Sunday, September 5, 2010

आगामी दस वर्ष और भारत का भविष्य

   भविष्य का आकलन करना निःसंदेह सबसे कठिन कार्य है। लेकिन आज के भारत की नब्ज देखते हुए आगामी दस वर्षों के स्वरूप  के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। आज पन्द्रह अगस्त के दिन सन् 2010 में आगामी दस वर्ष बाद के भारत का आकलन किया जा सकता है। दस वर्ष बाद अर्थात् सन् 2020 में जब हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे होंगे, वह आजादी की 70 वीं वर्षगांठ होगी। आज की तरह ही उस दिन भी हम अपने अमर शहीदों को याद करेंगे और राष्ट्रध्वज को सलामी देंगे। लेकिन इस पूरे कार्य में समर्पण की भावना में  कमी आने की संभावना अधिक है तथा एक कृत्रिमता आने की संभावना ज्यादा है। दस वर्ष बाद समूचे विष्व का परिदृष्य बहुत बदल चुका होगा। जैसा कि पिछले 10 वर्षों में बदला है। आज से 10 वर्ष पहले स्वतंत्रता दिवस और अन्य राष्ट्रीय दिवसों को मनाते हुए जो गरमाहट, समर्पण और अहलाद तथा राष्ट्रीयपन का भाव होता था, वैसा 10 वर्ष बाद दिखाई नहीं पड़ेगा। इसके लिए जहां समय अवधि जिम्मेदार होगी वहीं हमारी षिक्षा तथा मौजूदा नेताओं का चरित्र जिम्मेदार होगा। जिन राष्ट्रीय मूल्यों और उद्देष्यों को लेकर स्वतंत्रता आंदोलन लड़ा गया था, वे मूल्य धाराषायी होते हुए दिखाई पड़ेंगे। क्योंकि आजादी के तुरंत बाद यह राष्ट्र उन मूल्यों की रक्षा के लिए तत्पर दिखाई नहीं पड़ा। इसके लिए एक उदाहरण भाषाओं के संबंध में लेना पर्याप्त होगा। गांधीजी स्वराज्य में या आजाद भारत में अपनी भाषओं को बढ़ता हुआ देखना चाहते थे, क्योंकि उनके लिए आजादी और भाषाई स्वतंत्रता दोनों का एक ही मायने था। इसलिए वे कहते थे -’’ मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम भाषा को राष्ट्रीय और अपनी प्रांतीय भाषओं में उनका योग्य स्थान नहीं देंगे, तब तक स्वराज्य की सब बातें निरर्थक है।’’ (सन् 1918 में इन्दौर में दिए गए भाषण से)। गांधीजी की दृष्टि में प्रांतीय और राष्ट्रभाषा के रूप  में हिन्दी को उचित स्थान न देने का मतलब गुलाम बने रहना जैसा ही था। आजादी के इन 63 वर्षों में भारत की अषिक्षित जनता को न्याय अभी भी उनकी भाषओं में नहीं मिल रहा हैं। आगामी 2040 वर्षों में संसार का भाषाई परिदृष्य कैसा होगा, इस पर यूनेस्को ने एक विस्तृत अध्ययन करवाया है इस अध्ययन में विष्व की सभी भाषाओं के बारे में भविष्य का आकलन किया गया है। भारत की भाषाओं के लिए खतरे की घण्टी बजते हुए सुनाई पड़ रही है। इस रिपोट्र में यह खुलासा किया गया है कि आगामी दशकों में भारत के प्रांतों की भाषाएं समाप्त हो जायेगी। और वे सिमटकर स्थानीय बोलियों के रूप में बचेगी। ऐसा होना निःसंदेह दुःखद होगा, लेकिन ऐसा होना इसलिए तय है क्योंकि आजादी के बाद भारतीय भाषाओं के संरक्षण के उपाय नहीं किये गये। उन्हें रोजगारोन्मुखी नहीं बनाया गया। केवल ऊपरी तौर पर प्रदर्षन कर भाषाओं के संरक्षण का ढोल पीटा गया है। विष्वभाषा के रूप में हिन्दी आगामी 10 वर्षों में स्थापित होते हुए दिखाई पड़ने लगेगी। अंग्रेजी भाषा का साम्राज्य कम होगा। वर्तमान में बाजार की भाषा के रूप में हिन्दी निरंतर ब़ढ़ रही है। भाषा का विकास व्यापार भी तय करता है। केवल साहित्य के सहारे भाषा का विकास नहीं होता। आज बाजारू हिन्दी को देखकर जो जन सोचते हैं कि भाषा के स्वरूप को बिगाड़ा जा रहा है वे देखेंगे कि आगामी 10 वर्षों में हिन्दी को विष्वभाषा के रूप में स्थापित करने में वे ही बाजार और बाजारू हिन्दी सहायक बनेगी। हिन्दी मीडिया, अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग में और आगे बढ़ेगी। और अंग्रेजी के शब्द हिन्दी व्याकरण के साथ आकर उसी तरह हिन्दी भाषा का हिस्सा बन जायेंगे, जैसे अरबी, फारसी, पश्तो, फ्रेंच, इटेली और अंग्रेजी के शब्द पहले से घुले-मिले हंै। 
     भारतीय समाज में तेजी से परिवर्तन आयेगा। सदियों से व्याप्त जातीय भेद-भाव और कुरीतियों से समाज मुक्त होगा। समाज में वैज्ञानिक सोच विस्तार पायेगा . महिलाओं की स्थिति पहले से बदलेगी। महिला सषक्तिकरण का कार्य सकारात्मक परिणाम दिखाएगा। षिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ेगा, लेकिन समाज के सभी वर्गों तक षिक्षा नहीं पहुॅच पायेगी, जिसके कारण एक बहुत बड़ा वर्ग अविकसित अवस्था में जिएगा। यह अषिक्षित वर्ग और दयनीय स्थिति में जाएगा। आर्थिक विकास की यह अंधी दौड़ मनुष्य को स्वार्थी बनाएगी। वह अपने तई और अपने परिवार तक सीमित बनेगा। सामाजिक चिंताओं और राष्ट्रीय सरोकारों से दूर अधिकांष जनसंख्या केवल अपने लिए जिएगी। षिक्षा का उददेष्य मनुष्य को मनुष्यता सिखाने की बजाय केवल नोट कमाने का साधन बनाना भर बचेगा। एक ओर जातीय व्यवस्था कमजोर होगी तो दूसरी ओर धन के आधार पर वर्ग भेद पनपेगा, जो समाज में नये जातीय समीकरणों को पैदा करेगा।
  आगामी 10 वर्षों में एक वैष्विक संस्कृति और एक विष्व भाषा आकार लेने लगेगी। ग्लोबल बिलिज में अपनी-अपनी पहचान बनाए रखने के लिए भाषाएं और संस्कृतियां संघर्ष करते हुए दिखेगी। ऐसे समय में भारतीय संस्कृति अपने वैज्ञानिक तथ्यों पर खरी उतरकर नये स्वरूप में ढलकर विष्व संस्कृति का रूप ग्रहण करने लगेगी। ऐसा इस आधार पर कहा जा सकता है कि विष्व की जो अति-प्राचीन संस्कृतियां हैं, उनमें केवल भारतीय संस्कृति अपने मूल के साथ अनेक आक्रमणों को झेलकर जीवित बची है। इसी आधार पर गांधीजी ने हिन्द स्वराज्य में लिखा था-’’मेरी मान्यता है कि भारत नें जो सभ्यता विकसित की है, वहां दुनिया में कोई नहीं पहुंच सकता, जो बीज हमारे पुरखों ने बोए है, उनकी बराबरी कर सकने योग्य कहीं कुछ देखने मंे नहीं आया। रोम मिट्टी में मिल गया, ग्रीस का नाम भर बचा, मिस्त्र का साम्राज्य चला गया, जापान पष्चिम के शिकंजे में  आ गया और चीन का कुछ कहा नहीं जा सकता। किन्तु इन भग्वावस्था में भी भारत की बुनियाद अभी शेष है। यही शेष बुनियाद विष्व संस्कृति का आधार बनेगी। भारत की योग और आत्याध्मिक खोजें आगामी 10 वर्षों में विष्व मानव के लिए सहारा बनने लगेगी। भारतीय समाज पंडो, पुरोहितों, मौलवियों जैसे पाखंडियोें से मुक्ति पाते हुए प्रतीत होगा, जो सामाजिक समरसता और सामाजिक क्रांति के लिए एक महान कार्य होगा। आज की तुलना में मानव जीवन की गरिमा अधिक सुरक्षित होगी। भारत की वर्तमान पीढ़ी तथा आगामी 10 वर्षों में आने वाली पीढ़ी तकनीकी और प्रबंधन के क्षेत्रों में अपनी दक्षता का लोहा विष्व में मनवाएगी। विष्व के लगभग सभी देषों में दक्ष भारतीयों की उपस्थिति विष्व भर में भारतीय संस्कृति को स्थापित करने में मदद करेंगी। भारत के नये और पुराने ज्ञान-विाान मिलकर एक नये विष्व के निर्माण में सहायक होंगे। वर्तमान परिदृष्य से जिन्हें यह भय है कि कहीं भारत अपनी मूल पहचान न खो दे, वे 10 वर्ष बाद देखेंगे कि भारत अपनी अस्मिता के साथ समझौता किये बिना विष्व को डिक्टेट करेगा, वह दिन हमारे उस ऋषि की परिकल्पना को पूरा करेगा, जिसमें उसने वसुधैव कुटुम्बकम् का स्वप्न देखा था।

2 comments:

अनुनाद सिंह said...

आगामी दस वर्ष भारत के लिये शुभ हों इसके लिये देश के हर व्यक्ति को दो कदम आगबढ़ाना होगा। तभी २०२० में प्रगत भारत का कलाम का सपना पूरा होगा।

जहाँ तक प्रान्तीय भाषाओं के क्षरण की भविष्यवाणी है, भगवान करे वह असत्य सिद्ध हो। देश के कुछ अदूरदर्शी लोगों ने हिन्दी का विरोध किया और अंग्रेजी को यहाँ बने रहने एवं फलने-फूलने के लिये भूमि तैयार की। लगता है कि उस चोत को हिन्दी तो झेल जायेगी किन्तु प्रान्तीय भाषाओं पर जो अदृष्य चोत लगी है वह धीरे-धीरे उनकी अपूरणीय क्षति कर रही है। अब भी चेतने का समय बाकी है। अंग्रेजी को पूरी तरह निकाल फेका जाय। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को क्रमश: केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों की भाषा बनाया जाय। भारत की तकनीकी शब्दावली मुख्यत: संस्क्रित पर आधारित और सभी के लिये समान हो। अधिकांश प्रतियोगी परीक्षाओं में या तो भाषा-ज्ञान की परीक्षा ही न की जाय या अतिसरल प्रश्न पूछे जाँय तथा उस पेपर में केवल क्वालिफाई करने की जरूरत हो ताकि भाषा के आधार पर भेदभाव को रोका जा सके।

जवाहर चौधरी said...

राकेश जी ,
आपकी चिंता वाजिब है .
किन्तु आगे आने वाला समय और भी कारणों से बदला हुआ दिखाई देगा .
विशेषकर हमारी जनसँख्या .
हम २०३५ में चीन से आगे निकलने वाले है . २०३५ में भारत दुनिया का
सबसे ज्यादा जनसँख्या वाला देश होगा . उस वक्त हम केक में पड़ी इल्लियो जैसे होंगे . तब गे भाषा की नहीं शायद रोटी की चिंता में दुबले हो रहे होंगे .
बहरहाल , भविष्य की कल्पना बहुत डरावनी है . भगवान भली करे .

* जवाहर चौधरी