिक दंग से सोचते थे । उनके लिए इतिहास उर्जा प्राप्त करने का साधन है । उन्होंने लिखा '' इतिहास देश पर गर्व करना सिखाने का साधन है । मुझे इतोहस सिखाने की उपने स्कूल की पद्धति में इस देश के बारे में गर्व अनुभव करने का कोई कारन नहीं मिला । इसके लिए मुझे दूसरी किताबें पदनी पड़ीं । '' (गाँधी वांग्मय १४/३२) यहाँ गांघी जी नें इतिहास के वारे में बहुत बुनयादी सवाल उठाए हैं । इन सवालों के जबाव पंडित सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने सुधा पत्रिका की संपादकी में लिखे हैं । निरंतर------