Monday, April 18, 2011

नई उदभावनाओं का बे जोड़ कवि , श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया

कविता का उद्देश्य न तो केवल मनोरंजन करना है और न केवल विचार या विचार धारा  का प्रचार करना भर  है .जब -जब कविता से यह गुलामी करवाने का निंदनीय प्रयास किया गया है , तब - तब वह समाज की मुख्य धारा      से कट गयी है . इसका एक  बड़ा उदाहरण मुक्ति बोध और अज्ञेय जैसे कवियों से लिया जासकता है . ये  बड़े कवि हैं परन्तु अकेडमिक रूप से मूल्यांकित हैं , जनता में उस तरह से स्वीकृत और मूल्यांकित नहीं है जैसे  तुलसीदास   ,   निराला ,  कबीरदास  हैं . गिरेन्द्र सिंह  की कविता पर  बात  करते  हुए मेरा कोई  उद्देश्य इनकी तुलना उक्त कवियों से करने की नहीं है . आज की कविता विचारों से लदी     फंदी  और ऊबड़ खाबड़ है की मानो पाठक और श्रोता को कोई रस ही नहीं  दे पाती ,ऐसे समय में कविता के सरस रूप की जरूरत है , एक तो आज का आदमी अपने जीवन के बोझ से दबा हुआ है ऊपर से असंस्कारित कविताई उसे और नीरसता में डुबोती है इस कारण साहित्य से  उसकी दूरियां  और बढती  जारही हैं .
       गिरेन्द्र सिंह  भदौरिया की कविता में इन बातों के विपरीत प्रक्रति का सानिध्य है , कल्पना की सुकोमलता है और जीवन के साथ इनका तादात्म . कविता जब तक पाठक का मन रंजित करते हुए उसे जीवन के धरा तल से ऊपर ना  उठए तब तक वह किसी काम की नहीं होती . गिरेन्द्र  सिंह की कविताओं में यह ताकत है देखें -----'' पंथी का गंतव्य , गत्य  तक नहीं / गत्य से आगे भी है . ...... जीवन का उद्देश्य , म्रत्यु तक नहीं , म्रत्यु से आगे भी है ' कोई कठिनाई पैदा किये बिना कवि अपनी बात पाठाक तक भेज देता है .  समाज की जिम्मेदारी जिन पर थी वे सब अपना उत्तर दायित्व भूलकर अपने पेट की आग बुझाने में लगे हुए हैं कवि ने लिखा '' खेतों को बागड निगलती जा रही है ''   सब तरफ भ्रष्टाचार फैला है और सब परेशान लेकिन मौन हैं ,ऐसे समय में कवि लिखता है --- '' धारा मुख्य बना सन्नाटा , मौन प्रमुख प्रहरी हैं''' और भी --''अब तो बलिदानी भावों को , पागल पन कहते हैं .'' एक कवि ही तो है जो हर युग में स्वम तो जागता  ही है समाज को भी जगाता रहता है ----'' अनाचार की जिस आंधी में / दानवता मुहं खोल  रही है ..... सुधी जानो के मध्य रक्त से सनी लेखनी बोल रही है ''
         गिरेन्द्र सिंह की कविता में प्रयुक्त कुछ उपमाएं  देखें , यह उपमा चांदनी के लिए की गई है '' धूप हिम से निकल जर्द पीतल हुई , अग्नि गर्भा सुता सर्द शीतल हुई .''  ऐसी उपमा अन्यत्र न मिलेगी जहां चांदनी को धूप से निकला हुआ कहा गया हो . एक उपमा और देखिये ---''या के केशर मिलाया हुआ दूधिया / दिव्य आलोक  इस लोक ने पी लिया .'' अब आप कल्पना कीजिए और तुलना भी करें की चांदनी का रंग और केशर मिले दूध में कैसी बेजोड़ समानता है .इसी क्रम में एक और उपमा देखिये ---'' मानो उबटन लगाए हुए बिजलियाँ / बिछ  गईभूमि पर छोड़ कर बदलियाँ .'' बिजली जब  बादलों में कौन्धिती तब वह सफेद होती है परन्तु चांदनी पीला पन लिए होती है .इसी लिए कवि ने बिजली को उबटन लगा कर पीला किया है और उसे चांदनी के रूप में प्रतुत किया है . यथार्थवादी इसे नही मानेगे परन्तु इस सबसे कविता का मूल्य कम नहीं हो जाता .  ''बादल को धन्य बाद '' कविता में ऐसी ही अनेक उपमाएं पाठाक का मन मोहती हैं .
               केवल आलोचक की प्रशंसा पा कर कोई बड़ा कवि नहीं बन सकता , जब तक की कवि को जनता का , पाठाक का पूरा आशीर्वाद न मिले . हमारे समय के कवि श्री गिरेन्द्र सिंह  भदौरिया के पास श्रोता भी हैं और पाठक भी . उम्मीद है क़ि उनसे भविष्य में बहुत मर्म स्पर्शी कविताएँ हिन्दी के पाठकों को मिलेंगी .....

1 comment:

मुकेश कुमार तिवारी said...

प्रिय राकेश जी,

बहुत अच्छा परिचय कराया श्री गिरेन्द्र सिँह जी भदौरिया साहब से। उनके साहित्य के बारे में विशेषतः कविता और उनमें प्रयुक्त अनुपम उपमाओं के बारे में सोचते हुए डूबता चला गया सुन्दर साहित्य-शिल्प में।

बहुत दिनों के बाद आपसे मुखातिब हुआ हूँ, इन्दौर में रहते हुए भी बात नही हो पायी, शायद यह हमारे दौर का सच है कि हम अपने-आप से ही पराये हुए ज रहे हैं।

लेकिन यह क्रम हमें ही तौड़ना होगा.......

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी