Tuesday, September 14, 2010

आत्म चिंतन का दिन भी है , हिन्दी दिवस

आज हिन्दी दिवस मनाते हुए ऐसा क्यों लगता है कि हम केवल एक औपचारिकता निभा रहे हैं। क्यों इसके प्रति कोई आत्मिक भाव बोध नहीं जागता ? क्यों ऐसा नहीं लगता कि भाषा हमारे लिए बहुत महत्व की चीज है ? ऐसा इसलिए नहीं लगता क्योंकि आज का भारत वह भारत नहीं है जिसका स्वप्न गाँधी, लोहिया जैसे अन्य अनेक महान लोगों ने देखा था। भाषा को देष की सांस्कृतिक अस्मिता मानने वाले इन लोगों के प्रयासों का प्रतिफल है यह दिन। इन लोगों ने सोचा था कि हम भी आगामी पीढ़ियां इस प्राचीन देष की अद्वितीय सांस्कृतिक धरोहर को अपनी भाषाओं के सहारे जीवित रखेंगी। लेकिन पीढ़ियां ऐसा नहीं कर सकी। और अब आज का भारत गाँधी, आम्बेडकर और लोहिया के स्वप्नों वाला भारत नहीं रहा। आज का भारत अमरीकीय दृष्टिपथ पर आकार ले रहा भारत है। इसीलिए अपनी भाषा की स्थापना का दिवस मनाते हुए मन में कोई स्वाभाविक राग नहीं दिखाई पड़ता। किसी भाषा के प्रति अनुराग एक दिन में पैदा नहीं किया जा सकता। अनुराग और प्रेम के लिए पूरी जिन्दगी चाहिए। आजादी के इन 61 वर्षों में हमने अपनी पीढ़ियों के मनों में अपनी मातृभाषाओं के प्रति कोई लगाव पैदा नहीं किया। इन भाषाओं को उनके कैरियर के अनुरूप नहीं ढाला जिसका दुष्परिणाम हमारे सामने है। ’’लगे रहो मुन्नाभाई’’ फिल्म का एक डाइलाॅग याद करें जिसमें अभिनेता संजय दत्त कहता है कि ’’हृदय परिवर्तन’’ जैसा शब्द बोलने से ऐसा लगता है कि मानो सुनने वाले का हार्ट फेल हो गया है। देष में यह स्थिति अकस्मात उभरी है। इसके पीछे एक लम्बा षड़यंत्र है। अपनी भाषा के शब्दों के प्रति लगाव क्यों होना चाहिए इसकी जरूरत पर प्रकाष डालते हुए सन् 1967 में डाॅ. राममनोहर लोहिया ने कहा था -’’षब्द आसमान से नहीं टपकता, शब्द जुड़ा हुआ रहता है, देष की मिट्टी के साथ, देष के इतिहास के साथ, कथाओं और किंवदन्तिओं के साथ। जैसे गांगा शब्द कोई सुनता है भारतवर्ष में, तो गंगा का जो मतलब होता है वह न जाने कितना, ढेर सा चित्र दिमाग में एक साथ आ जाता है(पुस्तक समता और सम्पन्नता-पृष्ठ 90)। एक शब्द की मृत्यु का मतलब है एक समूची व्यवस्था का मर जाना। एक आदमी की मृत्यु के रिक्त स्थान को दूसरे आदमी से भर पाना संभव है पर एक शब्द की मृत्यु की भरपाई असंभव हैं क्या यह दुःखद नहीं है कि हमारी भाषा के हजारों शब्दों की रोज हत्या हो रही है और सप्रयास की जा रही है, पर इस सबसे हम उसकी तरह बेखबर है जैसे अन्धे आगे किसी हत्या हो और उसे पता ही न चले। हमारे अन्धत्व के मोटे तौर पर दो कारण हैं। एक तो यह कि हमें भ्रम है कि हमारा जो आर्थिक विकास हुआ और आगे भी होगा। दूसरा यह कि अंग्रेजी भाषा के प्रति लगाव ने हमें संज्ञाहीन बना दिया है। जिसके कारण उसके आर्तनाद के स्वर हमारे कानों को सुनाई ही नहीं पड़ते। गुलाम भारत में भारतीय भाषाओं के सामने इतना बड़ा संकट न था जितना बड़ा संकट आजादी के इन 61 वर्षों में पैदा हुआ है या किया गया है। हमारा जो आर्थिक विकास हुआ है वह हमारे यहां मौजूद प्राकृतिक संसाधनों, मेहनतकष किसानांे, मजदूरों और हमारे पुरखों द्वारा दिए गए संस्कारों का सुफल है। इसको गइराई से जांचे बिना नहीं समझा जा सकता। केवल वैष्विक बिलिज, आर्थिक उदारीकरण के कारण ही ये परिवर्तन नहीं आए है। लेकिन ये बातें ऐसे अर्थ मंत्री की समझ में नहीं आएगी जो कहते हैं कि ’भारत कभी सोने की चिड़िया नहीं रहा।’ लेकिन यह बात देष का अपढ़ आदमी भी जानता है कि डाका उसी पर पड़ता है जिसके पास सम्पत्ति होती है। और भारत के सदियों लूट जाने की गाथा सबको विदित है अलावा कुछ तथाकथित आर्थिक चिंतकों के।
आज के युवक की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अंधी आर्थिक व्यवस्था ने उसे धृतराष्ट्र बना दिया है। उसे केवल वहीं सुनाई पड़ता है जो संजय रूपी बाजार का विज्ञापन उसे सुनाते हैं। आर्थिक मोह ने उसकी संज्ञा को इतनी गहराई से जकड़ा है कि उसके विवके ने काम करना बन्द कर दिया है। अब वह उसे बाजार, रोबोट की तरह भी संचालित कर रहा है। विवके के बिना चिन्तन नहीं होता और बिना चिन्तन के जीवन और जगत की पर्तें नहीं खोली जा सकती है और माया का संबंध जीवन और जगत दोनों से है। यह ठीक है कि साक्षरता का प्रतिषत बढ़ा है लेकिन यह भी ठीक है कि इन साक्षरों में ऐसे लोगों का प्रतिषत भी बढ़ा है जिनकी निगाह में जीवन का मतलब केवल सुख के संसाधनांे की भीड़ जमा करना भर ही जीवन है। देष, संस्कृति, भाषा आदि से उनके सरोकार बस उतने ही हैं जो उनके जीवन के खांचे में फिट बैठते हो। आखिर ऐसी मनोदषा वाले नागरिकों के सहारे आप अपनी प्राचीन धरोहर को सुरक्षित रखने का स्वप्न कैसे साकार कर सकते है ? ऐसे में अगर हमारी भाषाओं पर संकट है तो हुआ करे। इन भाषओं का साहित्य मर रहा है, तो मरे हमारी युवा पीढ़ी हर हाल में फीलगुड कर रही है। यह व्यवस्था आज की उपज नहीं है। इसकी जड़ें बहुत दूर तक जाती हैं। इसे पैदा करने में अनेक ऐसे नाम कटघरे में खड़े हरे जते हैं जिन्हें भ्रमवष हम भारत को उद्धारक मान बैठे हैं। अगर सूझबूझ से काम लिया गया होता तो देष के लिए एक नारा उछाल दिया गया है कि ’’हिन्दी विष्व भाषा बनने जा रही है।’’ मित्रों भ्रम में रहने की जरूरत नहीं है। यह नारा छद्म भरा एक वाक्य है। जो ऊपर से आकर्षक लग रहा है पर है यह सफेद झूठ। मैं पूछता हूं कि विष्व भाषा बन रही हिन्दी के साहित्य को जानने और समझने वालों की संख्या निरन्तर घट क्यों रही है ? कितने सुषिक्षित नवयुवक हैं जो हमारे कवियों और लेखकों को पढ़कर समझने का दावा कर रहे हैं। कितने ऐसे नवयुवक हैं जो आर्थिक चकाचैंध को छोड़ भाषा के द्वारा अपना कैरियर बनाने के लिए उद्यत है ? क्या विष्व भाषा बन रही हिन्दी के संबंध में ये प्रष्न महत्व नहीं रखते। यहां हिन्दी प्रदेष के छा़त्रों का यह हाल है  िकवे हमारे रचनाकारों के नाम तक नहीं जानते। हां, अपवाद आप छोड़ दीजिए, मैं समूची व्यवस्था की बात कर रहा हूँ। इन पंक्तियों के लेखक से एक पढ़े-लिखे युवा ने प्रष्न किया था कि महादेवी वर्मा पुरूष है या स्त्री ? क्या अब भी आपको लगता है कि इन्हीं नवयुवकों के सहारे आप भाषायी विजय करने जा रहे हैं। हिन्दी में विज्ञापन इसलिए दिए जा रहे हैं कि विज्ञापनदाता कंपनियों का स्वार्थ इसी के द्वारा पूरा होता है। इन विज्ञापनों को देखकर यह विचार करना गलत है कि हिन्दी का विकास हो रहा है। अभी भारत सरकार के प्रतिष्ठानों में ही शत-प्रतिषत कार्य हिन्दी में नहीं हो रहा है। इस कार्य के लिए संवैधानिक दृष्टि से 15 वर्षों की अवधि निर्धारित की गयी थी। जहां तक बाजार की भाषा का सवाल है, इसके बारे में यह जानना भी ठीक है कि बाबर लिखित बाबरनामा में कहा गया है कि वहां के बाजार में हिन्दी भी एक भाषा थी पर क्या इससे हिन्दी वहां स्थापित हो गयी ?
गांधीजी ने सन् 1935 में इन्दौर में भाषण देते हुए कहा था -’’इस मौके पर अपने दुःख की भी कहानी कह दूं। हिन्दी भाषा राष्ट्रभाषा बने या न बने मैं उसे छोड़ नहीं सकता। तुलसीदास का पुजारी होने के कारण हिन्दी पर मेरा मोह रहेगा ही। लेकिन हिन्दी बोलने वालों में रवीन्द्रनाथ कहां हैं ? प्रफुल्लचन्द राय कहां हैं ? जगदीष बोस कहा हैं ? ऐसे और भी नाम मैं बता सकता हूं। मैं जानता हूं कि मेरे अथवा मेरे जैसे हजारों की इच्छामात्र से ऐसे व्यक्ति थोड़े ही पैदा होने वाले है। लेकिन जिस भाषा को राष्ट्रभाषा बनना है उसमें ऐसे महान व्यक्तियों के होने की आषा रखी ही जायेगी। (गांधी, आम्बेडकर और भारतीय इतिहास की समस्याएं पृष्ठ-6)। इन पंक्तियों में गांधी के दुःख की जो कहानी है वह सन् 2008 तक कितनी और अधिक बड़ी हुई है। पाठक विचार कर सकते हैं। समर्पित हिन्दी सेवियों और सरकार के बीच कोई समन्वय अभी तक नहीं बना।
आम्बेडकर देष के जिस वर्ग की लड़ाई लड़ रहे थे उसका विकास भाषा के प्रष्न से जुड़ा है। विकास की सीढ़ियां जिस अंग्रेजी के सहारे चढ़ी जाती है उससे देष के गरीबों का संबंध नहीं जुड़ पाया। परिणाम यह है कि आरक्षित पदों को भरने के लिए जब परीक्षाएँ ली जाती हैं तो सुपात्र नहीं मिलते और पद वर्षों-वर्षों रिक्त रहते हैं। ऐसे में आरक्षण की मूल भावना की हत्या हो जाती है। ये लोग सुपात्र नहीं थे, यह बात नहीं है बल्कि अंग्रेजी के माध्यम से सुपात्र ढूंढने की व्यवस्था गलत है। जनतंत्र में सब एक व्यवस्था का दूसरे से कैसे अविभाज्य संबंध है इस पर प्रकाष डालते हुए आम्बेडकर ने लिखा था -’’जहां सामाजिक और आर्थिक जनतंत्र न हो, वहां राजनैतिक तंत्र सफल नहीं हो सकता। सामाजिक और आर्थिक जनतंत्र के वे रग और रेषे हैं, जिनसे राजनीतिक लोकतंत्र निर्मित होता है। ये रग रेषे जितने पुष्ट होते हैं, उतना ही शरीर पुष्ट होता है। लोकतंत्र समानता का दूसरा नाम है। संसदीय लोकतंत्र ने स्वतंत्रता के लिए उत्साह दिखाया। लेकिन समानता के प्रष्न की ओर उसने आँख उठाकर भी नहीं देखा। स्वतंत्रता समानता को निगल गयी।’’ (गांधी, आम्बेडकर और भारतीय इतिहास की समस्याएं पृष्ठ-602)। आम्बेडकर जी सामाजिक समानता का जो ऐतिहासिक प्रष्न उठाते है उसका संबंध भाषा से सीधे-सीधे जुड़ता है। सन् 1965 में उत्तर प्रदेष के विधायकों को संबोधित करते हुए हुए डाॅ. राममनोहर लोहिया ने कहा था -’’अंगे्रजी कस हिन्दी से आज भी झगड़ा है। इसलिए नहीं कि उससे हमारे सम्मान को या इज्जत को धक्का पहुंचता है। यह परदेषी भाषा है। लेकिन उससे और बड़ा सबब दूसरा यह है कि यह भाषा पहले की और भाषाओं की तरह हमारे देष को बिल्कुल दो हिस्सों में बांट देती है। एक तो अभिजात और दूसरा साधारण जनता में इतना फर्क हो जाता है। जनतंत्र असंभव है, ऐसी स्थिति में जनतंत्र कहना तो अपने-आपको फुसलावा देना हैं इस बात को छोड़ दीजिए। भाषा की ओर से भी जनतंत्र हमारे देष में हैं नहीं। यह भी अपनी भाषा के बिना संभव नहीं हो सकता है हिन्दुस्तान में। लेकिन इससे भी बड़ा मेरा सबब है और वह यह कि हिन्दुस्तान की गरीबी और उसका अज्ञान है। इन दोनों का शायद सबसे बड़ा कारण अंगे्रजी भाषा का चलन है।’’ (समता और सम्पन्नता पृष्ठ-80) 
हिन्दी, संस्कृति, साहित्य, कला पर चिन्तन मनन करने और विचारों को प्रकट करने वाले सुधीजनों की कमी नहीं है पर जैसे नक्कारखाने में तूती (तुरही) की आवाज सुनी नहीं जा रही है। वैसे ही इनके चिन्तन को दबा दिया जाता है। लेकिन कोई न सुने इससे बात का महत्व कम नहीं होता। जब घना अंधेरा तो छोटा दीप भी महत्ववान होता है। इस 21 वीं सदी में विराट आर्थिक उदारीकरण और विष्वग्राम के भीषड़ नगाड़े की ध्वनि के बीच हमें अपने आवाज को उठाने से कौन रोक सकता है। कौन जाने एक दिन ऐसा आए, जब हमारी भाषाएँ अपना वर्चस्व पुनः स्थापित कर पाएं।

3 comments:

गजेन्द्र सिंह said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ....

भाषा का सवाल सत्ता के साथ बदलता है.अंग्रेज़ी के साथ सत्ता की मौजूदगी हमेशा से रही है. उसे सुनाई ही अंग्रेज़ी पड़ती है और सत्ता चलाने के लिए उसे ज़रुरत भी अंग्रेज़ी की ही पड़ती है,
हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं

एक बार इसे जरुर पढ़े, आपको पसंद आएगा :-
(प्यारी सीता, मैं यहाँ खुश हूँ, आशा है तू भी ठीक होगी .....)
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_14.html

BrijmohanShrivastava said...

आप को सपरिवार दीपावली मंगलमय एवं शुभ हो!
मैं आपके -शारीरिक स्वास्थ्य तथा खुशहाली की कामना करता हूँ

प्रदीप कांत said...

आज का भारत अमरीकीय दृष्टिपथ पर आकार ले रहा भारत है।

________________________

अब यह हमारी आंग्ल भाषिक मानसिकता का परिणाम नहीं तो और क्या है?