Monday, April 25, 2011

विमर्श के नये क्षितिज तलाशती पुस्तक '' नागार्जुन संवाद ''

नागार्जुन के जन्म  सती वर्ष के उपलक्ष्य में पूरे देश में अनेक आयोजन हुए . श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति , इन्दौरे  ने डॉ विजय बहादुर सिंह को व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया . डॉ विजय बहादुर सिंह सुविख्यात आलोचक और लेखक और कवि हैं . हमारे समय के सवालों से सबसे सबसे अधिक व्यापकता के साथ उठाने वाले वे अकेले आलोचक दोखाई पड़ते हैं ..  नागार्जुन संवाद उनकी एक बहुत महत्वपूर्ण  पुस्तक है . कवि नागार्जुन को समझने और साहित्य अनेक पक्षों पर चिंतन करने के लिए इस पुस्तक में प्रचुर सामग्री है . संवाद शैली में लिखी गयी यह पुस्तक , शोधार्थियों , लेखकों को जरूर पढनी चाहिए . लेखक की प्रतिब्ध्ता के वारे में नागार्जुन यह कथन  देखिये   '' कैसा भी विश्लेष्ण हो , कवि को सीमित कर देता है और काल क्रम में विशेषण झरते चलते हैं . '' [ प्रष्ठ 18 ]
                 आलोचक विजय बहादुर सिंह अनेक सवाल नागार्जुन से करते हैं जिनके बहुत महत्वपूर्ण
 उत्तर  इस पुस्तक में उपलब्ध हैं ,
 पुस्तक ----- नागार्जुन संवाद
  संपादक ----- डॉ विजय बहादुर सिंह
   मूल्य ------- रु -- 150
    प्रकाशक ---- बाक्स korogetrs एंड प्रिंटर्स
                          गोविन्द  पुरा भोपाल , [ मध्य - प्रदेश ]

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