Thursday, January 13, 2011

विनाश या विकास की ओर बढ़ते कदम

 भौतिक विकास प्रक्रति का विरोधी होता है . विकास की अंधी दौड़ ने प्रक्रति के सामने अस्तित्व का संकट खडा कर दिया है . आज के आदमी को विकास भी चाहिए और प्रक्रति भी . उसकी दोनों  चाहतें कैसे पूरी हों यह चिंतन का विषय है . चिंता यह भी है कि अगर प्रक्रति के लिए इसी तरह खतरे बड़ते गए तो प्रक्रति कुमार कहा जाने वाला यह मानव कैसे बच पायेगा ?मनुष्य का जन्म प्रक्रति की गोद मैं ही हुआ है इसी लिए वह आज भी शांति की तलाश में वनों ; पहाड़ों . नदियों और समुद्र के पास जाता रहता है . यह उसकी मजबूरी भी है ओर स्वाभाविक जरूरत भी . लेकिन कल्पना कीजिए कि अगर विकास के नाम पर इसी तरह विनास का पहिया  घूमता  रहा तो आने वाली पीढियां किस नदी के तट पर बैठने जायेंगी ? कौन से पहाड़ उसे अपनें पास बुलाकर उसकी पीड़ा हारेंगे ? सभी नदियों का जीवन संकट में है , पहाड़ आदमी के बढ़ते लालच से भयभीत हैं . एक नदी केवल पानी का श्रोत भर ही नही होती वह सस्क्र्ती की संवाहिका भी होती है .विश्व की सभी संस्क्र्तियों  का जन्म नदियों के तटों पर ही हुआ है .आज ये नदिया भयभीत हैं . इन सब के अलावा जंगल जो हमारे अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं , निरंतर कम होते जा रहे हैं . नदी पर्वत ,जंगल  पहाड़ ये निर्जीव इकायाँ नहीं है . ये जीवंत हैं और सच तो यह है कि यदि ये हैं तो हमारा असितित्व  है . ज़रा सोचिये कि अगर ये सब ना होते तो महावीर , गौतम बुद्ध. राम आदि सब को करुना का पाठ कौन पढाता ? इस चित्र में आप देख रहें कि एक पहाड़ को बहुत बे रहमी से नष्ट किया जा रहा है . यह चित्र गोवाहाटी और सिलोंग के बीच काटे जा रहे पहाड़ का है ,इसने सदियों तक अपने ऊपर जंगल उगाकर मनुष्य की सभी जरूरतों को पूरा किया है और आज आनाथ की तरह हो गया है . आदमी  ......पहाड़ , नदियाँ और जंगल नष्ट तो कर सकता है पर याद रहे आदमी पहाड़ पैदा नहीं कर सकता वह नदी भी नहीं वहा सकता और जंगल उगाने के लिए आदमी के पास जमीन भी नहीं है . यह सोचनें का समय है कि हम जा जा कहाँ    रहे   हैं  ........विकास की तरफ या विनास की ओर ?    

1 comment:

जवाहर चौधरी said...

केवल पहाड़ ही क्यों !
विकास के भस्मासुर ने क्या क्या नहीं नष्ट कर दिया है ! नदियां प्रदूषित हुई, खेत चैपट हुए, परिवार में ना ना प्रकार की विकृतियों ने जगह बना ली , आपसी संबंध सारे मतलब के हो गए ! ये सब विकास की देन है । एक दिन मनुष्य विकास की अपनी करतूत पर पछताएगा जरुर ।
अपापकी चिंता वाजिब है ।