बुधवार, 14 मई 2014


    'समय के हस्ताक्षर

पुस्तक समीक्षा  -ओम द्विवेदी

परंपरानुसार आलोचक किसी कवि या कहानीकार पर बोलता, लिखता और मत व्यक्त करता रहा है। अपनी कसौटी पर कसकर उसे पुरस्कृत या दंडित करता रहा है। आलोचना के कई घराने किसी भी रचना को स्वीकृत या अस्वीकृत करने के फतवे जारी करते रहे हैं। यह भ्रम भी रहा है कि आलोचना की कसौटी पर कसकर ही कोई रचना कुंदन बनती है और फिर पाठकों के गले का हार। साहित्यिक परंपरा आलोचक को बहुत श्रेष्ठ मानती है। वह ज्ञान का बड़ा ख़ज़ाना है। इतना बड़ा कि उसके सामने रचनाकार अपने को बौना मानता है। आलोचक स्वयं को ज्ञान की इतनी ऊंचाई पर रखता है कि रचनाकार को तुच्छ समझता है। रचनाओं की शल्यक्रिया से रचनाकार घबराता है। हालांकि इस प्रक्रिया से गुज़रकर कई बार श्रेष्ठ रचनाएं बनती हैं तो कई बार रचनाकार अवसाद में चला जाता है और लिखना ही बंद कर देता है। केवल कवि या लेखक नहीं, बल्कि खुद आलोचक भी इसका शिकार होता है। ज़्यादातर आलोचक अपने लेखन की प्रारंभिक अवस्था में या तो कवि थे या कहानीकार, जैसे-जैसे उनके भीतर आलोचक बड़ा होता गया, कविता और कहानी की अकालमौत होती गई।
राकेश शर्मा आलोचकों की उस खलनायक वाली छवि से बिलकुल अलग हैं। उनका ज्ञान किसी दंड की तरह नहीं है, वह घात लगाए नहीं बैठा रहता कि कोई मिले और दे मारें उसके सिर पर। उनका ज्ञान मित्र की तरह रचनाकारों की मदद करता है, कबीर के कुम्हार की तरह भीतर हाथ रखकर बाहर आहिस्ता-आहिस्ता चोट करता है। अपना समूचा ज्ञान, हुनर घड़ा बनाने में समर्पित करता है। वे दूसरे आलोचकों से इसलिए भी अलग हैं क्योंकि उन्होंने लेखन की शुरुआत कविता से की और आज तक उसे बनाए रखे हुए हैं। वे लेखन की तमाम विधाओं को एक साथ साधे रहते हैं। कविता लिखते हैं तो आलोचक दूर खड़ा चौकीदारी करता है और जब आलोचना में लीन होते हैं तो कविता दूर खड़ी मुस्कुराती है। तलवार की धार पर चलते ही नहीं हैं, बल्कि दौड़ते हैं। इसीलिए दो संग्रह कविताओं के आते हैं तो दो निबंधों और आलोचनाओं के।
उनसे होने वाली बातचीत और बहसों के कारण ही यह किताब 'समय के हस्ताक्षर' मुझे किसी भी समय नई नहीं लगती। जो विषय बातचीत करते समय उनकी चिंता में रहते हैं, खाना खाते समय, चाय पीते समय या सफ़र करते समय वे जिन विषयों को समझते और समझाते रहते हैं, उन्हीं विषयों को वे अपने लेखन में शामिल करते हैं। जिन परंपराओं और मूल्यों को मानने का आग्रह वे लोक से करते हैं, उन्हें ही मानने के लिए वे पत्नी, बेटे, बेटी और खुद से भी करते हैं। इस तरह उनके जीवन और लेखन में पारदर्शिता भी है और विश्वसनीयता भी। जैसा कि किताब खुद मुनादी करती है कि इसके आलेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं, इसलिए भी पाठक जब अपनी स्मृतियों के दरवाज़े खटखटाएगा तो ये उसे पढ़े हुए और अपने से लगेंगे।
आलोचक की तरह नहीं, बल्कि एक पाठक की तरह पढ़ने पर यह किताब चार सर्गों में मेरे सामने खुलती है। ये चारों सर्ग, चारों अध्याय राकेश शर्मा की रुचियों के भी अध्याय हैं। 'समय के हस्ताक्षर' की सबसे बड़ी चिंता है भाषा, साहित्य और लिपि। किताब के 48 निबंधों में लगभग 14 निबंध इसी विषय के आसपास हैं। हमारे समय में साहित्य की स्थिति क्या है? साहित्य किस तरह समाज के हाशिए पर जा रहा है? देवनागरी लिपि पर किस तरह रोमन का तीखा आक्रमण हो रहा है? अंग्रेजी किस तरह हिन्दी पर हमले कर रही है? सत्ता किस तरह भाषा को आकार देती है? शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता का रिश्ता क्या है? लेखक, प्रकाशक और पाठक का क्या नाता है? इन तमाम विषयों पर बार-बार अलग-अलग सिरे को पकड़कर लिखते हैं और हमारी समझ साफ करते हैं -'आज का आदमी केवल साहित्य से ही नहीं कटा है, बल्कि समूचे संवेदना संसार से कट रहा है। वह अपनी निजी चिंताओं को लेकर अंतर्मुखी है। बहुजन हिताय की भावना संकुचित हुई है, जबकि साहित्य का केंद्र बिंदु ही बहुजन हिताय है। आज का मनुष्य संवेदना से इतना कट गया है कि कभी-कभी तो वह अपने आप से कटा हुआ दिशा भ्रमित है। यह परिवर्तन अनिवार्य रूप से ही है। यह धूल और धुंध भी छंटेगी और भौतिकता का भूत मनुष्य के सिर से उतरेगा। इस कठिन समय में साहित्कार को अपनी सच्ची साहित्यिक आस्था के साथ आशावान होकर डटे रहने की जरूरत है, लेकिन सच्चे साहित्यकार के पूरे संस्कार लेकर ही।' (साहित्य से दूर भागता समाज)

राकेश शर्मा नाम का लेखक कोई किताब लिखे और उसमे राम और रामविलास शर्मा न हों, ऐसा हो नहीं सकता। यहां भी दोनों अपनी गरिमा के साथ उपस्थित हैं। राम शर्माजी के आध्यात्मिक आराध्य हैं तो रामविलासजी साहित्यिक। आज भी हमारे उद्धारक हैं राम आलेख में वे कभी तो सीधे तौर राम को समाज का संकटमोचक मानते हैं तो कभी तुलसी, कबीर, गांधी और मैथिलीशरण गुप्त के माध्यम से वहां तक पहुंचते हैं। संग्रह के छह निबंध मेरे इस कथन की गवाही देंगे- 'आखिर राम की कथा में ऐसा क्या है जो इतने बड़े कालखंड को पार कर यह कथा आज भी हमारे जीवन को प्रेरणा देती है। राम की कथा में मानवीय जीवन के सभी पक्ष और एक आदर्श जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। एक शासक के रूप में राम को हमेशा कोड किया जाता है और आदर्श राज्य के रूप में रामराज्य की परिकल्पना की जाती है।' (राम ही हैं हमारे उद्धारक)  इसी तरह वे समय और समाज को रामविलासजी की दृष्टि से देखते हैं। उनकी नज़र से ऋग्वेद को देखते हैं, हिन्दी प्रदेश और आलोचना के सरोकारों को देखते हैं- 'डॉ. रामविलास शर्मा भारतीय समाज को एक समतामूलक समाज बनाने का सपना सहेजे थे। मार्क्सवाद की समतामूलक अवधारणाओं के सहारे वे इसे पूरा होते देख रहे थे और इसे पूरा करने के लिए वे जीवनभर जुटे रहे। अनेक स्थानों पर उन्होंने मार्क्स की स्थापनाओं से असहमतियां प्रकट कीं और यह स्थापना दी कि भारतीय संदर्भों में यह सब उचित मालूम नहीं पड़ता। उनके लिए मार्क्सवाद एक प्रकाश श्रोत की तरह था। हारिल की लकड़ी बनाकर उसे जकड़कर नहीं बैठे। (डॉ. रामविलास शर्मा के आलोचकीय सरोकार) ये उनकी किताब का दूसरा अध्याय है।
'समय के हस्ताक्षर' की तीसरी बड़ी चिंता है बाज़ार। बाज़ार का पैशाचिक स्वरूप जिस तरह से हमारी परंपराओं, संस्कृतियों और मूल्यों को निगल रहा है, उसे समझने में किताब मदद करती है। किताब का पहला ही निबंध है-स्त्री को बदलती चंचला पूंजी। पूंजीवाद ने स्त्री को किस तरह से स्त्री को उत्पाद में बदला है? वह परंपरागत शर्म और हया छोड़कर विज्ञापन की वस्तु बन गई है। तमाम स्त्रियों का आदर्श भी वह अपने इसी स्वरूप में बन रही है। मदर टेरेसा और लक्ष्मीबाई जैसे आदर्श पर्दे के पीछे जा रहे हैं, आलेख आत्मावलोकन के लिए बाध्य करता है। बाज़ार का यह आक्रमण केवल स्त्रियों पर नहीं है, बल्कि पुरुषों के उस सोच पर भी है जो केवल वहीं सोचना, देखना और पाना चाहता है। हमारी सनातन परंपराओं को बचाए रखने के लिए वे परंपराओं के वैज्ञानिक पक्ष और संस्कार की ज़रूरत आदि पर लिखते हैं- 'घूंघट, साड़ी, बुरका जैसे परंपरागत परिधानों को पूंजीवाद ने स्त्री की गुलामी का प्रतीक और उसकी प्रगतिशीलता का विरोधी बताकर उसके मन को इतना बदल दिया है कि वह इन्हें छोड़ने के लिए छटपटाने लगी है। यहां साड़ी, घूंघट और बुरका से आशय यह नहीं है कि स्त्री को वापस आदिम युग में भेजने की वकालत की जा रही है। कम से कम वस्त्र धारण कर वह स्वतंत्र और आधुनिक नारी में परिवर्तित होने के लिए उत्कंठित दिखाई दे रही है। महाभारत की कहानी में द्रोपदी का चीर दु:शासन खींचता है। दु:शासन सामंतवादी व्यवस्था का उदाहरण है। जहां स्त्री को नग्न देखने की लालसा में पुरुष छद्म कृत्यों और बाहुबल का प्रयोग करता है। पूंजीवाद में पुरुष की इस लालसा की पूर्ति पूंजी करने लगी है।' (स्त्री को बदलती चंचला पूंजी)

पुस्तक के चौथे सर्ग में राकेश शर्मा के वे तमाम सरोकार हैं, जो साहित्यकार और एक जागरूक नागरिक होने के नाते ज़रूरी हैं। साहित्यकार जब दो खेमों में बंटता है, तो वह दूसरे घाट पर बैठे साहित्यकार और पाठक की तरफ देखना भी नहीं चाहता। राकेशजी के यहां यह दुराग्रह नहीं है। वे अगर तुलसी, राम और रामविलास शर्मा पर झूमकर लिखते हैं तो मुक्तिबोध और शमशेर बहादुर सिंह पर भी उसी तन्मयता से लिखते और बोलते हैं। उनकी विचारधारा और उनके अवदान को सम्मान देते हुए ही वे उन्हें याद करते हैं। स्वदेशी, मार्क्सवाद, आंबेडकरवाद जैसी विचारधाराओं को भी वे समय की कसौटी पर कसते हैं। उनके लेखन में अगर भारत के अतीत की गौरवगाथा है तो वर्तमान में हवा और पानी में घुलते ज़हर की चिंता भी है।
कुल मिलाकर 'समय के हस्ताक्षर' समय पर हो रहे आक्रमण, भाषा और साहित्य, परंपराओं और मूल्यों को समझने में हमारी मदद करती है। हो सकता है यह कोई इंक़लाब न खड़ा करे, लेकिन इसे पढ़ते हुए पाठक के भीतर बदलाव की छटपटाहट ज़रूर महसूस होगी। यह कोई नया मार्ग भले न बनाए, नया पंथ न दे, लेकिन जब हम अपनी राह से भटकने लगेंगे तो हमे रोकेगी जरूर। कुपंथ पर जाने से बचाएगी। यह सयम की शल्यक्रिया है। समय का भाष्य है।

समय के हस्ताक्षर
लेखक-राकेश शर्मा
मूल्य-195 रुपए
प्रकाशक-रंग प्रकाशन, 33-बक्षी गली, राजबाड़ा इंदौर-452004


बुधवार, 30 अप्रैल 2014

वर्तमान और अतीत के बीच पुल बनाती कविताएँ
राकेश शर्मा

जब कविता शौकिया और कवि जैसा दिखने के लिए लिखी जाती है तब उसकी तहसीर निरर्थक और निरुद्देश्य होती है। जब कोई कविता कवि की बेबसी और बेचैनी के कारण सृजित होती है तब वह पाठक के मन और प्राणों को स्पन्दित करती है। ब्रजेश कानूनगो के लिए कविता लिखना इसी बेबसी और बेचैनी का परिणाम मालूम पडता है। उनके हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह ‘इस गणराज्य में’ की कविताओं को पढते हुए सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कवि ने इन विचारों को यदि कागज पर न उतारा होता तो इनका बोझ कवि के मानस पर स्थायी रूप से प्रभाव जमा लेता। कवि ब्रजेश के लिए कविता जीवित बने रहने के लिए एक उपाय और जरूरी उपकरण की तरह प्रतीत होती है। कवि के अपने व्यक्तित्व की भरपूर परछाई इन कविताओं में नजर आती हैं। कोई भी रचना उसके रचनाकार के व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब होती है। कविताओं को पढते हुए यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि कवि ब्रजेश इस संसार को कैसे देखते हैं और उसके मौजूदा परिवेश में क्या परिवर्तन चाहते हैं।
कवि के मानस में बचपन और गुजरे समय  की मधुर यादें बहुत मजबूती के साथ चस्पा हैं। अतीत के खंडहरों में बैठा उनका कवि मन वहाँ जमी धूल और धुन्ध के बीच बीते समय की तस्वीरें देखता रहता है। हर दिन कवि एक अच्छी सुबह की प्रतीक्षा करता दिखाई देता है। कविता का जन्म कवि के मन में किसी भूकम्पीय हलचल की तरह होता है---

भूकम्प के बाद एक और भूकम्प आता है हमारे अन्दर/विश्वास की चटटाने बदलती हैं अपना स्थान/ खिसकने लगतीं हैं विचारों की आंतरिक प्लेंटें/ मन के महासागर में उमडती हैं संवेदनाओं की सुनामीं लहरें/ तब होता है जन्म कविता का।   (भूकम्प के बाद)

इन कविताओं में मौजूद स्मृतियाँ और अतीत कवि के लिए एक धरोहर है। वह अपने इतिहास से वर्तमान को बाँधे रखना चाहता है। ये कविताएँ वर्तमान और अतीत के बीच एक खूबसूरत सेतु बनाती हैं,जिस से गुजर कर पाठक यह जानने समझने में समर्थ होते हैं कि जिस समाज और समय से वे आज रूबरू हो रहे हैं उसका पुराना चेहरा कैसा हुआ करता था,देखिए इन पंक्तियों में –

धराशायी मकान की भस्म पर खडी हो गई है ऊंची इमारत/जिसकी ओट में छुप गया है नीला कैनवास/पतंग के रंगों से बनते थे जहाँ /स्मृतियों के अल्हड चित्र/ वैसा ही हो गया है मेरा मुहल्ला/जैसे कोई कहे कितना अलग है तुम्हारा छोटा बेटा।  (मेरा मुहल्ला)

यह कविता हर पाठक के साथ खडी दिखाई देती है। हम सब का अतीत इस तस्वीर में कैद है। कोई विकासवादी और व्यावहारिक व्यक्ति यह प्रश्न उठा सकता है कि खंडहरों  के बहुमंजिला ईमारतों में बदल जना तो विकास का प्रतीक है, शुभ संकेत है। लेकिन यहाँ कवि की चिंता उस विकास पर है जिसने हमारे मूल्यों और सामाजिक चेतना की बलि लेते हुए प्रगति का शंखनाद किया है। इस दृश्य से पाठकों को रूबरू कराना कवि का अभीष्ठ भी है।

जड और चेतन , मनुष्य और जीव जंतु, सभी के सामंजस्य से यह दुनिया कायम है। कविता ही यह ठिकाना है जहाँ जड चेतन का भेद समाप्त हो जाता है। जहाँ भावनाओं का मानवी करण सम्भव है ,जड में जान फूंकी जा सकती है। ब्रजेश की कविताओं में यह साकार हुआ है।

कांपते हैं जब सूरज के हाथ-पाँव/ कुहरे को भेदता हुआ/ठंडी हवा के साथ आता है मजा।
उड जाता है न जाने कहाँ/गुलाबी अनंत में चिडियों के साथ/छुप जाता है किसी बछडे की तरह/ घर लौटते रेवड में/ उडती हुई धूल के बीच दिखाई देती है/ मजे की झलक। 
(मजे के साथ)

आज जब मानवीय सम्बन्ध भी टूटने की कगार पर हैं ऐसे में यह संकल्पना कि जीव-जंतु भी हमारी जीवन यात्रा के सहयात्री हैं,बहुत सार्थक सन्देश है। मनुष्य के होने और बने रहने में प्रकृति,पेड-पौधों की अपनी भूमिका है। ब्रजेश की कविता इस बात को समझती है और समरसता का भाव-बोध कराती है। देखें-

जिस घर में रहता हूम/कैसे कहूँ कि अपना है।
चीटियाँ,कीट-पतंगे और छिपकलियाँ भी रहती हैं यहाँ बडे मजों से/
उधर कुछ चूहों ने बनाया है अपना बसेरा/ट्यूब लाइट की ओट में पल रहा है चिडियों का परिवार।  (कैसे कहूँ कि घर अपना है)

ब्रजेश की कविताओं का दायरा घर-परिवार से लेकर वैश्विक चिंताओं तक विस्तृत है। किसान के जीवन में सोयाबीन की फसल की भूमिका, ‘क्विज’ जैसे कार्यक्रमों से करोडों के पुरस्कारों के मोह में जीवन की सच्चाइयों पर पर्दा पडना , बेजुबान जानवर पर कविता ‘जिप्सी’ ,व्रत करती स्त्री, राष्ट्रीय शोक की औपचारिकता, घर-ग्रहस्थी की चिंताओं के साथ स्त्री का बाहर निकलना आदि विषयों पर मर्मस्पर्शी कविताएँ इस संकलन में हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं।
कवि के पास अपनी बात को पाठक तक पहुंचाने का कविता का एक सरल और सर्वग्राही मुहावरा है। भाषा बहुत सरल और सहज है। ये पंक्तियां देखिए-

मैं मिला नही तुमसे मदर टेरेसा/लेकिन जानता हूँ/ तुम्हारी साडी की किनारी में बहा करती थी/ मानवता की नदी।  (मदर टेरेसा)

यहाँ मदर टेरेसा की साडी की नीली किनारी को कवि ने नदी की बहती जलधारा में रूपायत किया है। मदर टेरेसा का जीवन ही नदी की तरह जीवन-धर्म पर बडा उपकार है। यह सन्देश कवि ने सहज ही पाठक तक पहुंचा दिया है।

कविता का काम महज नारेबाजी करना नही होता है। वह एक हथियार भी नही हो सकती,कविता एक सुई की तरह है जो फटे हुऎ हमारे स्मृति के केनवास को धीरे-धीरे सिलने का काम भी करती रहती है। जिससे बीत गया समय, धुन्धली हो चुकीं यादें फिर से साकार हो जाती हैं। कविताएँ इस सन्दर्भ में अपना यह कर्म करती दिखाई देती हैं। ‘रेडियो की स्मृति’, ‘सभागार’, जैसी कई कविताएँ अनायास हमारे अन्धेरे कोनों को प्रकाश से भर देतीं हैं। वहाँ के दृश्य पाठक के मन में बहुत मोहक रूप में उभरते हैं और असीम सुकून और आनन्द से भर देते हैं।

अनेक कविताएँ हमारे समय की विद्रूपताओं और दुखद सच्चाइयों पर व्यंग्य करती हैं। ‘इस गणराज्य में’,प्लास्टिक के पेड’, ‘ग्लोबल प्रोडक्ट’, ‘मनीप्लांट की छाया’, ‘लाल बारिश’ ‘रेल गाडी के वातानुकूलित डिब्बे में बैठे लोग’ आदि कविताएँ इसी श्रेणी में रखीं जा सकतीं हैं। कवि की विचारधारा से पाठक का आमना-सामना भी यहीं होता है। कविता का काम भी यही है कि वह पाठक के मानसरोवर की प्रशांत जल-राशि को धीरे से आन्दोलित कर दे जिससे ठहरे हुए जल में तरंगें पैदा हों और अपने समय को समझने के लिए कई चित्र उसमें बनें-बिगडें। ये कविताएँ हमारे विचारों को आन्दोलित करने का ये काम बखूबी करने का प्रयास करती हैं।  

पुस्तक-इस गणराज्य में।
मूल्य-रु.100/
कवि-ब्रजेश कानूनगो
प्रकाशक- दखल प्रकाशन
104,नवनीति सोसायटी
प्लॉट न.51,आई.पी.एक्सटेंशन
पटपडगंज
दिल्ली-110092

समीक्षक-
राकेश शर्मा
’मानस निलयम’
एम-2, वीणा नगर
इन्दौर-452011  

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

आज कल भाषा , साहित्य और समाज पर चिंताएं की जारही हैं।  शनिवार को उज्जैन के माधव कालेज के हिंदी विभाग द्वारा इसी विषय पर सेमिनार था।  एक  वक्ता के रूप मेंमुझे भी विचार प्रकट करने का अवसर मिला। ख्यात आलोचक डॉ विजय बहादुर सिंह की अध्यक्षता  थी।
   जनसता के रविवार १२ जनवरी के  अंक में श्री  अशोक  बाजपेई के लेख 'स्वतत्रता , लोकतंत्र और बहुसमयता' में भी इसी तरह की चिंताएं प्रकट की गयी हैं।
     इंदौर के रंग  प्रकाशन और शासकीय अहिल्या पुस्तकालय दुआरा ''हमारा समय और साहित्य '' विषय  १७ जनवरी को शाम ६.३० बजे आयोजन रखा गया है।  वक्ता  आलोचक डॉ विजय बहादुर सिंह होंगे।  विषय पर मुझे भी विचार करने है। इस समय हमारे लेखक जीती चिंताएं प्रकट कर रहे हैं उतनी ही चिंताएं अगर देशकी  संसद और विधान सभाएं करनें लगें और साथ ही अभिनेताओं जिनका, अनुकरण नई पीढ़ीबहुत ज्यादा करती है ,का भी सेहयोग मिल जायें तो  रंगत बदलते देर न लगेगी , 

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

जबलपुर  में दिनांक २६व २७ दिसंबर १३ को पत्रकारिता पर केंद्रित एक राष्ट्रीय संगोष्टी थी।  इस संगोष्टी का केन्द्रीय विषय ;स्वातंत्रोत्तर जबलपुर के पत्रकारों का साहित्य और समाज में योग दान ; था।  वक्ताओं कि  चिताएं समाचार पत्रों में हिंदी शब्दों की जगह अंगरेजी शब्दों के बढ़ते प्रयोग , समाचार पत्रों में साहित्य के पन्नो का गायब होना  और भाषा के घटते मानक प्रयोग को लेकर थीं। मैं भी दो दिन इस  में शामिल था।  मुझे लगता है कि हमारे साहित्य्कार बंधु स्वतंत्रता  संग्राम के साहित्य्कारों की भाति  सब चाहते हैं।  उस समय के रचनाकारों जैसी प्रतिबधिताएँ  आज नही ही हैं।  उस समय के लेखक  आंदोलन के हिस्से होते थे साथ ही पत्रकार और रचनाकार भी थे।  इसलिए उनकी समाज में उपस्थिती कई रूपों में आदरणीय थी , युग की जरूरतें भी कुछ और थीं राष्ट्रीय स्व्प्न अलग था। आज  रिक्तता  है ,समाज अपने युग के अनकूल मानक तय करता है।  एक पुजारी यदि  यह चाहे के वह एक ऋषी को भाँती समादृत हो तो यह बात विचार करने जैसी है।  समाचारपत्रों  में  साहित्य के पन्ने होने चाहिए यह बिलकुल उचित बात है।  अर्ध नग्न चित्रों के बजाय संस्कार संपन्न और विचार संपन्न सामग्री तो पत्रों में होनी ही चाहिए।  आज भी जनसत्ता समाचारपत्र  में साहित्य और भाषा के लिए भरपूर जगह है।  हिन्दी का हर लेखक वहाँ छप रहा है
         जब तक लेखक , पत्रकार और नेता एक ही व्य्क्ति होता था तब तक इन में संतुलन बना रहा जैसे  जैसे  नेता नाम की संस्था बलवती होती गई  उसके और लिखक के बीच की खाई बढ़ती गई है।  मंच के विदूषक कवियों ने नेताओं के साथ मजाकिया रुख  अपनाया।  वे यह भूल गए की प्रजातंत्र में नेता शक्तिशाली संस्था है।  जब तक  नेता ,साहित्य्कार और पत्रकार तीनों मिल कर एक दिशा में साहित्य और भाषा के बारे में योजनापूर्वक विचार नहीं करेंगे तब तक संतुलन पैदा होगा इस पर मुझे संदेह है।  आज नेता और पत्रकार के बीच कुछ समन्वय है भी परन्तु साहित्य्कार और नेता के बीच के रिस्ते मधुर नही हैं  . आजदी के  बाद इंद्रा गांधी तक  साहित्य्कार से संवाद था।  पर आज यह संवाद बंद  है परिणाम  सवरूप भाषागत चिंताओं पर भाषण तो हैं पर समाधान    नहीं   हैं।  जानकीरमण महा विद्यालय के प्रधानाचार और मेरे मित्र  भाई अभिजात कृशन त्रिपाठी इस हेतु बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इस विषय पर चिंतन का अवसर उपलब्ध करवाया 

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

भागवत भूमि यात्रा पर विमर्श

पुस्तक चर्चा में भाग लेते लेखक 

पुस्तक चर्चा में भाग लेते लेखक 

पुस्तक चर्चा प्रसंग  

हिंदी के कालजयी रचनाकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय ने दो ऐतिहासिक यात्राएं संपन्न करवाई थीं. पहली यारा " जानकी" थी. दूसरी यात्रा "भागवत भूमि यात्रा" थी. अज्ञेय ने अकेले ही जिन  यात्राओं  को पूरा किया था उनके नाम हैं "अरे यायावर रहेगा याद" और "एक बूँद सहसा उछली". भागवत भूमि यात्रा में अज्ञेय के साथ हिंदी के ग्यारह बड़े रचनाकार सहयात्री थे - मानिकलाल चतुर्वेद, विद्यानिवास मिश्र, भगवतीशरण सिंह] मुकुंद लाठ, रमेश चन्द्र  शाह, इला डालमिया, विष्णु कान्त शास्त्री, नरेश मेहता,  रघुवीर चोधरी, जडावलाल मेहता. अभी हाल ही में इस यात्रा का विस्तृत विवरण ख्यात आलोचक डॉ. कृष्ण दत्त  पालीवाल ने "भागवत भूमि यात्रा" पुस्तक में संपादित किया है. इंदौर में इस पुस्तक पर चर्चा  आयोजित  हुई. इस पुस्तक चर्चा में शहर के अनेक रचनाकाओं  ने भाग लिया -  चैतन्य त्रिवेदी, डॉ. जवाहर चौधरी , चन्द्रभान भारद्वाज,विकास  दवे, हरेराम  वाजपयी, रामचंद्र सौचे, नंदकिशोर वर्वे, रामचंद्र अवस्थी, गिरेन्द्र  सिंह भदौरिया , अरविन्द  जावलेकर, सुधीन्द्र  कमलापुर, मोहन रावल, श्रीमती नियति सप्रे, सुख देव  सिंह  कश्यप, वसंत सिंह जोहरी, नारायण प्रसाद शुक्ला, इसहाक असर और  श्याम दांगी.रचनाकारों नें माना कि यात्राएं लेखन  कर्म को गहराई देती हैं .जन और जीवन की समझ यात्राओं सी पैदा होती है . भक्ति काल के सभी कवि निरंतर यात्रों पर रहते थे परिणाम स्वरुप  उनकी रचनाओं में मानव ही नहीं बल्कि पूरी कायनात का दुःख- सुख बोलता है .और इसी लिए आज भी वे सब पूरी तरह प्रासंगिक हैं . शायद अज्ञेय भी रहनाकारों को इसी उदेश्य से देश के विभिन्न प्रान्तों की यात्रा करवाना चाहते थे . पुस्तक चचा में भाग लेते हुए सभी ने माना के इस पुस्तक का सम्पादन कर डॉ क्रष्ण दत्त पालीवाल ने हिन्दी साहित्य को अमर क्रति दी है . वास्तव में अनेक सन्दर्भ इस पुस्तक में मौजूद हैं . युगों - युगों की गाथा समझनें के लिए यह पुस्तक हमारी बहुत मदद करती है .


मंगलवार, 17 जनवरी 2012

फिकरमंद पति

   श्री प्रमोद कुमार  श्रीवास्तव ,  अपर आयुक्त , कर्मचारी राज्य बीमा निगम कानपुर ,की  यह कहानी  दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में भी प्रकाशित हो चुकी है . लेखक  सामाजिक विसंगतियों पर कहानी लिखने  में सिद्ध  हस्त  है . उनकी  अब तक अनेक कहानियां देश की अनेक  पत्र - पत्रिकाओं  में प्रकाशित हो चुकी  हैं . अपने ब्लॉग पर इसे आभार सहित प्रकाशित कर रहे हैं .
                                        

बह की इंटरसिटी में मैं अपनी सीट पर बैठा ही था कि बगल की सीट पर एक पैंतीस वर्षीय नौजवान आ गया। स्मार्ट, करीब 6 फिट लम्बा। ट्रेन चली तो हम अपने-अपने अखबारों में डूब गए। सुबह जल्दी उठने के कारण नींद-सी महसूस होने पर मैं झपकी लेने लगा। कुछ देर बाद पड़ोसी युवक भी खर्राटे भरने लगा। सहसा उसके मोबाइल की घंटी से नींद खुल गयी। वह कह रहा था, क्यों तीन दिन बाद फोन करने का टाइम मिला। बन्द करो, मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी है। चन्द मिनटों के अन्तराल पर पुन: घंटी बज गयी। मोबाइल कान में लगाते हुए उसने कहा, मेरा मूड ठीक नहीं है, तुम मेरे से कोई बात मत करो। मेरा दिमाग पिताजी की बरसी में लगा है। वहां जाकर तुम लल्ली, मां-बाप में ऐसी मस्त हो गयीं कि तीन दिन बाद बात करने की फुरसत मिली है। उधर से महिला के कुछ कहने पर युवक ने कहा, ज्यादा बक-बक करोगी तो आकर ऊपर छत से फेंक दूंगा, मर जाओगी समझी! कहकर फोन काट दिया। मुझे लगा, महिला के तीन दिन तक फोन न करने से युवक आहत है। कुछ देर शान्ति रही, ट्रेन बस्ती स्टेशन पर रुकी। युवक ने किसी को फोन मिलाया, घर को साफ कराकर, छिड़काव करा देना। मैं घंटे-दो घंटे में पहुंच रहा हूं। मुझे लगा या तो कोई कान्ट्रेक्टर होगा या कोई जे.ई.। इसी बीच उसे लगा कि कोई मिसकाल हो गई क्योंकि उसने तुरन्त फोन लगाया, मैंने तुमसे कहा न, कोई बात नहीं करनी है। फिर कुछ देर युवक फोन सुनता रहा। उस महिला ने क्या कहा, युवक बिफर उठा, तुम्हारे में हिम्मत हो तो जहर खाकर मर जाओ। बच्चों को भी जहर खिला दो। मैं दूसरी शादी कर लूंगा। मुझे लगा नौजवान अपनी पत्नी से बात कर रहा है एवं उसे सुसाइड करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। नासमझ! यदि वह सचमुच आत्महत्या करने से पूर्व कोई सुसाइड नोट लिख गयी तो दूसरी शादी के स्वप्न धूल में मिलने के साथ पूरी जवानी जेल में सड़ जाएगी। पत्नी के कुछ कहने पर युवक बोला, तुम झूठी, तुम्हारे मां-बाप झूे, तुम्हारा तो पूरा खानदान झूठा, पंडों के घर शादी किया हूं तो उसका फल भोगना पड़ेगा। सुन, तुमको वहीं सड़ना है। आठ-नौ महीने मैं तुमको लाने से रहा। रुद्रपुर गयी हो न! गर्मी में मर जाओगी। न इनवर्टर, न बिजली। कितनी बार समझाया, गर्मी में गोरखपुर रहो, जाड़े में सण्डीला। बात कुछ और साफ हो गयी। युवक का घर गोरखपुर, ससुराल रुद्रपुर एवं कार्यस्थल सण्डीला था। फोन पर बात बन्द हो गयी। थोड़ी देर बाद युवक उठा टायलेट चला गया और मैं पुन: सोने की कोशिश करने लगा। टायलेट से लौटकर वापस युवक अपनी सीट पर बैठ गया। मोबाइल का कार्ड कान में लगा गाना सुनने लगा। उसे कुछ ध्यान आया। किसी को फोन लगाया। निर्देश दिया, आज टेण्डर मिलने वाला है, सण्डीला चले जाओ। किसी का नाम लिया, उससे अपने मोबाइल पर बात करा देना। टेण्डर लेने से मना कर दूंगा। मुझे महसूस हुआ, टेण्डर मैनेज किया जा रहा है। युवक का मोबाइल फिर बजा। कुछ देर बात सुनता रहा। फिर उसने कहना शुरू किया- तुम्हारे बिना भी मेरे बच्चे पल जाएंगे। मेरे घर वाले बहुत अच्छे है। कल ही वर्मा जी कह रहे थे, तुम्हारा छोटा भाई बच्चों का बहुत ध्यान रखता है। तुमको क्या पता? दो दिन से स्कूल घूम-घूम करके पार्थ के एडमिशन कराने की बात कर रहा था। बड़ी मुश्किल से बच्चों को पाला जाता है। उधर से पत्नी ने फिर कुछ कहा। युवक बोला- तुम्हें मोबाइल एक-दो दिन में मिल जाएगा। फिर फोन काट दिया। तभी किसी दूसरे का फोन आ गया। युवक शुद्ध भोजपुरी में बात करने लगा, अपनी के गाड़ी देख लिहलीं। सुंदर लगती बा न। गाड़ी अपने चला के जइबैं। छोटू के चलावे के मत देवंै। अच्छा, सुनी रजिस्ट्रेशन में 5 अंक के जोड़ वाला नम्बर लेइब। जइसे 1823, कुल जोड़ के पांच। पांच हमार लकी नम्बर बा। फिर उसे कुछ याद आ गया। किसी को फोन लगाकर प्रणाम किया, रऊआ के धन्यबाद दिहल भूल गइल रहलीं। अरे, कामिनी कै मोबाइल न पहुंचवले खातिर धन्यबाद। लगा कुछ टांट मार रहा है। फिर हंसते हुए कहा, आज कल में कामिनी कै मोबइलवा भेजवा दिहल जाई। शायद उसकी पत्नी का नाम कामिनी था। गोंडा स्टेशन बीत चुका था। ट्रेन करीब आधे घंटे लेट हो चुकी थी। मैं युवक की बात सुनने में ऐसा तल्लीन था कि पेपर पढ़ना भूल गया। युवक के व्यक्तित्व का एक-एक पन्ना प्रत्यक्ष समाचार था। इसके सामने अखबारों में छपे समाचार फीके लग रहे थे। उसे मोड़कर अगली सीट के पाउच में रख दिया था। उसके मोबाइल की घंटी ने मेरा ध्यान पुन: उसकी ओर खींच लिया। कुछ देर तक फोन सुनने के बाद, वह कहने लगा, मेरे जैसा हसबैंड तुम सौ जन्म लोगी तब भी नहीं मिलेगा। मेरे जैसा केयरिंग पिता, बेटा, दामाद सौ जन्म में भी नहीं मिलेगा। कौन अभागा हसबैंड नहीं चाहेगा कि उसका परिवार उसके साथ रहे। यही सुनना चाहती हो न। मैंने तुमको इतना सुंदर हार खरीदकर दिया। तुमने एक बार भी थैंक्यू बोला? हरामखोर! अब उसको बक्से में रख देना। पहनना मत। कामिनी ने कुछ उत्तर दिया। शायद वह निरन्तर वार्तालाप जारी रखना चाहती थी। युवक खिसियाया जैसा लग रहा था, तुम्हारे घर वालों को दामाद की इज्जत करना भी मालूम है? मुझे पैसों का कोई लालच नहीं है, तुमको मालूम है। घर का दामाद हूं, फलदान चढ़वा रहे हैं, एक बार भी पूछा- कैसे क्या करना है? मेहमानों को खाना भी नहीं खिलाएंगे। छोड़ो तुम कुछ मत कहना। जैसा चाहें करें। मैं तो इनकी इज्जत बढ़ाना चाहता था। देखो तुम्हारे घर में केवल सन्नो ही सुलझी हुई है। उसी की मैं इज्जत करता हूं। फोन डिसकनेक्ट हो गया। सन्नो उसकी प्यारी साली है, यह भी मुझे ज्ञात हो गया। ट्रेन बाराबंकी पार हो चुकी थी। अभी लखनऊ पहुंचने में लगभग घंटे भर लगने की संभावना थी। इस बीच युवक की किसी दूसरे से मोबाइल बात शुरू हो गयी। युवक ने उसे दस-पन्द्रह मिनट में लखनऊ जंक्शन पर बुलाया। सुबह से कुछ नहीं खाने के कारण मुझे भूख लग गयी थी। ट्रेन के बादशाहनगर स्टेशन पर रुकते ही अधिकांश लोग उतर गये। मैं अपना ब्रीफकेस ऊपर से उतारकर दूसरी सीट पर बैठ बिस्कुट खाने लगा। मन उसी में उलझा था। उतरने से पूर्व मैं उस युवक के पास पुन: गया, माफ करना, किसी की बातों को सुनना या व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप करना अच्छी बात नहीं है। लेकिन, आप इतनी जोर-जोर से बातें करते रहे कि मैं सब कुछ सुनने के लिए मजबूर था। मेरी एक बात अगर बुरी न लगे तो कहूं? उसे ऐसी अपेक्षा नहीं थी। मैं दालभात में मूसलचंद था। उसके मौन को स्वीकृति समझते हुए मैंने कहा, तुम एक केयरिंग पिता, पति या पुत्र हो या नहीं, मुझे मालूम नहीं। कामिनी को तुम्हारे जैसा हसबैंड सौ जन्म में भी शायद न मिले, परन्तु तुम्हारी कामिनी सचमुच सहृदय, सहनशील एवं समझदार है, जो इतनी सारी लमतरानियों को निरन्तर सुनती रही और फोन करती रही। यदि वह आत्महत्या कर लेगी, ईश्वर न करे ऐसा हो तो तुम्हें इस कामिनी को पाने के लिए सौ जन्मों का इन्तजार करना पड़ेगा। ईश्वर तुम्हें सद्बुद्धि दे। मुझे लगा कि युवक को कुछ ग्लानि महसूस हुयी। उसने हथेलियों में अपना चेहरा छुपा लिया और सिसकियां भरने लगा। तब तक ट्रेन रुक चुकी थी। मैं स्टेशन पर उतर गया।
                      कर्मचारी राज्य बीमा निगम, पंचदीप भवन, सर्वोदय नगर कानपुर-208005

शनिवार, 13 अगस्त 2011

खामोशी में झरता है वियोग

  1. खामोशी  में   झरता है वियोग  ''    वरिष्ठ कवि क्रष्णकान्त  निलोसे  का अभी  हाल में प्रकाशित कविता संग्रह है    आज कल लिखी जारही कविताओं  में   बिलकुल भिन्न तरह की भाव भूमि पर रची गयी इन कविताओं में कवि ने  सात्विक प्रेम की भिन्न-- भिन्न द्रष्ट कोणो से व्याख्या की है . वियोग शब्द योग का विलोम है जिसका अर्थ है अलग - अलग . गणित शाश्त्र के नियम के  अनुसार दो सामान संख्याओं में योग होता है. असमान स्थितियों में योग नहीं होताहै. जीव और परमात्मा  में अंश औरअंशी का सम्बन्ध माना गया है. इस लिए इन के मिलन को योग औरविछोह को वियोग की संज्ञा दी गयी है. इसी आधार पर भारतीय मनीषा में अद्वत जैसा अनूठा शब्द जन्मा है इन कविताओंमें यही अद्वत  अनेक रूपों में पाठक के सामने आता है. प्रेम की सत्ता  को कवि निरंतर स्वीकारते रहे हैं . वही स्वीकारोक्ति इन कविताओं में भिन्न व्यंजनाओं में मिलती है कवि प्रेम को परिपक्व अवस्था का भाव मानता है जिसमे  मांसल हरियाली, इन्द्रीय सुख के लिए कोई जगह नहींहै. ऊपर से बहुत सहज  देखाई पड़ने वाले इस विषय पर कविता लिखना सरल काम नहीं .प्रेम किये बिना , प्रेम के सरोवर में उतरे बिना  इनका अर्थ नहीं समझा जा सकता . भक्ति को परिभाषित करते हुए महाकवि तुलसी नेलिखा था ' जिन यही वारी ना मानस धोये '' अर्थात जिन्होंने इससरोवर से दो अंजलि जल नहीं पिया वे खुछ न समझ पायेंगे , ठीक वैसी हीस्थिती  इन कविताओं कीहै. प्रेम की डगर पर चले तो बहुतेरे हैं पर इस डगर के अनुभव विरले ही करपाए हैं. इन कविताओं की भाव भूमि ऐसी मालूम  पड़ती है जैसे गम्भीर बारिश  के बाद झाड़ियों से टपकता पानी वातावरण की नीरवता को भंग करता हैऔर  भीगा हुआ वातावरण एक नई श्रष्टि का श्रजन करता है. ऐसी सर्जनात्मक  सम्भावनाओं से भरी पूरी हैं इस संकलन की कविताएँ  कवि लिखता है   '' प्रेम / गर होता/ समुद्र  सुखका/ तो लहरों की शिराओं  में/  समाया हुआ दुःख / क्यों पटकता रहता अपना सर/ बार - बार.'' एक उदाहरण और देखए ---- क्योंकि अपनी वाणी से परे / शब्दातीत / महसूस किया है उसे / प्रज्ञा में स्थित / भाव की गति शीलता  में/ '' कवि निलोसेअपने  आध्यात्मिक मिलन की ओर इशारा करते हुए लिखते हैं----' देह हो कर / हम तुम / मिले ही कब / औरकब देह हो हुए अलग.'' ये पंक्तियाँ ऋषि मार्कंडेय की याद दिलाती हैं दुर्गा सप्तसती में वेलिखते हैं कि हे आदि शक्ति माँ  तुम परमानंद विग्रह हो . अर्थातसंसार  रचने के लिए विधाता ने स्त्री और पुरुष  के रूप में अपना विभाजन किया . कवि निलोसे का प्रेम उसी शास्वत सत्य की ओर इशारा कटा है. गंभीर और चितन प्रवण इन कविताओं से गुजर कर पाठक अपने आप को एक अतीन्द्रीय लोक में पाता है. आज  जब कविता में कविता के शिवा सब कुछ लिखा जा रहा है ऐसे में कवि निलोसे की कविताएँ भरोशा दिलाती हैं कि संभावनाएं अभी शेष हैं . कवि क्रष्णकान्त निलोशे को इन सार्थक कविताओं के लिए बधाई .

रविवार, 7 अगस्त 2011

रचनाकर जो पाठक मंच इंदौर की गोष्ठियों में उपस्थित हुए


उपन्यास पर चर्चा आयोजित

पाठक मंच इंदौर ने लिखिका डॉ मीनाक्षी स्वामी की पुस्तक भूभल पर चर्चा आयोजित की . यह उपन्यास नारी की सामाजिक स्थिति पर केन्द्रित है लेखिका ने बड़े साहस के साथ इन विषयों को उठाया है . इस पुस्तक गोष्ठी में डॉ पुरुषोतम दुवे , डॉ जबाहर चौधरी , डॉ ॐ ठाकुर , डॉ कला जोशी, डॉ छाया गोयल डॉ हेमलता दिखित , श्री मोहन रावल , नियति सप्रे ,किसलय पंचोली   डॉ मीनाक्षी स्वामी    , ब्रजेश क़ानून गो , नन्द किशोर सोनी , चन्द्र भान भार्दुआज , गोपाल माहेश्वरी , प्रताप सिंह सोढी, देवेश त्यागी  श्याम यादव , बसंत जौहारी, कु. लवीना निनामा , रंजना फतेपुरकर , नंदनी जोशी और राकेश शर्मा ने भाग लिया . चर्चा का निष्कर्ष यह निकला  की क़ानून बना लेने , शिक्षा का  प्रचार कर लेने अथवा नारी के समर्थन में नारे लगा लेने से कोइ परिवर्तन होने वाला नहीं है . पूरा पुरुष समाज नारी के साथ अन्याई  नहीं है औरअत्याचारी  भी नहीं है . लेकिन नारी की देह और उसकी अस्मिता पर हो रहे निरंतर अन्यायों के विरुद्ध आवाज उठाने की जरूरत है . इसे जन जागरण के दुआरा ही दूर किया जा सकता है . उपन्यास अनेक विमर्शों को जन्म देता है . पठाक को सोचने के लिए मजबूर करता है .
चर्चा में भाग लेते लेखक


मंगलवार, 24 मई 2011

भारत भूषण के गीत



भारत  भूषण हिन्दी गीत के शीर्षस्थ कवि है. उन्होंने हिन्दी गीतमंच का लंबा और सार्थक  युग जिया है. भारत भूषण  से मैंने उनकी काव्य यात्रा के बारें में बात की. इस बातचीत के पहले भाग को आप यहाँ सुन सकते है.  


सोमवार, 25 अप्रैल 2011

विमर्श के नये क्षितिज तलाशती पुस्तक '' नागार्जुन संवाद ''

नागार्जुन के जन्म  सती वर्ष के उपलक्ष्य में पूरे देश में अनेक आयोजन हुए . श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति , इन्दौरे  ने डॉ विजय बहादुर सिंह को व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया . डॉ विजय बहादुर सिंह सुविख्यात आलोचक और लेखक और कवि हैं . हमारे समय के सवालों से सबसे सबसे अधिक व्यापकता के साथ उठाने वाले वे अकेले आलोचक दोखाई पड़ते हैं ..  नागार्जुन संवाद उनकी एक बहुत महत्वपूर्ण  पुस्तक है . कवि नागार्जुन को समझने और साहित्य अनेक पक्षों पर चिंतन करने के लिए इस पुस्तक में प्रचुर सामग्री है . संवाद शैली में लिखी गयी यह पुस्तक , शोधार्थियों , लेखकों को जरूर पढनी चाहिए . लेखक की प्रतिब्ध्ता के वारे में नागार्जुन यह कथन  देखिये   '' कैसा भी विश्लेष्ण हो , कवि को सीमित कर देता है और काल क्रम में विशेषण झरते चलते हैं . '' [ प्रष्ठ 18 ]
                 आलोचक विजय बहादुर सिंह अनेक सवाल नागार्जुन से करते हैं जिनके बहुत महत्वपूर्ण
 उत्तर  इस पुस्तक में उपलब्ध हैं ,
 पुस्तक ----- नागार्जुन संवाद
  संपादक ----- डॉ विजय बहादुर सिंह
   मूल्य ------- रु -- 150
    प्रकाशक ---- बाक्स korogetrs एंड प्रिंटर्स
                          गोविन्द  पुरा भोपाल , [ मध्य - प्रदेश ]

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

नई उदभावनाओं का बे जोड़ कवि , श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया

कविता का उद्देश्य न तो केवल मनोरंजन करना है और न केवल विचार या विचार धारा  का प्रचार करना भर  है .जब -जब कविता से यह गुलामी करवाने का निंदनीय प्रयास किया गया है , तब - तब वह समाज की मुख्य धारा      से कट गयी है . इसका एक  बड़ा उदाहरण मुक्ति बोध और अज्ञेय जैसे कवियों से लिया जासकता है . ये  बड़े कवि हैं परन्तु अकेडमिक रूप से मूल्यांकित हैं , जनता में उस तरह से स्वीकृत और मूल्यांकित नहीं है जैसे  तुलसीदास   ,   निराला ,  कबीरदास  हैं . गिरेन्द्र सिंह  की कविता पर  बात  करते  हुए मेरा कोई  उद्देश्य इनकी तुलना उक्त कवियों से करने की नहीं है . आज की कविता विचारों से लदी     फंदी  और ऊबड़ खाबड़ है की मानो पाठक और श्रोता को कोई रस ही नहीं  दे पाती ,ऐसे समय में कविता के सरस रूप की जरूरत है , एक तो आज का आदमी अपने जीवन के बोझ से दबा हुआ है ऊपर से असंस्कारित कविताई उसे और नीरसता में डुबोती है इस कारण साहित्य से  उसकी दूरियां  और बढती  जारही हैं .
       गिरेन्द्र सिंह  भदौरिया की कविता में इन बातों के विपरीत प्रक्रति का सानिध्य है , कल्पना की सुकोमलता है और जीवन के साथ इनका तादात्म . कविता जब तक पाठक का मन रंजित करते हुए उसे जीवन के धरा तल से ऊपर ना  उठए तब तक वह किसी काम की नहीं होती . गिरेन्द्र  सिंह की कविताओं में यह ताकत है देखें -----'' पंथी का गंतव्य , गत्य  तक नहीं / गत्य से आगे भी है . ...... जीवन का उद्देश्य , म्रत्यु तक नहीं , म्रत्यु से आगे भी है ' कोई कठिनाई पैदा किये बिना कवि अपनी बात पाठाक तक भेज देता है .  समाज की जिम्मेदारी जिन पर थी वे सब अपना उत्तर दायित्व भूलकर अपने पेट की आग बुझाने में लगे हुए हैं कवि ने लिखा '' खेतों को बागड निगलती जा रही है ''   सब तरफ भ्रष्टाचार फैला है और सब परेशान लेकिन मौन हैं ,ऐसे समय में कवि लिखता है --- '' धारा मुख्य बना सन्नाटा , मौन प्रमुख प्रहरी हैं''' और भी --''अब तो बलिदानी भावों को , पागल पन कहते हैं .'' एक कवि ही तो है जो हर युग में स्वम तो जागता  ही है समाज को भी जगाता रहता है ----'' अनाचार की जिस आंधी में / दानवता मुहं खोल  रही है ..... सुधी जानो के मध्य रक्त से सनी लेखनी बोल रही है ''
         गिरेन्द्र सिंह की कविता में प्रयुक्त कुछ उपमाएं  देखें , यह उपमा चांदनी के लिए की गई है '' धूप हिम से निकल जर्द पीतल हुई , अग्नि गर्भा सुता सर्द शीतल हुई .''  ऐसी उपमा अन्यत्र न मिलेगी जहां चांदनी को धूप से निकला हुआ कहा गया हो . एक उपमा और देखिये ---''या के केशर मिलाया हुआ दूधिया / दिव्य आलोक  इस लोक ने पी लिया .'' अब आप कल्पना कीजिए और तुलना भी करें की चांदनी का रंग और केशर मिले दूध में कैसी बेजोड़ समानता है .इसी क्रम में एक और उपमा देखिये ---'' मानो उबटन लगाए हुए बिजलियाँ / बिछ  गईभूमि पर छोड़ कर बदलियाँ .'' बिजली जब  बादलों में कौन्धिती तब वह सफेद होती है परन्तु चांदनी पीला पन लिए होती है .इसी लिए कवि ने बिजली को उबटन लगा कर पीला किया है और उसे चांदनी के रूप में प्रतुत किया है . यथार्थवादी इसे नही मानेगे परन्तु इस सबसे कविता का मूल्य कम नहीं हो जाता .  ''बादल को धन्य बाद '' कविता में ऐसी ही अनेक उपमाएं पाठाक का मन मोहती हैं .
               केवल आलोचक की प्रशंसा पा कर कोई बड़ा कवि नहीं बन सकता , जब तक की कवि को जनता का , पाठाक का पूरा आशीर्वाद न मिले . हमारे समय के कवि श्री गिरेन्द्र सिंह  भदौरिया के पास श्रोता भी हैं और पाठक भी . उम्मीद है क़ि उनसे भविष्य में बहुत मर्म स्पर्शी कविताएँ हिन्दी के पाठकों को मिलेंगी .....

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

गोआ में तुम

सुप्रसिद्ध कहानीकार श्री बलराम का कहानी संग्रह ' गोआ में तुम ' अभी हाल में ही प्रकाशित हुआ है . इस संग्रह में 15 कहानियां हैं . हमारे समय की विसंगतियों पर लिखी गई इन कहानियों में पाठक अनेक तरह के प्रश्नों से रूबरू होता है .  लेखन  कर्म की यह सबसे बड़ी चुनौती होती है की वह अपने पाठक के सामने प्रश्न खड़े करे . समाधान खोजना रचना का काम नहीं होता है . और न ही अपने पाठकों को उपदेश देना लेखक का काम है.नारी की स्वतंत्रता पर बड़ी चर्चा की जा रही है और झांसे में फंसी  वह भी अपने को आजाद मानने लगी है पर हालात कुछ और ही हैं लेखक ने इसे लिखा है '' बचपन  से ही सुनती आई हूँ की जीवित बचे रहने के लिए लडकी को कदम - कदम पर
समझौते करने पड़ते हैं . '' [ प्रष्ठ  15 ] लेखक के पास बड़ी पैनी निगाह है  जो पूरे पाखंड को समझ कर बात को पूरी साफ़ गोई के साथ सामने रखता है . ये  कहानियाँ मानवीय सरोकारों , और बदलते मनोविज्ञान पर अलग तरह से प्रकाश डालती हैं . दार्शिनिक भाव पर कई कहानियां है . बहुत महीन ताने बाने की बुनावट वाली इन काहानिओं में एक रवानगी है जो पाठक को गहरे  तक बांधती है . यह लेखकीय कौशल बड़े अनुभव और धीरज से ही पैदा होता है जो लेखक की अपनी कमाई होती है . इन कहानिओं को पढ़ते  हुए लिखक श्री बलराम के एक कहानीकार का सबल और सफल रूप सामने आता है .
 पुस्तक --- गोआ में तुम
 लिखक --- श्री बलराम
 प्रकाशक       भावना प्रकाशन , 109 ,
                      पटपड गंज , दिल्ली  91
   मूल्य --- र - 150
             

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

आगामी दस वर्ष


भविष्य का आकलन करना निःसंदेह सबसे कठिन कार्य है। लेकिन आज के विश्व  को देखते हुए आगामी दस वर्षों के स्वरूप के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है।  दस वर्ष बाद समूचे विश्व   का परिदृष्य बहुत बदल चुका होगा। जैसा कि पिछले 10 वर्षों में बदला है। आज से 10 वर्ष पहले मानवीय सम्बन्धों जो गरमाहट, समर्पण और अहलाद का भाव होता था, वैसा 10 वर्ष बाद दिखाई नहीं पड़ेगा। इसके लिए जहां समय अवधि जिम्मेदार होगी वहीं हमारी शिक्षा तथा मौजूदा नेताओं का चरित्र जिम्मेदार होगा। जिन राष्ट्रीय मूल्यों और उद्देष्यों को लेकर स्वतंत्रता आंदोलन लड़े गये , वे मूल्य धारासा यी होते हुए दिखाई पड़ेंगे। इसके लिए एक उदाहरण भाषाओं के संबंध में लेना पर्याप्त होगा। गांधीजी स्वराज्य में  अपनी भाषओं को बढ़ता हुआ देखना चाहते थे, क्योंकि उनके लिए आजादी और भाषाई स्वतंत्रता दोनों का एक ही मायने था। इसलिए वे कहते थे -’’ मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम भाषा को राष्ट्रीय और अपनी प्रांतीय भाषओं में उनका योग्य स्थान नहीं देंगे, तब तक स्वराज्य की सब बातें निरर्थक है।’’ (सन् 1918 में इन्दौर में दिए गए भाषण से)। गांधीजी की दृष्टि में प्रांतीय और राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को उचित स्थान न देने का मतलब गुलाम बने रहना जैसा ही था। आजादी के इन 60 वर्षों में भारत की अशक्षित जनता को न्याय अभी भी उनकी भाषओं में नहीं मिल रहा हैं। आगामी 10 वर्षों में संसार का भाषाई परिदृष्य कैसा होगा, इस पर यूनेस्को ने एक विस्तृत अध्ययन करवाया है इस अध्ययन में विश्व  की सभी भाषाओं के बारे में है ,भविष्य का आकलन किया गया है। भारत की भाषाओं के लिए खतरे की घण्टी बजते हुए सुनाई पड़ रही है। इस रिपोर्ट  में यह खुलासा किया गया है कि आगामी दशकों  में भारत के प्रांतों की भाषाएं समाप्त हो जायेगी। और वे सिमटकर स्थानीय बोलियों के रूप में बचेगी। ऐसा होना निःसंदेह दुःखद होगा, लेकिन ऐसा होना इसलिए तय है क्योंकि आजादी के बाद भारतीय भाषाओं के संरक्षण के उपाय नहीं किये गये। उन्हें रोजगारोन्मुखी नहीं बनाया गया। केवल ऊपरी तौर पर प्रदर्शन कर भाषाओं के संरक्षण का ढोल पीटा गया है। विश्व भाषा  के रूप में हिन्दी आगामी १० वर्षों  में स्थापित होते हुए दिखाई पड़ने लगेगी। अंग्रेजी भाषा का साम्राज्य कम होगा।  इस सम्बन्ध में डॉ रामविलास शर्मा की मान्यता भी विल्कुल ऐसी  ही है . वर्तमान में बाजार की भाषा के रूप में हिन्दी निरंतर ब़ढ़ रही है। भाषा का विकास व्यापार भी तय करता है। केवल साहित्य के सहारे भाषा का विकास नहीं होता। आज बाजारू हिन्दी को देखकर जो जन सोचते हैं कि भाषा के स्वरूप को बिगाड़ा जा रहा है ,वे देखेंगे कि आगामी 10 वर्षों में हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में स्थापित करने में वे ही बाजार और बाजारू हिन्दी सहायक बनेगी। हिन्दी मीडिया, अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग में और आगे बढ़ेगी। और अंग्रेजी के शब्द हिन्दी व्याकरण के साथ आकर उसी तरह हिन्दी भाषा का हिस्सा बन जायेंगे, जैसे अरबी, फारसी, पश्तो, फ्रेंच, इटेली और अंग्रेजी के शब्द पहले से घुले-मिले हैं .  
भारतीय समाज में तेजी से परिवर्तन आयेगा। सदियों से व्याप्त जातीय भेद-भाव और कुरीतियों से समाज मुक्त होगा। समाज में वैज्ञानिक सोच विस्तार पायेगा , महिलाओं की स्थिति पहले से बदलेगी। महिला सशक्तिकरण का कार्य सकारात्मक परिणाम दिखाएगा। शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ेगा, लेकिन समाज के सभी वर्गों तक    शिक्षा  नहीं पहुँच पायेगी, जिसके कारण एक बहुत बड़ा वर्ग अविकसित अवस्था में जिएगा। यह अशिक्षित  वर्ग और दयनीय स्थिति में जाएगा। आर्थिक विकास की यह अंधी दौड़ मनुष्य को स्वार्थी बनाएगी। वह अपने तईं और अपने परिवार तक सीमित बनेगा। सामाजिक चिंताओं और वैश्विक  सरोकारों से दूर अधिकांश जनसंख्या केवल अपने लिए जिएगी। शिक्षा  का उददेष्य मनुष्य को मनुष्यता सिखाने की बजाय केवल नोट कमाने का साधन बनाना भर बचेगा। एक ओर जातीय व्यवस्था कमजोर होगी तो दूसरी ओर धन के आधार पर वर्ग भेद पनपेगा, जो समाज में नये जातीय समीकरणों को पैदा करेगा।
आगामी 10 वर्षों में एक वैश्विक संस्कृति आकार लेने लगेगी। ग्लोबल बिलिज में अपनी-अपनी पहचान बनाए रखने के लिए भाषाएं और संस्कृतियां संघर्ष करते हुए दिखेगी। ऐसे समय में भारतीय संस्कृति अपने वैज्ञानिक तथ्यों पर खरी उतरकर नये स्वरूप में ढलकर विश्व संस्कृति का रूप ग्रहण करने लगेगी। ऐसा इस आधार पर कहा जा सकता है कि विश्व  की जो अति-प्राचीन संस्कृतियां हैं, उनमें केवल भारतीय संस्कृति अपने मूल के साथ अनेक आक्रमणों को झेलकर जीवित बची है। इसी आधार पर गांधीजी ने हिन्द स्वराज्य में लिखा था-’’मेरी मान्यता है कि भारत नें जो सभ्यता विकसित की है, वहां दुनिया में कोई नहीं पहुंच सकता, जो बीज हमारे पुरखों ने बोए है, उनकी बराबरी कर सकने योग्य कहीं कुछ देखने में नहीं आया। रोम मिट्टी में मिल गया, ग्रीस का नाम भर बचा, मिस्त्र का साम्राज्य चला गया, जापान पश्चिम  के षिकंजे में आ गया और चीन का कुछ कहा नहीं जा सकता। किन्तु इन भग्वावस्था में भी भारत की बुनियाद अभी शेष है।"" यही शेष बुनियाद विश्व  संस्कृति का आधार बनेगी। भारत की योग और आत्याध्मिक खोजें आगामी 10 वर्षों में विश्व मानव के लिए सहारा बनने लगेगी। भारतीय समाज पंडो, पुरोहितों, मौलवियों जैसे पाखंडियो  से मुक्ति पाते हुए प्रतीत होगा, जो सामाजिक समरसता और सामाजिक क्रांति के लिए एक महान कार्य होगा। आज की तुलना में मानव जीवन की गरिमा अधिक सुरक्षित होगी। भारत की वर्तमान पीढ़ी तथा आगामी 10 वर्षों में आने वाली पीढ़ी तकनीकी और प्रबंधन के क्षेत्रों में अपनी दक्षता का लोहा विश्व  में मनवाएगी। विश्व के लगभग सभी देशों  में दक्ष भारतीयों की उपस्थिति  भारतीय संस्कृति को स्थापित करने में मदद करेंगी। भारत के नये और पुराने ज्ञान-विज्ञान  मिलकर एक नये संसार  के निर्माण में सहायक होंगे। वर्तमान परिदृष्य से जिन्हें यह भय है कि कहीं भारत अपनी मूल पहचान न खो दे, वे 10 वर्ष बाद देखेंगे कि भारत अपनी अस्मिता के साथ समझौता किये बिना विश्व  को डिक्टेट करेगा, वह दिन हमारे उस ऋषि की परिकल्पना को पूरा करेगा, जिसमें उसने वसुधैव कुटुम्बकम् का स्वप्न देखा था।









शनिवार, 9 अप्रैल 2011

गांधी को खारिज करने वाले लोगों के लिए

अन्ना हजारे के आन्दोलन में शरीक हुए अभिनेता


अन्ना और अग्निवेश
 
कई वर्षों से यह मुहीम चलाई जा रही थी की गांधी जी इस २१वी  शदी  में प्रासंगिक नहीं बचे . लेकिन  भ्रष्टाचार के विरुद्ध  अन्ना हजारे के आन्दोलन ने यह  प्रमाडित कर दिया की २१वी सदी में अगर किसी कोई विचार सबसे अधिक प्रासंगीक है तो वे गांधी जी के विचार हैं . अन्ना हजारे का पूरा आन्दोलन शान्ति पूर्वक सम्पन्न हुआ . अपने उद्देश्य में सफल रहा . इस आन्दोलन ने कई सबालों के जबाब दिए और कई नये सबाल हमारे सामने खड़े भी किये.राष्ट्र की  चिंता में नई पीढी सामने आई .जिसके बारे में यह मान लिया गया है की इस पीढी के सरोकार राष्ट्र और समाज से कट गए हैं . इस बात में संदेह नहीं है की यह पीढी सब तरह से अलग है पर ऊपर से बहुत अलग थलग दीखते हुए भी इसकी अपनी समझ है ,अपनी प्रतिभा है . जहां -  जहां  पथ भ्रष्ट है वहां -वहां  इसका नहीं ,हमारा दोष है , शिक्षा का दोष है , केवल नई पीढी को दोषी नही ठहराया  जा सकता . अन्ना के आन्दोलन में नव युवक ,नव  युवतियां जुडीं . इस बात को स्वम अन्ना ने भी स्वीकार किया . सबाल ये है की ये लोग अन्ना  हजारे को नया गाधी कह  रहे थे . इस पीढी ने गांघी को नहीं देखा फिर भी इसके मन में कहीं न कहीं गांधी की एक  ऐसी छवि है जो भरोसा  दिलाती है की बिना रक्तपात किये हुए भी परिवर्तन  सम्भव है . और रक्तपात करके भी क्रान्ति सम्भव नहीं हो पाती . दोनॉ ही बातें हमारे सामने हैं .नक्सली आन्दोलन के चलते कितना खून  बह  चुका है  पर नातो सरकार झुकी और न ही  आन्दोलन आपनी किसी शक्ल में बदलता दिखाई     पड  रहा  है . परिस्थितियाँ अलग हो सकती है. पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता की जो अहिंसक मार्ग  गांधी ने हमें दिखाया है , सब तरह से वही ठीक है . जितनी विसंगतियां हमारे सामने हैं .उन्हें मिटाने के लिए अगर गोली का सहारा लिया जाए तो ,यह तो नहीं कहा जा सकता कि वे  विसंगति समाप्त होगी पर इतना तो कहा जा सकता है की अनेक विसंगतियाँ और जन्म ले लेंगी . असल में गांघी का रास्ता आदमी का आतंरिक परिवर्तन कर बदलाव पैदा करता है . क्रान्ति  का जो रास्ता मार्क्स ने हमें दिखाया वह समय के प्रवाह में पूरी तरह अनउपयुक्त सिद्ध हो चुका  है . किसी प्रजातांत्रिक व्यावस्था में खून खराबे की लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए . जहां -जहां सत्ता हिंसा के रास्ते से प्राप्त हुई  है वहाँ -वहां उसे बनाए रखने  के लिए और अधिक खून बहाने जरूरत हुई है . हिंसा की अंतिम  तस्वीर केवल हिंसा में ही बदली है . आज समय की जरूरत है की छोटे -छोटे जन आंदोलनों से हम अपने समय की समस्याओं को हल कर सकते हैं . यह अवश्य  ध्यान रखना होगा की कोई गांधी आकर हमारे समय को संबोधित करेगा , यह होने वाला नहीं है . अना हजारे का यह आन्दोलन अनेक तरह की आशाओं को जन्म दे गया , सूनी आँखों में सपने दिखने का अवसर  दिए  , अँधेरे समय को प्रकाश की एक किरण , और पूरे समाज को एक आलम्बन . भ्रंश से ही उम्मीद के अवसर पैदा होते हैं . यह पुस्तकों में  तो था इसे 9 अप्रैल 2011 को जंतर -मंतर नई दिल्ली में सामने  घटते हुए भी देखा है .


लोग जो परिवर्तन के पक्ष में हें
 

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

खुले तीसरी आँख

श्री चन्द्रसेन 'विराट ' हिंदी के स्थापित कवि हैं . अब तक उनकी 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं . खुले तीसरी आँख अभी हाल ही में प्रकाशित गजल संग्रह है . इस संग्रह में 79 गजलें संग्रहीत हैं , जैसा की इस पुस्तक के शीर्षक से ही अर्थ निकलता है कि कवि 'विराट' का मन आज की परिस्थतियों प्रसन्न नहीं है . वह इसमें व्याप्त स्थितियों से सामना करना चाहता है . पौराणिक संदर्भों के अनुसार तीसरा नेत्र भगवान शंकर के पास है .प्रलय और क्रोध के छनो में वे तीसरा नेत्र खोलते हैं .ऐसा ही  तीसरा नेत्र कवि के पास होता है , इसी के सहारे वह संसार के पूरे सच को देखता आया है . और इसी के सहारे वह अशुभ को जलाता है और पूरे मानवीय समाज के लिए मंगल कामनाएं करता है . कवि विराट चाहते है कि आज के समाज में जो विसंगतियाँ हैं उनके प्रति आक्रोश नहीं रहा , लोग फील गुड में डूबे हुए हैं उनका तीसरा नेत्र खुल  ही नहीं रहा है ,. कवि का मानस लिखता है   विवशता न्याय की देखो कई अपराध करके भी / दिया अपराधियों को यूं /  अभय देखा नही जाता ,' किसी पुस्तक की कसोटी यह भी होती है की रचना कार अपने समय के साथ कैसे जूझता है . कवि विराट के यह पुस्तक हमारे समय के  सबालों से रूबरू होती है . पाठाक के मन में बेचैनी पैदा कर उसे चिंतन के लिए मजबूर करती है =बहुत दुर्दांत निष्ठुर है समय देखा नहीं जाता / न देखा जा सके इतना , एनी देखा नहीं जाता .''
 इस समय में परिवर्तन होना चाहिए यह उदेदश्य है कवि  विराट का . वे मानते हैं कि असम्भव कुछ भी नहीं किवल इच्छा शक्ति चाहिए . यह पुस्तक पाठक  को विचार यात्रा पर ले जाने में पूरी तरह शक्षम है .

पुस्तक --- खुले तीसरी आँख
 कवि ------ चन्द्रसेन विराट
मूल्य -----रु 250
 प्रकाशन -- समान्तर पुब्लिकेशन
 तराना , उज्जैन , मध्य प्रदेश

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

समय से सम्वाद करती कविताएँ

तुम कितनी अच्छी हो
गोष्टी का चित्र
नारायण डॉ रवीन्द्रण पहलवान का नया कविता संग्रह 'तुम कितनी अच्छी हो ' अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है . इस संग्रह पर चर्चा   गोष्टी आयोजित हुई . चर्चाकार थे श्री हरे राम वाजपेई, श्री राजेन्द्र वामन काटदरे और राकेश शर्मा . डॉ पहलवान की कविताएँ आकार में  बहुत्त छोटी  हैं , किन्तु उनका अर्थ गम्भीर है . ये कविताएँ हमारे समय के साथ सम्वाद करती है . किसी रचना के मूल्याकन के समय यह तथ्य भी महत्व पूर्ण होता की उस रचनाकार ने अपने समय के साथ न्याय  किया या नहीं .डॉ पहलवान की यह कविता पढ़ें ----चिड़िया /तुम कभी मंदिर /पर बैठती हो/कभी मस्जिद  पर /  कभी गरजे पर / तुमने किसी / आराधना स्थल में / भेद नहीं किया / हमें अभी भी / ठीक से बैठना / सीखना बाकी है ,'' सामाजिक विसंगतियों पर अनेक कविताएँ इस संग्रह में हैं ,हिन्दी के सुधी पाठकों को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए .    पुस्तक -- तुम कितनी अच्छी हो , कवि डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान ,   मूल्य --रु 145 ,  प्रकाशक ---- रोटरी क्लब अपटाउन , इंदौर .
डॉ पहलवान व अन्य

बुधवार, 9 मार्च 2011

मोबाइल से कुछ सीखें

                   मोबाइल के घर
                                      जब भूल  से  भी आता है कोई 
                             प्रसन्नता से जग -- मग
                                हो उठती  है उसकी काया
                                   मेहमान के आने की खुशी
                              गा गा कर  सुनाता वह
                           महानगर के निवासी
                                    संभ्रांत कहे जाने वाले हम
                                                बुझे चहरे और सरगम हीन भाषा में
                                      अतिथि का करते हैं स्वागत 
                            क्या मोबाइल  से हम
                                          स्वागत संस्कार सीख सकते हैं

शनिवार, 5 मार्च 2011

भारतीय समाज के निर्माण में साहित्य की भूमिका ---------


 विचार रखते हुए आलोचक डॉ क्रष्णदत्त पालीवाल
 भारतीय समाज के निर्माण में साहित्य की सबसे बड़ी भूमिका है , हमारा समाज आज साहित्य से दूर भागता हुआ भले ही दिखाई पड़े परन्तु वह साहित्य के बिना अपना काम नहीं चला सकता . आज भी उसके सभी संस्कार साहित्य से ही पूरे होते हैं .स्वतंत्रता आन्दोलन  के समय राष्ट्रीय भावना जागृत करने में साहित्य की सबसे बड़ा योगदान है . साहित्य केवल भाषा और शब्दों का खेल नहीं है . साहित्य की परिध में किसी भी राष्ट्र के पेड़ , पहाड   , नदियाँ , जंगल ,पशु , चिड़िया , जड़ जंगम , चेतन      वनस्पतियाँ , खान  पान , वेश  भूषा आदि सभी आते हैं  . इन सबसे मिलकर जो चीज बनती है वह साहित्य की नजर में वह सब राष्ट्रीय  धरोहर है . एक युग चेतना सम्पन्न लेखक ,कवि , आलोचक . मानवीय समाज के साथ  साथ इन सबकी चिंता  भी करता है . हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय स्वर विषय पर डॉ क्रष्णदत्त  पालीवाल ने इंदौर में एक अविस्मरनीय भाषण दिया वे धर्मपाल शोध पीठ भोपाल दुआरा आयोजित एक प्रसंग पर इंदौर आये   थे . हरिश चन्द्र और उनके बाद के सभी युगों में हिन्दी के अनेक रचना कारों ने राष्ट्रीय चेतना को पुष्पित और पल्लवित करने वाला साहित्य रचा है . आज के साहित्यकार का यह कर्तव्य है की वह एस परम्परा का निर्वाह करता रहे . साहित्य के सामाजिक सरोंकारों पर डॉ पालीवाल ने अनेक प्रसंग श्रोताओं के सामने रखे .

बुधवार, 2 मार्च 2011

साहित्य वही है जो अपने समय से झूझता है


श्री सुखदेव सिंह कश्यप की पुस्तकों के विमोचन अवसर का द्रश्य

 साहित्य की सत्ता अपनी जगह स्वतंत्र है .साहित्य का सच राजसत्ता के सच से हमेशा अलग रहता है . समाज के सच के बहुत पास तक जाता साहित्य का सच, परन्तु वह समाज के सच के साथ हमेशा हाँ में हाँ मिलाये यह जरूरी नहीं . धर्म का सच साहित्य की द्रष्टि  में खंडित सच है इस लिए साहित्यकार धार्मिक होते हुए अपनी तरह विद्रोही भी होता है . जब कोई साहित्यकार धर्म के पास जाता है तो केवल साहित्यिक कारणों से ही जाता है न क़ि अंध विश्वासी होकर और न ही धर्म के सच को प्रचारित और प्रसारित करने के उदेश्य के साथ  . मूल अर्थों में वह आध्यात्मिक अधिक होता है , धार्मिक कम . धर्म , समाज और राज सत्ता के त्रिकोण के बीच साहित्य अपने सच के साथ उपस्थित रहता है . जनता का सच सुनकर  भगवान  राम   जो सत्तासीन हैं . अपनी पत्नी सीता का परित्याग किया  .इस घटना पर धर्म अपनी तरह रियक्ट होता है लेकिन एक साहित्यकार  जो वाल्मीक  के रूप में मौजूद है . वह जनता , राज सत्ता  और धर्म के सच की परवाह किए बिना सीता के साथ हुए अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है . और जो पुस्तक रचता है वह रामायण बन जाती है .  लगभग यही बात महाभारत में भी घटित होती है , वेद व्यास अपने समय के सारे सच को संजय की आँखों से देखते हैं और अंधी राज सत्ता को पूरा सच दिखाते हैं .जो न केवल महाभारतबल्कि हर युग के आदमी के लिए गीता के रूप में प्रेरणा  दाई बन जाता है  साहित्य मूल रूप से सत्ता  के विरुद्ध ही खड़ा होता है . इस लिए साहित्य के नाम पर जितने भी वाद चलाए गए बे सब इस लिए विफल हुए क्योंक़ि उनकी आधार  शिला  साहित्य की जमीन और जमीर पर आधारित नहीं थी ये आन्दोलन राजनीत से प्रेरित थे  बल्कि कह सकते हैं के राजनीत की जलवायु वाले पौधे को साहित्य की जमीन पर रोप कर फल प्राप्त करने की कोशिश  की जा रही थी इसलिए इनका यही परिणाम होना था . साहित्य और एक साहित्य कार को हमेशा अपने निज धर्म की तलाश में रहना चाहिए जिसकी चाह मुक्तिबोध के शब्दों में इस तरह है

   रचनाकार वही ठीक है जो समाज में व्याप्त विद्रूपताओं के विरुद्ध लिखता है और अपने आचरण से समाज को प्रभावित भी करता है . [कल १ मार्च २०११ को इंदौर के वरिष्ट रचनाकार श्री सुखदेव सिंह कश्यप की दो पुस्तकों  'चर्चा आज की ' और प्रजातंत्र के आईने में कविता ' का विमोचन हुआ , श्री सुख देव सिंह कश्यप निरंतर लेखन  करने वाले लिखकों में हैं . सरल और समयानुकूल लेखन उनकी विशेषता  है . इन पुस्तकों में हमारा समय बोलता है    विमोचन अवसर पर मैंने जो जो विचार व्यक्त किये हैं उन्हीं के कुछ  कुछ अंश ऊपर दिए  गये  हैं  ]इस अवसर पर श्री सत्य नारायण सत्तन ,चन्द्र सेन विराट,सूर्य कान्त नागर,जस्टिस वीरेन्द्र दत्त ज्ञानी,सुरेश सेठ ,हरेराम बाजपेई उपस्थित थे .