Friday, April 30, 2010

आचर्य रजनीश की जुबानी


एक अंधेरी रात में मैं आकाश के तारों को देख रहा था । सारा नगर सोया हुआ था । उन सोये हुए लोगों पर मुझे बहुत दया आ रही थी । वे विचारे दिन भर की अधूरी वासनाओं के पूर्ण होने के स्वपन ही देख रहे होंगे । सुवप्न में ही वे जागते हैं , और सुवप्न में ही सोते हैं न वे सूर्य को देखते हैं , न चाँद को न तारों को । वस्तुतः जो आखें स्वप्न देखती हैं ,वे उसे नहीं देख पातीं । सत्य को देखने के लिए आखों से सुव्प्न को दूर हटाना पड़ता है
रात्री जैसे -जैसे गहरी होती जाती थी , वैसे -वैसे आकाश मैं तारे बड़ते जाते थे । धीरे - धीरे पूरा आकाश ही उसमें जगमग हो उत्ता था । और आकाश ही नहीं , उनके मौन सौन्दर्य से मैं भी भर गया था । आकश के तारों को देखते -देखते क्या आत्मा का आकाश भी तारों से नहीं भर जाता ?वस्तुता मनुष्य जो देखता है , उसी से भर जाता है । क्षुद्र देखने वाला क्षुद्र से भर जाता है , विराट को देखने वाला विराट से । आखें आत्मा के दुआरे हैं ।
मैं एक पेड़ से टिका आकाश मैं खोया ही था की तभी किसी ने पीछे से आकार मेरे कंधे पर अपना तंडा और मुर्दा हाथ रख दिया । उसकी पग ध्वनियाँ भी मुझे सुनाई पड़ी थीं । वे ऐसी नहीं थी ,जैसी किसी जीवित व्यक्ति की होनी चाहिए , और उसका हाथ तो इतना निर्जीव था की अँधेरे में भी उसकी आँखों में भरे भावों को समझने में मुझे देर न लगी । उसके शरीर का स्पर्श उसके मन की हवाओं को भी मुझ तक ले आया था । वह व्यक्ति तो जीवित था और युवा था , लेकिन जीवन कभी का उससे विदा ले चुका था , और यौवन भी सम्भवता उसके मार्ग पर अभी आया ही नहीं था।
हम दोनों तारों के नीचे बैठ गये थे । उसके मुर्दा हाथो को मैंने अपने हाथो में लेलिया था , ताकि वे थोड़े गर्म हो सकें , और जीवन -ऊष्मा भी उनमें प्रवाहित सके । सम्भवता वह अकेला था । और प्रेम उसे जिला सकता था ,निश्चय ही ऐसे समय में बोलना उचित नही था सो मैं चुप ही रहा । ह्रदय मौन में ही ज्यादा निकटता पाटा है । और शब्द जी घावों को नहीं भर सकते मौन उन्हें भी स्वस्थ करता है । शब्द और ध्वनियाँ तो पूर संगीत में बिघ्न और वधाएं हैं । रात्री मौन थी , और मौन हो गयी । उस शुन्य संगीत ने हम दोनों को घेर लिया था । वह अब मुझे अपरचित नहीं था । । उसमें भी मैं ही था । जड़ता टूटी और उसके अशुओं ने खबर दी की वह पिघल रहा था । वह रो रहा था । ओर उसका सारा शरीर कांप रहा था । उसके ह्रदय में जो हो रहा था , उसकी तरंगें उसके शरीर तन्तुओं तक आ रहीं थी वह रोता रहा------ रोता रहा----रोता रहा और फिर बोला ; मैं मरना चाह्ताहूँ । मैं अत्यंत निर्धन और निराश हूँ । मेरे पास कुछ भी तो नहीं है ।
मैं थोड़ी देर और चुप रहा ओर फिर धीरे - धीरे मैंने उससे एक कहानी कही -मैंने कहा -- मित्र मुझे एक कथा स्मरण आती है । एक फ़कीर से किसी युवक ने जाकर कहा । 'परमात्मा ने सब कुछ मुझ से छीन लिया है । म्रत्यु के अतिरिक्त मेरे लिए अब कोई मार्ग नहीं है ।क्या वह युवक तुम ही तो नहीं हो ?

उस फ़कीर ने युवक से कहा ; मैं तो तेरे पास छिपा हुआ एक खजाना देख रहा हूँ । क्या उसे बेचोगे ?उसे बेच दे तो तेरा सब काम बन जाये । और परमात्मा की बदनामी भी न होगी .तुम वह युवक हो या नही , पता नही लेकिन फकीर मैं वही हूँ और लगता है की कहानी फिर से दुहरा रही है । वह युवक हैरान हुआ था और शायादतुम भी हैरान हो । उसने पूछा था खजाना मेरे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है ' इस पर फ़कीर हंसने लगा और बोला : "चलो मेरे साथ बादशाह के पास चलो बादशाह बड़ा समझदार है । छिपे खजानों पर उसकी सदा से ही नजर रही है । वह जरुर ही तुम्हारा खजाना खरीद लेगा ।
वह युवक कुछ भी नहीं समझ पा रहा था । उसके लिया तो फकीर की सारी बातचीत ही पहेली थी । लेकिन फिर भी वह बादशाह के महल के तरफ चला । मार्ग में फकीर ने उससे कहा ; कुछ बातें पहले से ही तय कर लेना आवश्यक है ,ताकि बादशाह के सामने कोई झन्झट न हो । वह बादशाह ऐसा है की जो चीज उसे पसंद हो फिर किसी भी मूल्य पर छोड़ता नहीं है । इसीलिए यह भी जान लेना जरुरी है की तुम उस चीज को बेचने को राजी भी हो या नही ? वह युवक बोला :कौन सा खजाना ?कौन से चीजें ?फकीर ने कहा की जैसे तुम्हारी आखे । इन का क्या मूल्य लोगे ?मैं ५० हजार तक बादशाह से दिला सकता हूँ । क्या यह रकम पर्याप्त नहीं है ?या जैसे तुम्हारा ह्रदय या दिमाग , इनके लिए -एक लाख मिल सकते हैं । वह युवक हैरान हुआ और अब लगा की फ़कीर पागल है । बोला क्या आप पागल हो गए हैं ?आप यह क्या कह रहे हैं ? मैं इन्हें किसी भी मूल्य पर नहीं बेच सकता । और मैं ही क्या कोइ भी नहीं बेच सकता । फ़कीर हंसने लगा और बोला -- मैं पागल हूँ या तू । जब तेरे पास इतनी बहुमूल्य चीजें हैं , जन्हें तू लाखों मैं भी नही बेच सकता , तू झूट में निर्धन क्यों बनता है ? जो खाजाना उपयोग नहीं आता वह भरा हुआ भी खाली है और जो उपयोग में आता है खाली भी हो तो भर जाता है । परमात्मा खजाने देता है , अकूत खजाने देता है , लेकिन इसे खोजना और खोदना स्वंम ही पड़ता है । जीवन से बड़ी कोई सम्पदा नहीं है । जो उसमे ही संपदा नहीं देखता ,वह सम्पदा कहाँ पा सकता ?रात्री आधी से ज्यादा बीत चुकी थी । मैं उठा और मैंने उस यूवक से कहा - " जाओ और सो जाओ । सुबह एक दूसरे ही व्यक्ति के भांति उठाना । जीवन वैसा ही है जैसा हम उसे बनाते है । वह मनुष्य की अपनी रचना है । उसे हम म्रत्यु भी बना सकते है और अमृत भी । सब कुछ स्वयं के आलावा और किसी पर निर्भर नहीं है । फिर म्रत्यु तो अपने आप आएगी । उसे बुलावा देने की ज़रूरत नहीं । बुलाओ अमृत को । पुकारो परम जीवन को । वह तो श्रम से , शक्ति से , संकल्प से और साधना से हे मिल सकता है । " { ओशो - मिटटी के दिए से साभार }

3 comments:

BrijmohanShrivastava said...

प्रिय शर्मा जी आपकी चन्द्रसेन विराट की पुस्तक पर समीक्षा पढी ,बहुत अच्छी लगी पुस्तक के वारे मे जानकारी देने का धन्यबाद । आपके सारे लेख पढना है । शुरु शुरु मे मुझे एसा लगा था कि शायद आपने लिखना बन्द कर दिया है इसीलिये इसलिये मै नियमित पाठक नही रह सका मुझे याद है दिसम्बर २००८ को इन्दोर मे आपसे टेलीफ़ोन पर चर्चा हुई थी आपके ८ दिसम्बर के लेख वाबत फिर शायद २००९ में मै बराबर देखता रहा ,पांच जनवरी और ११ मार्च के दो लेख देखे परन्तु शायद आपसे चर्चा नही हो पाई इसके बाद नियमित देखता रहा और आपके लेख नही मिले ।और आज जब आपका ब्लोग खोला तो लगा मै इन दिनों एक अच्छा साहित्य पढने से बंचित रहा ।पहले तो आपके पूरे लेख पढ लूं आजकल नरसिंहगढ मे डेरा डाले हुये है जहां १२ घन्टा लाइट की कटोती होती है और अक्सर इन्टर्नेट का सरवर भी गड्बड करता रहता है ।ओशो को भी पढा ,गहन चिन्तन है ,बहुत गहराई है ,मुझे भी इनको पढने का शौक है पहले तो ओशो टाइम्स और ओशो वर्ल्ड कभी कभी पढ लिया करता था आज कल तो उनसे भी महरूम हूं

जवाहर चौधरी said...

राकेश भाई ,
आशो की बहुत अच्छी कथा का
चयन आपने किया है ।
कई बार निराशा दूर करने के लिये ऐसी ही
कथाओं से प्रेरणा मिलती है ।
ओशो का साहित्य तो अनुपम है
यदि आप चाहें तो आपका ब्लाग इससे
ही समृद्ध बना रह सकता है ।
लेकिन अच्छा हो कि आप आशो पर एक अलग ही ब्लाग
रचें ।

प्रदीप कांत said...

गहन चिंतन