मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

आगामी दस वर्ष


भविष्य का आकलन करना निःसंदेह सबसे कठिन कार्य है। लेकिन आज के विश्व  को देखते हुए आगामी दस वर्षों के स्वरूप के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है।  दस वर्ष बाद समूचे विश्व   का परिदृष्य बहुत बदल चुका होगा। जैसा कि पिछले 10 वर्षों में बदला है। आज से 10 वर्ष पहले मानवीय सम्बन्धों जो गरमाहट, समर्पण और अहलाद का भाव होता था, वैसा 10 वर्ष बाद दिखाई नहीं पड़ेगा। इसके लिए जहां समय अवधि जिम्मेदार होगी वहीं हमारी शिक्षा तथा मौजूदा नेताओं का चरित्र जिम्मेदार होगा। जिन राष्ट्रीय मूल्यों और उद्देष्यों को लेकर स्वतंत्रता आंदोलन लड़े गये , वे मूल्य धारासा यी होते हुए दिखाई पड़ेंगे। इसके लिए एक उदाहरण भाषाओं के संबंध में लेना पर्याप्त होगा। गांधीजी स्वराज्य में  अपनी भाषओं को बढ़ता हुआ देखना चाहते थे, क्योंकि उनके लिए आजादी और भाषाई स्वतंत्रता दोनों का एक ही मायने था। इसलिए वे कहते थे -’’ मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम भाषा को राष्ट्रीय और अपनी प्रांतीय भाषओं में उनका योग्य स्थान नहीं देंगे, तब तक स्वराज्य की सब बातें निरर्थक है।’’ (सन् 1918 में इन्दौर में दिए गए भाषण से)। गांधीजी की दृष्टि में प्रांतीय और राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को उचित स्थान न देने का मतलब गुलाम बने रहना जैसा ही था। आजादी के इन 60 वर्षों में भारत की अशक्षित जनता को न्याय अभी भी उनकी भाषओं में नहीं मिल रहा हैं। आगामी 10 वर्षों में संसार का भाषाई परिदृष्य कैसा होगा, इस पर यूनेस्को ने एक विस्तृत अध्ययन करवाया है इस अध्ययन में विश्व  की सभी भाषाओं के बारे में है ,भविष्य का आकलन किया गया है। भारत की भाषाओं के लिए खतरे की घण्टी बजते हुए सुनाई पड़ रही है। इस रिपोर्ट  में यह खुलासा किया गया है कि आगामी दशकों  में भारत के प्रांतों की भाषाएं समाप्त हो जायेगी। और वे सिमटकर स्थानीय बोलियों के रूप में बचेगी। ऐसा होना निःसंदेह दुःखद होगा, लेकिन ऐसा होना इसलिए तय है क्योंकि आजादी के बाद भारतीय भाषाओं के संरक्षण के उपाय नहीं किये गये। उन्हें रोजगारोन्मुखी नहीं बनाया गया। केवल ऊपरी तौर पर प्रदर्शन कर भाषाओं के संरक्षण का ढोल पीटा गया है। विश्व भाषा  के रूप में हिन्दी आगामी १० वर्षों  में स्थापित होते हुए दिखाई पड़ने लगेगी। अंग्रेजी भाषा का साम्राज्य कम होगा।  इस सम्बन्ध में डॉ रामविलास शर्मा की मान्यता भी विल्कुल ऐसी  ही है . वर्तमान में बाजार की भाषा के रूप में हिन्दी निरंतर ब़ढ़ रही है। भाषा का विकास व्यापार भी तय करता है। केवल साहित्य के सहारे भाषा का विकास नहीं होता। आज बाजारू हिन्दी को देखकर जो जन सोचते हैं कि भाषा के स्वरूप को बिगाड़ा जा रहा है ,वे देखेंगे कि आगामी 10 वर्षों में हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में स्थापित करने में वे ही बाजार और बाजारू हिन्दी सहायक बनेगी। हिन्दी मीडिया, अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग में और आगे बढ़ेगी। और अंग्रेजी के शब्द हिन्दी व्याकरण के साथ आकर उसी तरह हिन्दी भाषा का हिस्सा बन जायेंगे, जैसे अरबी, फारसी, पश्तो, फ्रेंच, इटेली और अंग्रेजी के शब्द पहले से घुले-मिले हैं .  
भारतीय समाज में तेजी से परिवर्तन आयेगा। सदियों से व्याप्त जातीय भेद-भाव और कुरीतियों से समाज मुक्त होगा। समाज में वैज्ञानिक सोच विस्तार पायेगा , महिलाओं की स्थिति पहले से बदलेगी। महिला सशक्तिकरण का कार्य सकारात्मक परिणाम दिखाएगा। शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ेगा, लेकिन समाज के सभी वर्गों तक    शिक्षा  नहीं पहुँच पायेगी, जिसके कारण एक बहुत बड़ा वर्ग अविकसित अवस्था में जिएगा। यह अशिक्षित  वर्ग और दयनीय स्थिति में जाएगा। आर्थिक विकास की यह अंधी दौड़ मनुष्य को स्वार्थी बनाएगी। वह अपने तईं और अपने परिवार तक सीमित बनेगा। सामाजिक चिंताओं और वैश्विक  सरोकारों से दूर अधिकांश जनसंख्या केवल अपने लिए जिएगी। शिक्षा  का उददेष्य मनुष्य को मनुष्यता सिखाने की बजाय केवल नोट कमाने का साधन बनाना भर बचेगा। एक ओर जातीय व्यवस्था कमजोर होगी तो दूसरी ओर धन के आधार पर वर्ग भेद पनपेगा, जो समाज में नये जातीय समीकरणों को पैदा करेगा।
आगामी 10 वर्षों में एक वैश्विक संस्कृति आकार लेने लगेगी। ग्लोबल बिलिज में अपनी-अपनी पहचान बनाए रखने के लिए भाषाएं और संस्कृतियां संघर्ष करते हुए दिखेगी। ऐसे समय में भारतीय संस्कृति अपने वैज्ञानिक तथ्यों पर खरी उतरकर नये स्वरूप में ढलकर विश्व संस्कृति का रूप ग्रहण करने लगेगी। ऐसा इस आधार पर कहा जा सकता है कि विश्व  की जो अति-प्राचीन संस्कृतियां हैं, उनमें केवल भारतीय संस्कृति अपने मूल के साथ अनेक आक्रमणों को झेलकर जीवित बची है। इसी आधार पर गांधीजी ने हिन्द स्वराज्य में लिखा था-’’मेरी मान्यता है कि भारत नें जो सभ्यता विकसित की है, वहां दुनिया में कोई नहीं पहुंच सकता, जो बीज हमारे पुरखों ने बोए है, उनकी बराबरी कर सकने योग्य कहीं कुछ देखने में नहीं आया। रोम मिट्टी में मिल गया, ग्रीस का नाम भर बचा, मिस्त्र का साम्राज्य चला गया, जापान पश्चिम  के षिकंजे में आ गया और चीन का कुछ कहा नहीं जा सकता। किन्तु इन भग्वावस्था में भी भारत की बुनियाद अभी शेष है।"" यही शेष बुनियाद विश्व  संस्कृति का आधार बनेगी। भारत की योग और आत्याध्मिक खोजें आगामी 10 वर्षों में विश्व मानव के लिए सहारा बनने लगेगी। भारतीय समाज पंडो, पुरोहितों, मौलवियों जैसे पाखंडियो  से मुक्ति पाते हुए प्रतीत होगा, जो सामाजिक समरसता और सामाजिक क्रांति के लिए एक महान कार्य होगा। आज की तुलना में मानव जीवन की गरिमा अधिक सुरक्षित होगी। भारत की वर्तमान पीढ़ी तथा आगामी 10 वर्षों में आने वाली पीढ़ी तकनीकी और प्रबंधन के क्षेत्रों में अपनी दक्षता का लोहा विश्व  में मनवाएगी। विश्व के लगभग सभी देशों  में दक्ष भारतीयों की उपस्थिति  भारतीय संस्कृति को स्थापित करने में मदद करेंगी। भारत के नये और पुराने ज्ञान-विज्ञान  मिलकर एक नये संसार  के निर्माण में सहायक होंगे। वर्तमान परिदृष्य से जिन्हें यह भय है कि कहीं भारत अपनी मूल पहचान न खो दे, वे 10 वर्ष बाद देखेंगे कि भारत अपनी अस्मिता के साथ समझौता किये बिना विश्व  को डिक्टेट करेगा, वह दिन हमारे उस ऋषि की परिकल्पना को पूरा करेगा, जिसमें उसने वसुधैव कुटुम्बकम् का स्वप्न देखा था।









शनिवार, 9 अप्रैल 2011

गांधी को खारिज करने वाले लोगों के लिए

अन्ना हजारे के आन्दोलन में शरीक हुए अभिनेता


अन्ना और अग्निवेश
 
कई वर्षों से यह मुहीम चलाई जा रही थी की गांधी जी इस २१वी  शदी  में प्रासंगिक नहीं बचे . लेकिन  भ्रष्टाचार के विरुद्ध  अन्ना हजारे के आन्दोलन ने यह  प्रमाडित कर दिया की २१वी सदी में अगर किसी कोई विचार सबसे अधिक प्रासंगीक है तो वे गांधी जी के विचार हैं . अन्ना हजारे का पूरा आन्दोलन शान्ति पूर्वक सम्पन्न हुआ . अपने उद्देश्य में सफल रहा . इस आन्दोलन ने कई सबालों के जबाब दिए और कई नये सबाल हमारे सामने खड़े भी किये.राष्ट्र की  चिंता में नई पीढी सामने आई .जिसके बारे में यह मान लिया गया है की इस पीढी के सरोकार राष्ट्र और समाज से कट गए हैं . इस बात में संदेह नहीं है की यह पीढी सब तरह से अलग है पर ऊपर से बहुत अलग थलग दीखते हुए भी इसकी अपनी समझ है ,अपनी प्रतिभा है . जहां -  जहां  पथ भ्रष्ट है वहां -वहां  इसका नहीं ,हमारा दोष है , शिक्षा का दोष है , केवल नई पीढी को दोषी नही ठहराया  जा सकता . अन्ना के आन्दोलन में नव युवक ,नव  युवतियां जुडीं . इस बात को स्वम अन्ना ने भी स्वीकार किया . सबाल ये है की ये लोग अन्ना  हजारे को नया गाधी कह  रहे थे . इस पीढी ने गांघी को नहीं देखा फिर भी इसके मन में कहीं न कहीं गांधी की एक  ऐसी छवि है जो भरोसा  दिलाती है की बिना रक्तपात किये हुए भी परिवर्तन  सम्भव है . और रक्तपात करके भी क्रान्ति सम्भव नहीं हो पाती . दोनॉ ही बातें हमारे सामने हैं .नक्सली आन्दोलन के चलते कितना खून  बह  चुका है  पर नातो सरकार झुकी और न ही  आन्दोलन आपनी किसी शक्ल में बदलता दिखाई     पड  रहा  है . परिस्थितियाँ अलग हो सकती है. पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता की जो अहिंसक मार्ग  गांधी ने हमें दिखाया है , सब तरह से वही ठीक है . जितनी विसंगतियां हमारे सामने हैं .उन्हें मिटाने के लिए अगर गोली का सहारा लिया जाए तो ,यह तो नहीं कहा जा सकता कि वे  विसंगति समाप्त होगी पर इतना तो कहा जा सकता है की अनेक विसंगतियाँ और जन्म ले लेंगी . असल में गांघी का रास्ता आदमी का आतंरिक परिवर्तन कर बदलाव पैदा करता है . क्रान्ति  का जो रास्ता मार्क्स ने हमें दिखाया वह समय के प्रवाह में पूरी तरह अनउपयुक्त सिद्ध हो चुका  है . किसी प्रजातांत्रिक व्यावस्था में खून खराबे की लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए . जहां -जहां सत्ता हिंसा के रास्ते से प्राप्त हुई  है वहाँ -वहां उसे बनाए रखने  के लिए और अधिक खून बहाने जरूरत हुई है . हिंसा की अंतिम  तस्वीर केवल हिंसा में ही बदली है . आज समय की जरूरत है की छोटे -छोटे जन आंदोलनों से हम अपने समय की समस्याओं को हल कर सकते हैं . यह अवश्य  ध्यान रखना होगा की कोई गांधी आकर हमारे समय को संबोधित करेगा , यह होने वाला नहीं है . अना हजारे का यह आन्दोलन अनेक तरह की आशाओं को जन्म दे गया , सूनी आँखों में सपने दिखने का अवसर  दिए  , अँधेरे समय को प्रकाश की एक किरण , और पूरे समाज को एक आलम्बन . भ्रंश से ही उम्मीद के अवसर पैदा होते हैं . यह पुस्तकों में  तो था इसे 9 अप्रैल 2011 को जंतर -मंतर नई दिल्ली में सामने  घटते हुए भी देखा है .


लोग जो परिवर्तन के पक्ष में हें
 

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

खुले तीसरी आँख

श्री चन्द्रसेन 'विराट ' हिंदी के स्थापित कवि हैं . अब तक उनकी 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं . खुले तीसरी आँख अभी हाल ही में प्रकाशित गजल संग्रह है . इस संग्रह में 79 गजलें संग्रहीत हैं , जैसा की इस पुस्तक के शीर्षक से ही अर्थ निकलता है कि कवि 'विराट' का मन आज की परिस्थतियों प्रसन्न नहीं है . वह इसमें व्याप्त स्थितियों से सामना करना चाहता है . पौराणिक संदर्भों के अनुसार तीसरा नेत्र भगवान शंकर के पास है .प्रलय और क्रोध के छनो में वे तीसरा नेत्र खोलते हैं .ऐसा ही  तीसरा नेत्र कवि के पास होता है , इसी के सहारे वह संसार के पूरे सच को देखता आया है . और इसी के सहारे वह अशुभ को जलाता है और पूरे मानवीय समाज के लिए मंगल कामनाएं करता है . कवि विराट चाहते है कि आज के समाज में जो विसंगतियाँ हैं उनके प्रति आक्रोश नहीं रहा , लोग फील गुड में डूबे हुए हैं उनका तीसरा नेत्र खुल  ही नहीं रहा है ,. कवि का मानस लिखता है   विवशता न्याय की देखो कई अपराध करके भी / दिया अपराधियों को यूं /  अभय देखा नही जाता ,' किसी पुस्तक की कसोटी यह भी होती है की रचना कार अपने समय के साथ कैसे जूझता है . कवि विराट के यह पुस्तक हमारे समय के  सबालों से रूबरू होती है . पाठाक के मन में बेचैनी पैदा कर उसे चिंतन के लिए मजबूर करती है =बहुत दुर्दांत निष्ठुर है समय देखा नहीं जाता / न देखा जा सके इतना , एनी देखा नहीं जाता .''
 इस समय में परिवर्तन होना चाहिए यह उदेदश्य है कवि  विराट का . वे मानते हैं कि असम्भव कुछ भी नहीं किवल इच्छा शक्ति चाहिए . यह पुस्तक पाठक  को विचार यात्रा पर ले जाने में पूरी तरह शक्षम है .

पुस्तक --- खुले तीसरी आँख
 कवि ------ चन्द्रसेन विराट
मूल्य -----रु 250
 प्रकाशन -- समान्तर पुब्लिकेशन
 तराना , उज्जैन , मध्य प्रदेश

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

समय से सम्वाद करती कविताएँ

तुम कितनी अच्छी हो
गोष्टी का चित्र
नारायण डॉ रवीन्द्रण पहलवान का नया कविता संग्रह 'तुम कितनी अच्छी हो ' अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है . इस संग्रह पर चर्चा   गोष्टी आयोजित हुई . चर्चाकार थे श्री हरे राम वाजपेई, श्री राजेन्द्र वामन काटदरे और राकेश शर्मा . डॉ पहलवान की कविताएँ आकार में  बहुत्त छोटी  हैं , किन्तु उनका अर्थ गम्भीर है . ये कविताएँ हमारे समय के साथ सम्वाद करती है . किसी रचना के मूल्याकन के समय यह तथ्य भी महत्व पूर्ण होता की उस रचनाकार ने अपने समय के साथ न्याय  किया या नहीं .डॉ पहलवान की यह कविता पढ़ें ----चिड़िया /तुम कभी मंदिर /पर बैठती हो/कभी मस्जिद  पर /  कभी गरजे पर / तुमने किसी / आराधना स्थल में / भेद नहीं किया / हमें अभी भी / ठीक से बैठना / सीखना बाकी है ,'' सामाजिक विसंगतियों पर अनेक कविताएँ इस संग्रह में हैं ,हिन्दी के सुधी पाठकों को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए .    पुस्तक -- तुम कितनी अच्छी हो , कवि डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान ,   मूल्य --रु 145 ,  प्रकाशक ---- रोटरी क्लब अपटाउन , इंदौर .
डॉ पहलवान व अन्य

बुधवार, 9 मार्च 2011

मोबाइल से कुछ सीखें

                   मोबाइल के घर
                                      जब भूल  से  भी आता है कोई 
                             प्रसन्नता से जग -- मग
                                हो उठती  है उसकी काया
                                   मेहमान के आने की खुशी
                              गा गा कर  सुनाता वह
                           महानगर के निवासी
                                    संभ्रांत कहे जाने वाले हम
                                                बुझे चहरे और सरगम हीन भाषा में
                                      अतिथि का करते हैं स्वागत 
                            क्या मोबाइल  से हम
                                          स्वागत संस्कार सीख सकते हैं

शनिवार, 5 मार्च 2011

भारतीय समाज के निर्माण में साहित्य की भूमिका ---------


 विचार रखते हुए आलोचक डॉ क्रष्णदत्त पालीवाल
 भारतीय समाज के निर्माण में साहित्य की सबसे बड़ी भूमिका है , हमारा समाज आज साहित्य से दूर भागता हुआ भले ही दिखाई पड़े परन्तु वह साहित्य के बिना अपना काम नहीं चला सकता . आज भी उसके सभी संस्कार साहित्य से ही पूरे होते हैं .स्वतंत्रता आन्दोलन  के समय राष्ट्रीय भावना जागृत करने में साहित्य की सबसे बड़ा योगदान है . साहित्य केवल भाषा और शब्दों का खेल नहीं है . साहित्य की परिध में किसी भी राष्ट्र के पेड़ , पहाड   , नदियाँ , जंगल ,पशु , चिड़िया , जड़ जंगम , चेतन      वनस्पतियाँ , खान  पान , वेश  भूषा आदि सभी आते हैं  . इन सबसे मिलकर जो चीज बनती है वह साहित्य की नजर में वह सब राष्ट्रीय  धरोहर है . एक युग चेतना सम्पन्न लेखक ,कवि , आलोचक . मानवीय समाज के साथ  साथ इन सबकी चिंता  भी करता है . हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय स्वर विषय पर डॉ क्रष्णदत्त  पालीवाल ने इंदौर में एक अविस्मरनीय भाषण दिया वे धर्मपाल शोध पीठ भोपाल दुआरा आयोजित एक प्रसंग पर इंदौर आये   थे . हरिश चन्द्र और उनके बाद के सभी युगों में हिन्दी के अनेक रचना कारों ने राष्ट्रीय चेतना को पुष्पित और पल्लवित करने वाला साहित्य रचा है . आज के साहित्यकार का यह कर्तव्य है की वह एस परम्परा का निर्वाह करता रहे . साहित्य के सामाजिक सरोंकारों पर डॉ पालीवाल ने अनेक प्रसंग श्रोताओं के सामने रखे .

बुधवार, 2 मार्च 2011

साहित्य वही है जो अपने समय से झूझता है


श्री सुखदेव सिंह कश्यप की पुस्तकों के विमोचन अवसर का द्रश्य

 साहित्य की सत्ता अपनी जगह स्वतंत्र है .साहित्य का सच राजसत्ता के सच से हमेशा अलग रहता है . समाज के सच के बहुत पास तक जाता साहित्य का सच, परन्तु वह समाज के सच के साथ हमेशा हाँ में हाँ मिलाये यह जरूरी नहीं . धर्म का सच साहित्य की द्रष्टि  में खंडित सच है इस लिए साहित्यकार धार्मिक होते हुए अपनी तरह विद्रोही भी होता है . जब कोई साहित्यकार धर्म के पास जाता है तो केवल साहित्यिक कारणों से ही जाता है न क़ि अंध विश्वासी होकर और न ही धर्म के सच को प्रचारित और प्रसारित करने के उदेश्य के साथ  . मूल अर्थों में वह आध्यात्मिक अधिक होता है , धार्मिक कम . धर्म , समाज और राज सत्ता के त्रिकोण के बीच साहित्य अपने सच के साथ उपस्थित रहता है . जनता का सच सुनकर  भगवान  राम   जो सत्तासीन हैं . अपनी पत्नी सीता का परित्याग किया  .इस घटना पर धर्म अपनी तरह रियक्ट होता है लेकिन एक साहित्यकार  जो वाल्मीक  के रूप में मौजूद है . वह जनता , राज सत्ता  और धर्म के सच की परवाह किए बिना सीता के साथ हुए अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है . और जो पुस्तक रचता है वह रामायण बन जाती है .  लगभग यही बात महाभारत में भी घटित होती है , वेद व्यास अपने समय के सारे सच को संजय की आँखों से देखते हैं और अंधी राज सत्ता को पूरा सच दिखाते हैं .जो न केवल महाभारतबल्कि हर युग के आदमी के लिए गीता के रूप में प्रेरणा  दाई बन जाता है  साहित्य मूल रूप से सत्ता  के विरुद्ध ही खड़ा होता है . इस लिए साहित्य के नाम पर जितने भी वाद चलाए गए बे सब इस लिए विफल हुए क्योंक़ि उनकी आधार  शिला  साहित्य की जमीन और जमीर पर आधारित नहीं थी ये आन्दोलन राजनीत से प्रेरित थे  बल्कि कह सकते हैं के राजनीत की जलवायु वाले पौधे को साहित्य की जमीन पर रोप कर फल प्राप्त करने की कोशिश  की जा रही थी इसलिए इनका यही परिणाम होना था . साहित्य और एक साहित्य कार को हमेशा अपने निज धर्म की तलाश में रहना चाहिए जिसकी चाह मुक्तिबोध के शब्दों में इस तरह है

   रचनाकार वही ठीक है जो समाज में व्याप्त विद्रूपताओं के विरुद्ध लिखता है और अपने आचरण से समाज को प्रभावित भी करता है . [कल १ मार्च २०११ को इंदौर के वरिष्ट रचनाकार श्री सुखदेव सिंह कश्यप की दो पुस्तकों  'चर्चा आज की ' और प्रजातंत्र के आईने में कविता ' का विमोचन हुआ , श्री सुख देव सिंह कश्यप निरंतर लेखन  करने वाले लिखकों में हैं . सरल और समयानुकूल लेखन उनकी विशेषता  है . इन पुस्तकों में हमारा समय बोलता है    विमोचन अवसर पर मैंने जो जो विचार व्यक्त किये हैं उन्हीं के कुछ  कुछ अंश ऊपर दिए  गये  हैं  ]इस अवसर पर श्री सत्य नारायण सत्तन ,चन्द्र सेन विराट,सूर्य कान्त नागर,जस्टिस वीरेन्द्र दत्त ज्ञानी,सुरेश सेठ ,हरेराम बाजपेई उपस्थित थे .

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

खग मृग बसत अरोग बन

५ जनवरी का दिन . तापमान ६ डिग्री के आस पास .सडक के किनारे बने झोपड़े .इन में रहने वाले गरीबों के परिवार .  गरीबी भी ऐसी जिसे देख किसी संवेदन शील का मन रो पड़े . सडक जो लखनऊ और इलाहाबाद को जोडती है . इस पर तेज गति से गुजरती कारें . कारों  में लगे ऐ . सी. उस पर भी ठण्ड से  जान बचाते लोग . इन गरीबों के छोटे - छोटे बच्चे .नंगे बदन रहने को मजबूर . लेकिन फिर  भी खुश . दीनता का कोई भाव नहीं , लगता है गरीबी या अमीरी इक अहसास भी है जो सिर पर चढ़ कर बोलता है . अभाव का यदि बोध न हो तब वह लगता ही नहीं . गरीबों के इन बच्चों को देख अमीरों औरतें सोचती कि भगवान इन पर कितना दयालु है कि इतनी सर्दी में भी देखो बच्चे आराम से खेल कूद रहें है और हमारे बच्चे सारे प्रवंध  के बाद भी बीमार ही बने रहते . मैं विचार में  पड गया कि भगवान् इन पर दयालु होता तो विचारे अभावों में क्यों  जीते ? मुझे रहीम दास का दोहा याद आया '' खग मृग बसत अरोग वन / हरी अनाथ के नाथ ''. ये लोग खग मृग तो अवस्य ही नहीं हैं पर अनाथ जरूर हैं .पर प्रजातंत्र में ये प्रश्न चिन्ह हैं कि जहां प्रगति का ग्राफ रोज  -रोज ऊपर उठत़ा हुआ दिखया जाता हो क्या ये वास्तविकता मुह चिढाते हुयी दिखाई नहीं पडती  .अगर यह हमारा समाज है तो इनकी इस दशा में हमारी भी भूमिका है .

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

हिंदी साहित्य में इन दिनों

हिन्दी साहित्य में इन दिनों
 सक्रीय है चार जन
 पहले हैं फतवाचंद
 दुसरे  हैं संपूर्णानंद  नन्द
 तीसरे हैं आसी राम
 चौथे हैं घासी राम
 ये चारो महाजन
 पांचवें आम जन को जगाते हैं
 उसे गरियाते; रिरयाते
 अपनी वेदना सुनाते हैं
 पांचवां जन ; इन से पीछा छुड़ा
 वह स्वंम में लीन है
 उसके लिए साहित्य सब
 भैंस के आगे वाली बीन है
 इक छटा जन  और है
 जो आलोचक कलाता है
 इन चारो की हल चल पर
 वह जोर से गुर्राता  है
 डपटता और ललकारता है
 अनुसाशन बनाए रखने के नाम पर
 अपना लंगोट इन पर घुमाता है
 इस पूरे प्रहसन में सातवां एक और है
 जो चारो महाजनों का बाप है
 इनके परिश्रम की मलाई
 ठाठ से  खाता है
 पक्का घंधेवाज
 यह सातवाँ प्रकाशक कहलाता है

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

भारतीय मनीषा के अमर गायक कवि श्री नरेश मेहता

१५ फरवरी , सन १९२२ को श्री नरेश मेहता का जन्म मध्य प्रदेश के शाजापुर [मालवा ] में हुआ था . श्री नरेश मेहता की शिक्षा बनारस में हुई . लेखन की  शुरूआत एक कवि के रूप में हुई . बाद में लेखन की दूसरी  विधाओं में आपका मत्वपूर्ण लेखन हुआ था . वे हिन्दी के पांचवें रचनाकार है जिन्हें ज्ञान पीठ पुरस्कार  मिला था . नरेश जी का गद्य दार्शनिक प्रयोगों का सबसे बड़ा उदाहरण है . उनकी दार्शनिकता का आधार भारतीय ऋषियों जैसा है . नरेश मेहता  ने भाषा के स्तर पर अनेक प्रयोग किये थे . उनकी भाषा का स्तर छायावादी कवियों से भिन्न है . उनकी कविता की के स्तर पर कोई दूसरा कवि खडा नहीं होता है . नरेश मेहता को समझने में जितनी सहायता उनकी रचनाएं करती उससे अधिक साहयता महमा मेहता दुवारा लिखित पुस्तक ' उत्सव पुरुष नरेश मेहता ' और नरेश मेहता की जीवनी  ' हम अनिकेतन ' करती हैं . उनके  व्यक्तित्व और क्रातिव को समझने के लिए ये पुस्तकें जरूर पढ़ी जानी चाहिए .नरेश मेहता ने हिन्दी की सेवा के लिए पहले सेना की नौकरी छोडी बाद में आकाशवाणी में प्रोग्राम अधिकारी  का पद छोड़ा . [ यह विवरण उनकी पुस्तक चैत्या के प्रष्ट पर है जो भारतीय ज्ञान पीठ ने प्रकाशित की है ] अनुमान लगाया जासकता है साहित्य के लिए उनका समर्पण किस स्तरका था .श्री नरेश मेहता को याद करने के लिए प्रेम चंद श्रजन पीठ उज्जैन के निदेशक डॉ जगदीश तोमर ने एक आयोजन किया था . इस अवसर पर कवि नरेश जी के लेखन  पर विद्वानों ने प्रकाश डाला .
विचार रखते हुए राकेश  शर्मा

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

कामायनी के भाषीय औदात्य को समझाती पुस्तक

डॉ सुरुचि मिश्रा की पुस्तक '' कामायनी का भाषायी औदात्य '' प़र  चर्चा गोष्ठी आयोजित हुई . राकेश शर्मा ने  पुस्तक की भूमिका पढ़ कर चर्चा के लिए प्रष्ठ भूमि तैयार की .डॉ  पुरुषोत्तम दुबे  नें पुस्तक प़र विचार प्रकट करते हुए कहा की लेखिका नें कामायनी में प्रयुक्त शब्दावली की गहरी मीमांशा की है . यह पुस्तक कामायनी के अर्थ समझने में पाठक की बहुत मदद करती है . श्री जय शंकर प्रसाद ने पूरे  भारतीय चिंतन कामायनी में प्रस्तुत किया है . यह चिंतन  वैदिक  शब्दावली भी साथ लेकर चला है .वैदिक शब्दावली आज के पाठक की समझ दूर होती जा रही है . ऐसी स्थिति में यह पुस्तक प्रयोजनीय मालूम पडती है . लेखिका नें बहुत श्रम पूर्वकं इसे लिखा है . डॉ ओम  ठाकुर  नें कहा की कामायनी आधुनिक समय का सबसे आधिक महत्व पूर्ण महाकाव्य है .ऐसे महाकाव्य को समझानें की दिशा में यह पुस्तक एक उचित प्रयास है . डॉ जवाहर चौधरी नें कहा नें इस पुस्तक मूल्य एक आम पाठक की बजाय एक एकेडमिक और  शोधार्थी के लिए ज्यादा है . वरिष्ठ कवि श्री क्रष्ण कान्त निलोसे ने कहा कि कविता करते समय कवी को विराट में प्रवेश करना होता है . यह एक समाधि की अवस्था होती है . उस अवस्था में शब्द स्वं ही कवी तक पहुंच जाते हैं . यही सब प्रसाद के साथ हुआ है . जिसका परीक्षण इस पुस्तक में लेखिका नें किया है . ख्यात गजलकार  श्री चन्द्र भान भारदुआज ने कहा कि रचना प्रकिया से गुजरते समय कवि की जो चेतना है वही उसका आध्यात्म होता है . श्री गोपाल माहेश्वरी ने कहा एक रचनाकार का चिंतन जिस स्तर का होगा उसके शब्दों का चयन भी वैसा ही होगा . इनके अलावा पुस्तक चर्चा में श्री रविश त्यागी , श्री मती रंजना फ्तेपुरकर ने भी भाग लिया . आभार आशु कवि प्रदीप नवीन नें माना .

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

सुपारी का पेड़

इस निर्जन वन में  खड़े 
लगते हो एक तपस्वी मौन
जो खडा युगों से तप  लीन
दुबली   देह हठ  धर्म निभाती
 गर्मी वर्षा झंझावात सभी सह जाती
अडिग ,अकंप , निडर व्रत धारी
 यह प्रकट़ा है फल में आकर
है पवित्र आधार तभी तो
 चढ हो देव विधानो  में
देते संदेश कठोर
क्रषकाय भले हो
प़र  है पुरुशारथ निराला

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

बुनियादी सवालों से झूझता एक आलोचक


 ,डॉ विजय बहादुर  सिंह के साथ डॉ रवीन्द्र पहलवान
 पिछले दिनों ख्यात आलोचक  डॉ विजय बहादुर सिंह  इंदौर आये थे . प्रसंग था बाबा नागर्जुन के अवदान को याद करना . शहर के रचनाकारों के लिए उनका आना कई  अर्थों में विशेष था . बात चीत के अनेक प्रसंगों में हमारे समय के सवालों प़र चर्चा हुई , हिन्दी आलोचना आज अराजकता के मुहाने प़र खडी दिखाई पडती है . एक पूरी पीढी  जिसे परम्परा से काटा गया गया था . आज अपने को प्रवंचित सी पा रही है . जो सवाल डॉ  रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक ''मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य'' में सन १९८४ में उठाए थे और कहा था कि प्रगतिशीलता के मायने यह नहीं कि पूरी भारतीय  परम्परा की  अनदेखी की जाए  .डॉ शर्मा लिखते हैं ' अनेक लेखक  ऐसे हैं कि वे इकदम नये सिरे से एक नये साहित्य को जन्म देने जा रहे हैं . इसलिए वे पिछले  साहित्य की तरफ अव्ज्या , उदासीनता और agyyan का रवैया अपनाते हैं . वे हिन्दी साहित्य की जातीय विशेषताओं को नहीं पहचान पाए और इसी लिए उन्हें विकसित नहीं कर पाए ''[ मार्क्स और प्रगतिशील साहित्य , ६३]   जो अवसाद जमा है उसे तोड़ा जाए और एक समता मूलक समाज की रचना की जाए . साहित्य में जो धारा वाल्मीक,  व्यास , कालिदास , तुलसीदास , निराला से होती हुई हमारे पास तक आई है . वह अप्रासंगिक कैसे हो सकती है ? उस समय प्रगतिशील आन्दोलन के  अगुआकारों ने इन स्थापनाओं को खारिज कर दिया था .आज वे ही लोग उन्हीं चीजों का समर्थन करते घूम रहे हैं . जैसे  कभी अगेय को कवि न   मानने वाले आलोचक आज कल अगेय की कविता का गुड गान करते हुए नहीं थकते . डॉ विजय बहादुर  सिंह ने ऐसे ही अनेक  ज्वलंत  सबालों पर चिंतन  प्रस्तुत कर विमर्श के लिए भाव भूमि तैयार की  , कुछ लोगों का यह भी कहना था कि स्वयम  डॉ विजय बहादुर भी मार्क्स वाद से जुड़े रहे हैं फिर आज किस आधार प़र ये प्रश्न उठा रहे है . विकास की अपनी एक यात्रा है एक विचारक शुरूआत में जिन आस्थाओं  से अपनी यात्रा  शुरू करता है, कुछ समय  बाद उनके विरुद्ध हो जाता है , यह उसकी विकास यात्रा के प्रमाण हैं , मूल सबाल यह है कि हम जड़ वस्तुओं  की भाँती चिपके न रहें . मानव  जीवन परिवर्तन  का ही एक नाम है . कोई भी विचार धारा हर युग में प्रासंगिक बनी नहीं रह सकती और  किसी भी विचार  का कभी भी अंत नहीं  होता  .
      डॉ विजय बाहादुर सिंह ने अनेक सुलगते सवालों पर प्रकाश  डाला . उन्होंने अपने एक धन्टे और तीस मिनट के अत्यंत प्रभावी भाषन में कवि नागार्जुन के साहितिय्क अवदान प़र अविस्मरनीय जानकारियाँ दीँ, चीन के हमले के समय जब सभी बाम पंथी लेखक चुप  थे  . तब केवल बाबा नागर्जुन ही जिन्होंने अपनी रचनाओं में चीन का विरोध किया था . पंडित नेहरू  के साथ बाबा नागार्जुन  के वैचारिक विरोध को रेखांकित करते हुए उन्होंने ये पंक्तियाँ पढ़ी ' जो तुम रह जाते दस साल और , झुकती स्वराज की डाल और'' बाबा नागार्जुन की ये पक्तियायाँ सुन  कर  डॉ रामविलास शर्मा की पुस्तक '' गांधी ,आम्बेडकर , लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं ' का  स्मरण हो आया .

               इंदौर प्रवास के दौरान शहर के अनेक रचना कार डॉ विजय बहादुर सिंह से मिलने होटल सुन्दर में आते रहे इनमे प्रमुख रूप से दादा क्रष्ण कान्त निलोसे ,  व्यंगकार डॉ जवाहर चौधरी , वरिष्ट कवि श्री चन्द्रसेन विराट , श्री हरेराम बाजपेयी ,आशु कवि प्रदीप नवीन , दोहाकार प्रभु त्रिवेदी  ,ऐतिहासिक उपन्यास लेखक डॉ शरद पगारे , कवि डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान , आदि  शामिल हैं

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

साहित्य की आँख से इतिहास को देखती पुस्तक '' पाटलि पुत्र की साम्रागी ''





भारत में इतिहास एक अलग विषय के रूप में कभी नहीं रहा . भारतीय धार्मिक पुस्तकों  में विज्ञान , इतिहास और दर्शन सभी कुछ एक साथ है . शोध कर्ताओं का कर्तव्य है कि वे अनुसन्धान कर इनके रूपों को अलग -अलग स्थापित करें . हमारें इतिहास के वारे में अंग्रेजों ने सिखा दिया कि भारत का कोई इतिहास नहीं है और हमारे अग्रेज इतिहासकारो ने मान लिया कि अंग्रेज सच कह रहे हैं परन्तु यह सच नहीं है .यह विवाद पुराना है . इंदौर के डॉ शरद पगारे इतिहास के माने हुए लेखक और प्रोफेसर हैं . पिछले दिनों  उनकी पुस्तक ''पाटलि पुत्र की साम्रागी प़र चर्चा आयोजित की गयी . यह आयोजन पाठाक मंच इंदौर ने आयोजित किया था .इस अवसर प़र पुस्तक के लेखक डॉ शरद पगारे स्वं उपस्थित थे . चर्चा में भाग लेने आये विद्वानों के प्रश्नों के उत्तर लेखक ने दिए . पुस्तक पर  युवा कवि प्रदीप मिश्र ने पर्चा पढ़ा . चर्चा में डॉ जवार चौधरी , डॉ रामकिसन सोमानी , डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान , ललित भाटी, डॉ शशि निगम , रंजना फ्तेपुरकर , प्रदीप नवीन  ,श्याम दांगी , अजय दांगी ,वंदना जोशी  ,नेहा जोशी , रजनी रमण शर्मा , अजय शुक्ला [कानपूर ] शुभाष चन्द्र निगम नें भाग लिया , विद्वान लेखकों ने यह माना के इतिहास प़र निरंतर चर्चा होनी चाहिए . चर्चाये और बहसें कभी अंतिम नहीं होती परन्तु इन से कोई रास्ता निकलता है  जो हमें किसी निष्कर्ष तक पहुंचाता है . जो समाज चर्चाओं और बहसों से दूर भागता है उसके विकास के रास्ते बंद हो जाते हैं , डॉ शरद पगारे की पुस्तक में जहां एक ओर इतिहास की पुख्ता जान कारी देती है वहीं दूसरी ओर विमर्श के लिए भाव भूमि पैदा करती है . लेखक की यह सबसे बड़ी सफलता है .  जिन स्थानों प़र इतिहास मौन है उन्हें लेखक नें कल्पना के सहारे भरा है . ऐतिहासिक लेखन बिना इतिहास के गेप भरे पूरा नहीं हो सकता यही काम इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने किया है .


रविवार, 6 फ़रवरी 2011

निराला की चिंताओं को समझे बिना , सब अधूरा है

बसंत पंचमी को महाकवि निराला का जन्म दिन मनाया जाता है . यहबात सही कि उनका जन्म बसंत पंचमी को नहीं    हुआ  था . वे जिस दिन जन्में थे उस दिन बसंत पंचमी नहीं थी . बसंत पंचमी मा सरस्वती का जन्म दिन माना जाता है . निराला अपने को सरस्वती का पुत्र मानते थे .वे  थे भी . . वे कहते हैं कि ''मैं  हूँ बसंत का अग्र दूत / ब्राम्ह्ड समाज में जियों अछूत''. हिन्दी साहित्य और भषा में एक साथ इतने प्रयोग  करने वाले वे अकेले रचना कार हैं. हिन्दी का विकास  उनकी पहली चिंता थी . सन १९३५ में सुधा पत्रिका की संपादकी में निराला लिखते हैं ---'' हिन्दी साहित्यकारों ने हिन्दी के पीछे तो अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया है ,प़र हिन्दी भाषियों ने उनकी तरफ वैसा ध्यान नहीं दिया -- सतांश भी नहीं . वे सहितियिक इस समय जिस कठिनता का सामना कर रहे हैं , उसे देख कर किसी भी सहिरदय की आँखों में आंसू आ जाएँ . चुपचाप वे आर्थिक कष्ट को सहन करते हुए साहित्य का निर्माद  करते जा रहे हैं बदले में उन्हें  अनाधिकारी साहित्यको से लांछन और असंस्कृत जनता से अनादर प्राप्त हो रहा है . [ सुधा जून ३५ संपादित टिप्पड़ी  २ ]
              निराला की चिताएं आज के रचना कारों के सामने भी मौजूद हैं . हिन्दी में एक समय आया जब रचनाकारों  को प्रगतिवाद , जनवाद , कलावाद के नाम प़र बाँट कर देखा गया . परिणाम  यह हुआ कि हिन्दी  प्रदेश की  जनता
में यह सन्देश गया कि साहित्य अब केवल राजनीत का विषय है ,समाज से उसका कोई सरोकार नहीं है  .
     डॉ रामविलास शर्मा ने इस पूरे परिद्रश्य प़र प्रकाश डालते हुए लिखा ;; सन १८५७ के स्वाधीनता - संग्राम के बाद अंग्रेजों ने हर संभव उपाय हिन्दी भाषी प्रदेश की सामाजिक - सांस्कृतिक प्रगति में बाधा डाली . औधोगिक विकास में पीछे , निरक्षरता में आगे , छोटे बड़े प्रान्तों में विभाजित , तालुकेदारों , जमीदारों का गढ़ , भाषा का अकेला भाषा क्षेत्र जिसकी बोल चाल की भाषा एक लेकिन साहित्य भषाएँ दो , भारत अकेला भाषा क्षेत्र  जिसमें इक मुस्लिम विस्वविध्यालय , एक हिन्दू विश्वविध्यालय , भारत का वह भाषाखेत्र जिसमें सबसे ज्यादा बोलियाँ हैं , जिसमें जात्तीय चेतना का सबसे अभाव है , जिसपर  अंग्रेजों का प्रभुत्व सबसे ज्यादा है  ऐसा है हमारा हिन्दी भाषी क्षेत्र . अंग्रेजों के जाने के बाद उसकी इस  स्थिति में मौलिक परिवर्तन नहींहुआ. 
         हिन्दी प्रदेश की भाषाई हालत समझे बिना देश में भषा का आन्दोलन खडा नहीं किया जा सकता . आज सबसे बड़ी जरूरत हिन्दी को बचाने और उसे प्रसारित करनी की है . महाकवि निराला के जन्म दिन प़र हमें हिदी के विकास विकास का संकल्प लेना चाहिए . यही उनके प्रति सच्ची श्रधान्जली होगी केवल भाषण दे कर  बात समाप्त  करने वालों का अनुकरण बेकार  है .  

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

अवसाद के सरोवर में फेका गया पत्थर होती है कविता


कार्यक्रम में उपस्थित लोग


संवोधित करते हुए  राकेश शर्मा
 कविता जीवन द्रष्टि देती है . पाठक का आत्म विस्तार करती है . उसे निज हटा कर पर से जोडती है .आज का खाता पीता समाज यदि आत्महत्त्यों के आकडे बढ़ा रहा है तो यह सोचना जरूरी हो गया है कि आखिर  ऐसा  क्यों हो रहा है . एक अभाव ग्रसित आदमी यदि आत्म हत्या जैसा पाप करे तो कोई कारण समझ में आता है लेकिन अच्छे  शहर  में निवास करने वाली    महिला जो एक डॉ  भी हो यदि आत्म ह्त्या करे तो विचार करना होगा . पिछले दिनों इंदौर में एक महिला डॉ ने जहर खा कर आत्म हत्या की अपने साथ ही उसने अपने चौदह वर्षीय पुत्र को भी जहर खिलाया . कारण केवल यह हो कि बेटे के नंबर कम आये थे , क्या यह भी कोई कारण हो सकता है ,  आत्म ह्त्या का ? मेरे विचार से विल्कुल नहीं . असल में जैसे .. जैसे यह समाज पुस्तकों के पाठन -  पाठन  से दूर होता जाएगा वैसे ही वैसे यह आत्म केन्द्रित होगा . आत्म केन्द्रित आदमी में जीवन के झंझावत झेलने की ताकत नहीं बचती . अध्ययन आदमी के मानस  का विस्तार करता है . अध्ययन एक आदमी को सभी जड़ और चेतन वस्तुओं के साथ बात करने की द्रष्टि पैदा करता है . आखिर कविता की उत्पत्ति एक पक्षी की पुकार से ही तो हुई है . इसका यह साफ़ मतलब है की केवल आदमी ही नही यह संसार  उन सभी प्रादियों के लिए  भी है ,जिहें भगवान ने रचा है . कितना अच्छा हो कि हम अपने समाज को वापस किताबों की ओर ले कर चल पायें . हमारे विकास के माप दंड किताबों की संख्या पर केन्द्रित हो कि इस वर्ष कितनी किताबें पढ़ी  गयी . आदमी के विकास का पैमाना अर्थ कैसे हो सकता है ? अर्थ यदि आदमी के विकास का  पैमाना होता तो भगवान् महावीर , और बुद्ध को घर छोड़ने की जारूत न होती . आदमी के विकास का रास्ता उसके ही अंदर से पैदा होता है इस रास्ते  को पैदा करने  में साहित्य की भूमिका  बहुत बड़ी है ,आज के आदमी को ज्ञान की ज़रूरत है केवल सूचनाओं की नहीं  . हमारा पूरा जोर सूचना देने पर है ज्ञान के विकास पर नहीं . इसके परिणाम हमारे सामने आने शुरू हो गए हैं ,अभी भी वक्त है विचाए लें . हिन्दी में विपुल साहित्य रचा जा रहा परन्तु आम आदमी का ध्यान उस पर नहीं है . समाज का पेट खाली है एक भूखा समाज साहित्य नहीं पढ़ता  , साहित्य की भूख मानसिक है , उदर की नहीं  . जब भारत के समाज का पेट भरा हुआ था तब वेद जैसी पुस्तकें हमने रचीं और उनका इस समाज ने  अनुशीलन भी किया.  पेट की भूख का कोई अंत नहीं है , इसके लिए जीवन में संतोष पैदा करने की जरूरत होती है . [इस अवसर प़र डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान , , कवित्री रश्मी रमानी , अनिल भोसले , संदीप रसिनकर, श्रीति  रासिनकर और श्री मती निशा पहलवान , चन्द्र शेखर राव ,  महेंद्र जेन , डॉ  मन्मथ  पाटनी ,शरद तिवारी उपस्थित थे .]  [ यह एक भाषण का अंश है जो कल दि. ४ .२ २०११ को श्री जवाहर लाल गर्ग की पुस्तक 'सरोवर के कमल ' के विमोचन अवसर पर दिया गया था . आयोजन रोटरी क्लब इंदौर , अप टाउन ने किया था  ].

रविवार, 30 जनवरी 2011

लघु कथा संग्रह ''अँधेरे के खिलाफ'' का विमोचन

इंदौर  शहर  कहानीकारों की द्रष्टि से बहुत भरा पूरा है , नई कहानी की द्रष्टी से श्री प्रभु जोशी का नाम सबसे पहले आता है . श्री सूर्यकांत नागर , डॉ सतीस दुबे , डॉ विलास गुप्ते , श्री चेतन्य त्रिवेदी ,उन्नी ,डॉ योगेन्द्र नाथ शुक्ल और राजेन्द्र वामन काटदरे आदि कहानीकार हैं  पिछले दिनों  श्री राजेन्द्र  वामन काटदरे की लघु कथों के संग्रह ' अँधेरे के खिलाफ का विमोचन हुआ , असल में यह समय लघु कथाओं कि द्रष्टि से महत्वपूर्ण है . आज जब आदमी के पास समय का आभाव है . वह कम समय में साहित्य की जानकारी चाहता है ऐसे में उसकी मांग लघु कहानियां ही पूरी करसकती हैं . श्री राजेन्द्र वामन काटदरे की कहानियाँहामारे समय का दस्तावेज हैं . आज से दो दशक बाद यदि कोई हमारे समय के आदमी के जीवन के बारे में जानना चाहेगा तब ये कहानियाँ  उसकी बहुत मदद करेंगी . पुस्तक की भूमिका श्री सूर्यकांत नागर नें लिखी है , इस भूमिका में उन्होंने लघु कहानी लेखन की पूरी पड़ताल की है . समय के साथ संवाद करती इन कहानियों का स्वागत किया जाना चाहिए . श्री राजेन्द्र वामन काटदरे ने अपने सहज सुभाव की अनुरूप ही इन कहानियों का ताना बाना बुना है . सीधी सरल भाषा में लिखी गईं ये कहानियां पाठक को सोचने के लिए विवस  करती हैं . किसी लेखक का उद्देश्य भी यही होता है कि वह अपने पाठक से कहे कि जो कुछ तुम्हारे आस पास घट रहा है उसमें तुम्हारी भी भूमिका है  , एक लघु कथा लेखक के रूप में श्री राजेन्द्र वामां कट दरे सफल लेखक हैं .  विमोचन अवसर पर डॉ सरोज कुमार .और श्री श्री राम जोग भी उपस्थित थे , कवि श्री चन्द्र सेन विराट . लघु कथाकार श्री प्रताप सिंह सोडी ; गजल कार श्री चन्द्र भान भार्दुअज  , श्री हरे राम बाजपे . श्री प्रदीप नवीन समेत कई रचनाकार उपस्थित थे .    
बाई  ओर से श्री चन्द्र भान भारद्वाज , चन्द्र सेन विराट , अंसारी जी एवं प्रताप सिंह सोढ़ी
 पुस्तक ;;;;;; अँधेरे के खिलाफ 
 प्रकाशक ;;;;;;पड़ाव प्रकाशन , h  थ्री ,
                    उद्व मेहता परिसर
                     नेहरु नगर भोपाल  ४६२००८
 मूल्य ;;;;;;;; rs  १५०

बुधवार, 26 जनवरी 2011

साहित्य , समाज और परिवर्तन की प्रक्रिया ----- अज्ञेय

विगत दिनों अज्ञेय के निवंधों की पुस्तक  साहित्य , संस्कृति और परिवर्तन की प्रक्रिया पर चर्चा आयोजित की गयी . यह पुस्तक सुविखायात आलोचक डॉ कर्षणदत्त पालीवाल ने संपादित की है . मध्य प्रदेश साहित्य आकादमी दुआरा संचालित   पाठक   मंच इंदौर , के तत्वाधान में यह आयूजन सम्प्पन हुआ . हमारे  समाज को समझने  के वैचारिक धरातल पुस्तक में दिए गये हैं . अज्ञेय  के चिंतन को समझने का अवसर पुस्तक देती है . जो लोग अज्ञेय को कला वादी , अर्थ वादी घोषित करते रहे हैं उन्हीं यह पुस्तक जरूर पढनी चाहिए .  आलोचक , चिन्तक , लेखक  विचारक और कवि अज्ञेय के अनेक रूपों को देखने का अवसर पाठक को मिलता है . पुस्तक चचा में डॉ     ओऊम ठाकुर , डॉ पुरूसोतम दुवे , , चन्द्र सेन विराट , चैतन्य  त्रिवेदी , हरे राम वाजपेयी ,प्रदीप नवीन डॉ नियत स्प्रे  , चन्द्र किरण गुप्ता , मोहन रावल, डॉ शशि निगम , शुभाष निगम और  राकेश शर्मा ने भाग  लिया  . सभी ने एक मत से यह स्वीकार किया कि अज्ञेय  भारतीय मनीषा के अमर गायक कवि हैं , उन्हें पशिम का अगेंट कहनें वालों को अज्ञेय के साहित्य को पूर्वाग्रहों से  दूर हट कर विचार करना चाहए .

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

विनाश या विकास की ओर बढ़ते कदम

 भौतिक विकास प्रक्रति का विरोधी होता है . विकास की अंधी दौड़ ने प्रक्रति के सामने अस्तित्व का संकट खडा कर दिया है . आज के आदमी को विकास भी चाहिए और प्रक्रति भी . उसकी दोनों  चाहतें कैसे पूरी हों यह चिंतन का विषय है . चिंता यह भी है कि अगर प्रक्रति के लिए इसी तरह खतरे बड़ते गए तो प्रक्रति कुमार कहा जाने वाला यह मानव कैसे बच पायेगा ?मनुष्य का जन्म प्रक्रति की गोद मैं ही हुआ है इसी लिए वह आज भी शांति की तलाश में वनों ; पहाड़ों . नदियों और समुद्र के पास जाता रहता है . यह उसकी मजबूरी भी है ओर स्वाभाविक जरूरत भी . लेकिन कल्पना कीजिए कि अगर विकास के नाम पर इसी तरह विनास का पहिया  घूमता  रहा तो आने वाली पीढियां किस नदी के तट पर बैठने जायेंगी ? कौन से पहाड़ उसे अपनें पास बुलाकर उसकी पीड़ा हारेंगे ? सभी नदियों का जीवन संकट में है , पहाड़ आदमी के बढ़ते लालच से भयभीत हैं . एक नदी केवल पानी का श्रोत भर ही नही होती वह सस्क्र्ती की संवाहिका भी होती है .विश्व की सभी संस्क्र्तियों  का जन्म नदियों के तटों पर ही हुआ है .आज ये नदिया भयभीत हैं . इन सब के अलावा जंगल जो हमारे अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं , निरंतर कम होते जा रहे हैं . नदी पर्वत ,जंगल  पहाड़ ये निर्जीव इकायाँ नहीं है . ये जीवंत हैं और सच तो यह है कि यदि ये हैं तो हमारा असितित्व  है . ज़रा सोचिये कि अगर ये सब ना होते तो महावीर , गौतम बुद्ध. राम आदि सब को करुना का पाठ कौन पढाता ? इस चित्र में आप देख रहें कि एक पहाड़ को बहुत बे रहमी से नष्ट किया जा रहा है . यह चित्र गोवाहाटी और सिलोंग के बीच काटे जा रहे पहाड़ का है ,इसने सदियों तक अपने ऊपर जंगल उगाकर मनुष्य की सभी जरूरतों को पूरा किया है और आज आनाथ की तरह हो गया है . आदमी  ......पहाड़ , नदियाँ और जंगल नष्ट तो कर सकता है पर याद रहे आदमी पहाड़ पैदा नहीं कर सकता वह नदी भी नहीं वहा सकता और जंगल उगाने के लिए आदमी के पास जमीन भी नहीं है . यह सोचनें का समय है कि हम जा जा कहाँ    रहे   हैं  ........विकास की तरफ या विनास की ओर ?    

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

आत्म चिंतन का दिन भी है , हिन्दी दिवस

आज हिन्दी दिवस मनाते हुए ऐसा क्यों लगता है कि हम केवल एक औपचारिकता निभा रहे हैं। क्यों इसके प्रति कोई आत्मिक भाव बोध नहीं जागता ? क्यों ऐसा नहीं लगता कि भाषा हमारे लिए बहुत महत्व की चीज है ? ऐसा इसलिए नहीं लगता क्योंकि आज का भारत वह भारत नहीं है जिसका स्वप्न गाँधी, लोहिया जैसे अन्य अनेक महान लोगों ने देखा था। भाषा को देष की सांस्कृतिक अस्मिता मानने वाले इन लोगों के प्रयासों का प्रतिफल है यह दिन। इन लोगों ने सोचा था कि हम भी आगामी पीढ़ियां इस प्राचीन देष की अद्वितीय सांस्कृतिक धरोहर को अपनी भाषाओं के सहारे जीवित रखेंगी। लेकिन पीढ़ियां ऐसा नहीं कर सकी। और अब आज का भारत गाँधी, आम्बेडकर और लोहिया के स्वप्नों वाला भारत नहीं रहा। आज का भारत अमरीकीय दृष्टिपथ पर आकार ले रहा भारत है। इसीलिए अपनी भाषा की स्थापना का दिवस मनाते हुए मन में कोई स्वाभाविक राग नहीं दिखाई पड़ता। किसी भाषा के प्रति अनुराग एक दिन में पैदा नहीं किया जा सकता। अनुराग और प्रेम के लिए पूरी जिन्दगी चाहिए। आजादी के इन 61 वर्षों में हमने अपनी पीढ़ियों के मनों में अपनी मातृभाषाओं के प्रति कोई लगाव पैदा नहीं किया। इन भाषाओं को उनके कैरियर के अनुरूप नहीं ढाला जिसका दुष्परिणाम हमारे सामने है। ’’लगे रहो मुन्नाभाई’’ फिल्म का एक डाइलाॅग याद करें जिसमें अभिनेता संजय दत्त कहता है कि ’’हृदय परिवर्तन’’ जैसा शब्द बोलने से ऐसा लगता है कि मानो सुनने वाले का हार्ट फेल हो गया है। देष में यह स्थिति अकस्मात उभरी है। इसके पीछे एक लम्बा षड़यंत्र है। अपनी भाषा के शब्दों के प्रति लगाव क्यों होना चाहिए इसकी जरूरत पर प्रकाष डालते हुए सन् 1967 में डाॅ. राममनोहर लोहिया ने कहा था -’’षब्द आसमान से नहीं टपकता, शब्द जुड़ा हुआ रहता है, देष की मिट्टी के साथ, देष के इतिहास के साथ, कथाओं और किंवदन्तिओं के साथ। जैसे गांगा शब्द कोई सुनता है भारतवर्ष में, तो गंगा का जो मतलब होता है वह न जाने कितना, ढेर सा चित्र दिमाग में एक साथ आ जाता है(पुस्तक समता और सम्पन्नता-पृष्ठ 90)। एक शब्द की मृत्यु का मतलब है एक समूची व्यवस्था का मर जाना। एक आदमी की मृत्यु के रिक्त स्थान को दूसरे आदमी से भर पाना संभव है पर एक शब्द की मृत्यु की भरपाई असंभव हैं क्या यह दुःखद नहीं है कि हमारी भाषा के हजारों शब्दों की रोज हत्या हो रही है और सप्रयास की जा रही है, पर इस सबसे हम उसकी तरह बेखबर है जैसे अन्धे आगे किसी हत्या हो और उसे पता ही न चले। हमारे अन्धत्व के मोटे तौर पर दो कारण हैं। एक तो यह कि हमें भ्रम है कि हमारा जो आर्थिक विकास हुआ और आगे भी होगा। दूसरा यह कि अंग्रेजी भाषा के प्रति लगाव ने हमें संज्ञाहीन बना दिया है। जिसके कारण उसके आर्तनाद के स्वर हमारे कानों को सुनाई ही नहीं पड़ते। गुलाम भारत में भारतीय भाषाओं के सामने इतना बड़ा संकट न था जितना बड़ा संकट आजादी के इन 61 वर्षों में पैदा हुआ है या किया गया है। हमारा जो आर्थिक विकास हुआ है वह हमारे यहां मौजूद प्राकृतिक संसाधनों, मेहनतकष किसानांे, मजदूरों और हमारे पुरखों द्वारा दिए गए संस्कारों का सुफल है। इसको गइराई से जांचे बिना नहीं समझा जा सकता। केवल वैष्विक बिलिज, आर्थिक उदारीकरण के कारण ही ये परिवर्तन नहीं आए है। लेकिन ये बातें ऐसे अर्थ मंत्री की समझ में नहीं आएगी जो कहते हैं कि ’भारत कभी सोने की चिड़िया नहीं रहा।’ लेकिन यह बात देष का अपढ़ आदमी भी जानता है कि डाका उसी पर पड़ता है जिसके पास सम्पत्ति होती है। और भारत के सदियों लूट जाने की गाथा सबको विदित है अलावा कुछ तथाकथित आर्थिक चिंतकों के।
आज के युवक की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अंधी आर्थिक व्यवस्था ने उसे धृतराष्ट्र बना दिया है। उसे केवल वहीं सुनाई पड़ता है जो संजय रूपी बाजार का विज्ञापन उसे सुनाते हैं। आर्थिक मोह ने उसकी संज्ञा को इतनी गहराई से जकड़ा है कि उसके विवके ने काम करना बन्द कर दिया है। अब वह उसे बाजार, रोबोट की तरह भी संचालित कर रहा है। विवके के बिना चिन्तन नहीं होता और बिना चिन्तन के जीवन और जगत की पर्तें नहीं खोली जा सकती है और माया का संबंध जीवन और जगत दोनों से है। यह ठीक है कि साक्षरता का प्रतिषत बढ़ा है लेकिन यह भी ठीक है कि इन साक्षरों में ऐसे लोगों का प्रतिषत भी बढ़ा है जिनकी निगाह में जीवन का मतलब केवल सुख के संसाधनांे की भीड़ जमा करना भर ही जीवन है। देष, संस्कृति, भाषा आदि से उनके सरोकार बस उतने ही हैं जो उनके जीवन के खांचे में फिट बैठते हो। आखिर ऐसी मनोदषा वाले नागरिकों के सहारे आप अपनी प्राचीन धरोहर को सुरक्षित रखने का स्वप्न कैसे साकार कर सकते है ? ऐसे में अगर हमारी भाषाओं पर संकट है तो हुआ करे। इन भाषओं का साहित्य मर रहा है, तो मरे हमारी युवा पीढ़ी हर हाल में फीलगुड कर रही है। यह व्यवस्था आज की उपज नहीं है। इसकी जड़ें बहुत दूर तक जाती हैं। इसे पैदा करने में अनेक ऐसे नाम कटघरे में खड़े हरे जते हैं जिन्हें भ्रमवष हम भारत को उद्धारक मान बैठे हैं। अगर सूझबूझ से काम लिया गया होता तो देष के लिए एक नारा उछाल दिया गया है कि ’’हिन्दी विष्व भाषा बनने जा रही है।’’ मित्रों भ्रम में रहने की जरूरत नहीं है। यह नारा छद्म भरा एक वाक्य है। जो ऊपर से आकर्षक लग रहा है पर है यह सफेद झूठ। मैं पूछता हूं कि विष्व भाषा बन रही हिन्दी के साहित्य को जानने और समझने वालों की संख्या निरन्तर घट क्यों रही है ? कितने सुषिक्षित नवयुवक हैं जो हमारे कवियों और लेखकों को पढ़कर समझने का दावा कर रहे हैं। कितने ऐसे नवयुवक हैं जो आर्थिक चकाचैंध को छोड़ भाषा के द्वारा अपना कैरियर बनाने के लिए उद्यत है ? क्या विष्व भाषा बन रही हिन्दी के संबंध में ये प्रष्न महत्व नहीं रखते। यहां हिन्दी प्रदेष के छा़त्रों का यह हाल है  िकवे हमारे रचनाकारों के नाम तक नहीं जानते। हां, अपवाद आप छोड़ दीजिए, मैं समूची व्यवस्था की बात कर रहा हूँ। इन पंक्तियों के लेखक से एक पढ़े-लिखे युवा ने प्रष्न किया था कि महादेवी वर्मा पुरूष है या स्त्री ? क्या अब भी आपको लगता है कि इन्हीं नवयुवकों के सहारे आप भाषायी विजय करने जा रहे हैं। हिन्दी में विज्ञापन इसलिए दिए जा रहे हैं कि विज्ञापनदाता कंपनियों का स्वार्थ इसी के द्वारा पूरा होता है। इन विज्ञापनों को देखकर यह विचार करना गलत है कि हिन्दी का विकास हो रहा है। अभी भारत सरकार के प्रतिष्ठानों में ही शत-प्रतिषत कार्य हिन्दी में नहीं हो रहा है। इस कार्य के लिए संवैधानिक दृष्टि से 15 वर्षों की अवधि निर्धारित की गयी थी। जहां तक बाजार की भाषा का सवाल है, इसके बारे में यह जानना भी ठीक है कि बाबर लिखित बाबरनामा में कहा गया है कि वहां के बाजार में हिन्दी भी एक भाषा थी पर क्या इससे हिन्दी वहां स्थापित हो गयी ?
गांधीजी ने सन् 1935 में इन्दौर में भाषण देते हुए कहा था -’’इस मौके पर अपने दुःख की भी कहानी कह दूं। हिन्दी भाषा राष्ट्रभाषा बने या न बने मैं उसे छोड़ नहीं सकता। तुलसीदास का पुजारी होने के कारण हिन्दी पर मेरा मोह रहेगा ही। लेकिन हिन्दी बोलने वालों में रवीन्द्रनाथ कहां हैं ? प्रफुल्लचन्द राय कहां हैं ? जगदीष बोस कहा हैं ? ऐसे और भी नाम मैं बता सकता हूं। मैं जानता हूं कि मेरे अथवा मेरे जैसे हजारों की इच्छामात्र से ऐसे व्यक्ति थोड़े ही पैदा होने वाले है। लेकिन जिस भाषा को राष्ट्रभाषा बनना है उसमें ऐसे महान व्यक्तियों के होने की आषा रखी ही जायेगी। (गांधी, आम्बेडकर और भारतीय इतिहास की समस्याएं पृष्ठ-6)। इन पंक्तियों में गांधी के दुःख की जो कहानी है वह सन् 2008 तक कितनी और अधिक बड़ी हुई है। पाठक विचार कर सकते हैं। समर्पित हिन्दी सेवियों और सरकार के बीच कोई समन्वय अभी तक नहीं बना।
आम्बेडकर देष के जिस वर्ग की लड़ाई लड़ रहे थे उसका विकास भाषा के प्रष्न से जुड़ा है। विकास की सीढ़ियां जिस अंग्रेजी के सहारे चढ़ी जाती है उससे देष के गरीबों का संबंध नहीं जुड़ पाया। परिणाम यह है कि आरक्षित पदों को भरने के लिए जब परीक्षाएँ ली जाती हैं तो सुपात्र नहीं मिलते और पद वर्षों-वर्षों रिक्त रहते हैं। ऐसे में आरक्षण की मूल भावना की हत्या हो जाती है। ये लोग सुपात्र नहीं थे, यह बात नहीं है बल्कि अंग्रेजी के माध्यम से सुपात्र ढूंढने की व्यवस्था गलत है। जनतंत्र में सब एक व्यवस्था का दूसरे से कैसे अविभाज्य संबंध है इस पर प्रकाष डालते हुए आम्बेडकर ने लिखा था -’’जहां सामाजिक और आर्थिक जनतंत्र न हो, वहां राजनैतिक तंत्र सफल नहीं हो सकता। सामाजिक और आर्थिक जनतंत्र के वे रग और रेषे हैं, जिनसे राजनीतिक लोकतंत्र निर्मित होता है। ये रग रेषे जितने पुष्ट होते हैं, उतना ही शरीर पुष्ट होता है। लोकतंत्र समानता का दूसरा नाम है। संसदीय लोकतंत्र ने स्वतंत्रता के लिए उत्साह दिखाया। लेकिन समानता के प्रष्न की ओर उसने आँख उठाकर भी नहीं देखा। स्वतंत्रता समानता को निगल गयी।’’ (गांधी, आम्बेडकर और भारतीय इतिहास की समस्याएं पृष्ठ-602)। आम्बेडकर जी सामाजिक समानता का जो ऐतिहासिक प्रष्न उठाते है उसका संबंध भाषा से सीधे-सीधे जुड़ता है। सन् 1965 में उत्तर प्रदेष के विधायकों को संबोधित करते हुए हुए डाॅ. राममनोहर लोहिया ने कहा था -’’अंगे्रजी कस हिन्दी से आज भी झगड़ा है। इसलिए नहीं कि उससे हमारे सम्मान को या इज्जत को धक्का पहुंचता है। यह परदेषी भाषा है। लेकिन उससे और बड़ा सबब दूसरा यह है कि यह भाषा पहले की और भाषाओं की तरह हमारे देष को बिल्कुल दो हिस्सों में बांट देती है। एक तो अभिजात और दूसरा साधारण जनता में इतना फर्क हो जाता है। जनतंत्र असंभव है, ऐसी स्थिति में जनतंत्र कहना तो अपने-आपको फुसलावा देना हैं इस बात को छोड़ दीजिए। भाषा की ओर से भी जनतंत्र हमारे देष में हैं नहीं। यह भी अपनी भाषा के बिना संभव नहीं हो सकता है हिन्दुस्तान में। लेकिन इससे भी बड़ा मेरा सबब है और वह यह कि हिन्दुस्तान की गरीबी और उसका अज्ञान है। इन दोनों का शायद सबसे बड़ा कारण अंगे्रजी भाषा का चलन है।’’ (समता और सम्पन्नता पृष्ठ-80) 
हिन्दी, संस्कृति, साहित्य, कला पर चिन्तन मनन करने और विचारों को प्रकट करने वाले सुधीजनों की कमी नहीं है पर जैसे नक्कारखाने में तूती (तुरही) की आवाज सुनी नहीं जा रही है। वैसे ही इनके चिन्तन को दबा दिया जाता है। लेकिन कोई न सुने इससे बात का महत्व कम नहीं होता। जब घना अंधेरा तो छोटा दीप भी महत्ववान होता है। इस 21 वीं सदी में विराट आर्थिक उदारीकरण और विष्वग्राम के भीषड़ नगाड़े की ध्वनि के बीच हमें अपने आवाज को उठाने से कौन रोक सकता है। कौन जाने एक दिन ऐसा आए, जब हमारी भाषाएँ अपना वर्चस्व पुनः स्थापित कर पाएं।

शनिवार, 11 सितंबर 2010

बाजार और धर्म

 बाजार में सब बिक रहा है धर्म इससे अछूता नहीं है . आज गणेश चतुर्थी का दिन और बाजार   में भगवान् गणेश की मूर्तियाँ बड़े पैमाने पर बिक रही हैं . श्रधा का दोहन बाजार कैसे करता यह विचारणीय है . गणेश को बुध्धि  का देवता मना गया है . पूर्वजों ने गणेश का जो स्वरूप गढ़ा है वह अद्भुत है . सभी देवताओं  के अपने -अपने वाहन हैं . गणेश का वाहन चूहा बताया गया है . सभी देवताओं में गणेश का बजन ही सबसे अधिक होना चाहिए फिर उनका वाहन इतना कमजोर  क्यों ? असल में ज्ञान का कोई बजन नहीं होता और ज्ञान तब तक बेकार है जब तक वह तर्क पर आरूड न हो . वह ज्ञान किस काम का जो समय के अनकूल तर्क पैदा न कर सके . हामारे पुरखों नें यही सन्देश भगवान गणेश के माध्यम से देने की सोची होगी . आज इस कम्प्यूटर के युग में भी देखें कि बिना माउस के कम्प्यूटर  किसी काम का नहीं  होता यानी कि ज्ञान को तर्क चाहिए ही .चूहा ही एक ऐसा प्राणी है जो रात और दिन काट पीट करता रहता है . कहते हैं कि एक बार एक शेर  जाल में फंस गया था . बलशाली शेर को जाल से मुक्त करने का काम  चूहे ने किया था , शेर के पास बल था किन्तु तर्क चूहे के पास था और बल को मुक्ति तर्क ने दी . जरूरत है कि आज के बाजार रूपी शेर से तर्क के सहारे मुक्ति पाने की .न कि आँखें बंद कर अपनी  गरदन  बाजार रूपी शेर के सामने कर देनी की . प्रार्थना के जो उपाय पुरखों ने दिए उन पर चिंतन करने के वजाय लोग आँखें बंद किये हुए हैं इसका लाभ बाजार को मिल रहा है  भगवान् गणेश का जन्म  दिन के मध्य भाग में माना गया है . राम भी दिन के बारह  बजे ही प्रकट हुए थे और भगवान् क्रष्ण रात बारह बजे . भगवान् ईसा मशीह का जन्म भी रात बारह बजे माना जाता है .इनके अलावा और भी अनेक शक्तियाँ हैं जो बारह बजे अवतरित  हैं .यह अलग से एक  चिंतन का विषय है लिकिन हमारे पुरखों भगवान गणेश के वारे में जो कुछ कहा है उस दर्शन की व्याख्या की जानी चाहए न कि आँखें मूँद कर काम करते रहें . भगवान गणेश को  मोदक बहुत प्रिय हैं .इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि जिस पिता का पुत्र हमेशा मोदक ही खाता रहे वह पिता, गणेश भगवान् के पिता शंकर की तरह लंगोटी ही लगाए गा .  इसलिए जो स्थूल दिख रहा उससे अधिक उसके पीछे  छिपा हुआ अर्थ  है जरूरत उसे पकड़ने की है . भगवान गणेश हमें ऐसा ज्ञान दें जो आज के बाजार रूपी दैत्य से लड़ सके . आज के दिन  हम यही प्रार्थना करते हैं .

रविवार, 5 सितंबर 2010

आगामी दस वर्ष और भारत का भविष्य

   भविष्य का आकलन करना निःसंदेह सबसे कठिन कार्य है। लेकिन आज के भारत की नब्ज देखते हुए आगामी दस वर्षों के स्वरूप  के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। आज पन्द्रह अगस्त के दिन सन् 2010 में आगामी दस वर्ष बाद के भारत का आकलन किया जा सकता है। दस वर्ष बाद अर्थात् सन् 2020 में जब हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे होंगे, वह आजादी की 70 वीं वर्षगांठ होगी। आज की तरह ही उस दिन भी हम अपने अमर शहीदों को याद करेंगे और राष्ट्रध्वज को सलामी देंगे। लेकिन इस पूरे कार्य में समर्पण की भावना में  कमी आने की संभावना अधिक है तथा एक कृत्रिमता आने की संभावना ज्यादा है। दस वर्ष बाद समूचे विष्व का परिदृष्य बहुत बदल चुका होगा। जैसा कि पिछले 10 वर्षों में बदला है। आज से 10 वर्ष पहले स्वतंत्रता दिवस और अन्य राष्ट्रीय दिवसों को मनाते हुए जो गरमाहट, समर्पण और अहलाद तथा राष्ट्रीयपन का भाव होता था, वैसा 10 वर्ष बाद दिखाई नहीं पड़ेगा। इसके लिए जहां समय अवधि जिम्मेदार होगी वहीं हमारी षिक्षा तथा मौजूदा नेताओं का चरित्र जिम्मेदार होगा। जिन राष्ट्रीय मूल्यों और उद्देष्यों को लेकर स्वतंत्रता आंदोलन लड़ा गया था, वे मूल्य धाराषायी होते हुए दिखाई पड़ेंगे। क्योंकि आजादी के तुरंत बाद यह राष्ट्र उन मूल्यों की रक्षा के लिए तत्पर दिखाई नहीं पड़ा। इसके लिए एक उदाहरण भाषाओं के संबंध में लेना पर्याप्त होगा। गांधीजी स्वराज्य में या आजाद भारत में अपनी भाषओं को बढ़ता हुआ देखना चाहते थे, क्योंकि उनके लिए आजादी और भाषाई स्वतंत्रता दोनों का एक ही मायने था। इसलिए वे कहते थे -’’ मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम भाषा को राष्ट्रीय और अपनी प्रांतीय भाषओं में उनका योग्य स्थान नहीं देंगे, तब तक स्वराज्य की सब बातें निरर्थक है।’’ (सन् 1918 में इन्दौर में दिए गए भाषण से)। गांधीजी की दृष्टि में प्रांतीय और राष्ट्रभाषा के रूप  में हिन्दी को उचित स्थान न देने का मतलब गुलाम बने रहना जैसा ही था। आजादी के इन 63 वर्षों में भारत की अषिक्षित जनता को न्याय अभी भी उनकी भाषओं में नहीं मिल रहा हैं। आगामी 2040 वर्षों में संसार का भाषाई परिदृष्य कैसा होगा, इस पर यूनेस्को ने एक विस्तृत अध्ययन करवाया है इस अध्ययन में विष्व की सभी भाषाओं के बारे में भविष्य का आकलन किया गया है। भारत की भाषाओं के लिए खतरे की घण्टी बजते हुए सुनाई पड़ रही है। इस रिपोट्र में यह खुलासा किया गया है कि आगामी दशकों में भारत के प्रांतों की भाषाएं समाप्त हो जायेगी। और वे सिमटकर स्थानीय बोलियों के रूप में बचेगी। ऐसा होना निःसंदेह दुःखद होगा, लेकिन ऐसा होना इसलिए तय है क्योंकि आजादी के बाद भारतीय भाषाओं के संरक्षण के उपाय नहीं किये गये। उन्हें रोजगारोन्मुखी नहीं बनाया गया। केवल ऊपरी तौर पर प्रदर्षन कर भाषाओं के संरक्षण का ढोल पीटा गया है। विष्वभाषा के रूप में हिन्दी आगामी 10 वर्षों में स्थापित होते हुए दिखाई पड़ने लगेगी। अंग्रेजी भाषा का साम्राज्य कम होगा। वर्तमान में बाजार की भाषा के रूप में हिन्दी निरंतर ब़ढ़ रही है। भाषा का विकास व्यापार भी तय करता है। केवल साहित्य के सहारे भाषा का विकास नहीं होता। आज बाजारू हिन्दी को देखकर जो जन सोचते हैं कि भाषा के स्वरूप को बिगाड़ा जा रहा है वे देखेंगे कि आगामी 10 वर्षों में हिन्दी को विष्वभाषा के रूप में स्थापित करने में वे ही बाजार और बाजारू हिन्दी सहायक बनेगी। हिन्दी मीडिया, अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग में और आगे बढ़ेगी। और अंग्रेजी के शब्द हिन्दी व्याकरण के साथ आकर उसी तरह हिन्दी भाषा का हिस्सा बन जायेंगे, जैसे अरबी, फारसी, पश्तो, फ्रेंच, इटेली और अंग्रेजी के शब्द पहले से घुले-मिले हंै। 
     भारतीय समाज में तेजी से परिवर्तन आयेगा। सदियों से व्याप्त जातीय भेद-भाव और कुरीतियों से समाज मुक्त होगा। समाज में वैज्ञानिक सोच विस्तार पायेगा . महिलाओं की स्थिति पहले से बदलेगी। महिला सषक्तिकरण का कार्य सकारात्मक परिणाम दिखाएगा। षिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ेगा, लेकिन समाज के सभी वर्गों तक षिक्षा नहीं पहुॅच पायेगी, जिसके कारण एक बहुत बड़ा वर्ग अविकसित अवस्था में जिएगा। यह अषिक्षित वर्ग और दयनीय स्थिति में जाएगा। आर्थिक विकास की यह अंधी दौड़ मनुष्य को स्वार्थी बनाएगी। वह अपने तई और अपने परिवार तक सीमित बनेगा। सामाजिक चिंताओं और राष्ट्रीय सरोकारों से दूर अधिकांष जनसंख्या केवल अपने लिए जिएगी। षिक्षा का उददेष्य मनुष्य को मनुष्यता सिखाने की बजाय केवल नोट कमाने का साधन बनाना भर बचेगा। एक ओर जातीय व्यवस्था कमजोर होगी तो दूसरी ओर धन के आधार पर वर्ग भेद पनपेगा, जो समाज में नये जातीय समीकरणों को पैदा करेगा।
  आगामी 10 वर्षों में एक वैष्विक संस्कृति और एक विष्व भाषा आकार लेने लगेगी। ग्लोबल बिलिज में अपनी-अपनी पहचान बनाए रखने के लिए भाषाएं और संस्कृतियां संघर्ष करते हुए दिखेगी। ऐसे समय में भारतीय संस्कृति अपने वैज्ञानिक तथ्यों पर खरी उतरकर नये स्वरूप में ढलकर विष्व संस्कृति का रूप ग्रहण करने लगेगी। ऐसा इस आधार पर कहा जा सकता है कि विष्व की जो अति-प्राचीन संस्कृतियां हैं, उनमें केवल भारतीय संस्कृति अपने मूल के साथ अनेक आक्रमणों को झेलकर जीवित बची है। इसी आधार पर गांधीजी ने हिन्द स्वराज्य में लिखा था-’’मेरी मान्यता है कि भारत नें जो सभ्यता विकसित की है, वहां दुनिया में कोई नहीं पहुंच सकता, जो बीज हमारे पुरखों ने बोए है, उनकी बराबरी कर सकने योग्य कहीं कुछ देखने मंे नहीं आया। रोम मिट्टी में मिल गया, ग्रीस का नाम भर बचा, मिस्त्र का साम्राज्य चला गया, जापान पष्चिम के शिकंजे में  आ गया और चीन का कुछ कहा नहीं जा सकता। किन्तु इन भग्वावस्था में भी भारत की बुनियाद अभी शेष है। यही शेष बुनियाद विष्व संस्कृति का आधार बनेगी। भारत की योग और आत्याध्मिक खोजें आगामी 10 वर्षों में विष्व मानव के लिए सहारा बनने लगेगी। भारतीय समाज पंडो, पुरोहितों, मौलवियों जैसे पाखंडियोें से मुक्ति पाते हुए प्रतीत होगा, जो सामाजिक समरसता और सामाजिक क्रांति के लिए एक महान कार्य होगा। आज की तुलना में मानव जीवन की गरिमा अधिक सुरक्षित होगी। भारत की वर्तमान पीढ़ी तथा आगामी 10 वर्षों में आने वाली पीढ़ी तकनीकी और प्रबंधन के क्षेत्रों में अपनी दक्षता का लोहा विष्व में मनवाएगी। विष्व के लगभग सभी देषों में दक्ष भारतीयों की उपस्थिति विष्व भर में भारतीय संस्कृति को स्थापित करने में मदद करेंगी। भारत के नये और पुराने ज्ञान-विाान मिलकर एक नये विष्व के निर्माण में सहायक होंगे। वर्तमान परिदृष्य से जिन्हें यह भय है कि कहीं भारत अपनी मूल पहचान न खो दे, वे 10 वर्ष बाद देखेंगे कि भारत अपनी अस्मिता के साथ समझौता किये बिना विष्व को डिक्टेट करेगा, वह दिन हमारे उस ऋषि की परिकल्पना को पूरा करेगा, जिसमें उसने वसुधैव कुटुम्बकम् का स्वप्न देखा था।

रविवार, 15 अगस्त 2010

आम आदमी का देश प्रेम

  

आज स्वतंत्रता दिवस  क६३वी वर्ष गांठ का अवसर  है . कर्मचारी  राज्य बीमा निगम  नंदा नगर इंदौर  ( मध्य  प्रदेश ) में एक  आयोजन  है इसमें शामिल होने का मुझे भी सौभाग्य मिला .  और सब कुछ तो  ठीक वैसा ही  था जैसा सब जगह होता है . राष्ट्र प्रेम के गीत गाये जा रहे थे . अभी कार्यक्रम चल ही रहा था की अस्पताल की इंचार्ज डॉ चित्रा मेहता के पास सन्देश आता है कि कार्यक्रम के बाद वे वार्ड न. ७ में आयें. ऐसी मरीजों की इच्छा    है . एक डॉ को मरीज का बुलाना स्वाभाविक बात है , पर आज के बुलावे में रिश्ता डॉ और मरीज तक सीमित न था बल्कि सम्बन्ध देश प्रेम से था .  ख़ैर डॉ चित्रा मेहता अपने साथी  उप चिकत्सा अधीकक्षक डॉ नरेंद्र  कुमार, डॉ उत्तमचन्द्र जैन , डॉ  मनोज विडवान  , डॉ पंकज  जैन , डॉ . सारदा , श्री के . सी झा . वित्त अधिकारी  और अन्य लोगों की पूरी टीम के साथ वार्ड न . ७ में प्रवेश करती हैं पर आज  वार्ड रोज जैसा न था .मरीजों की कराहों की जगह भारत माँ की जयकार थी . वार्ड में भर्ती मजदूर  गंभीर अस्थि रोग से जूझ रहे हैं .    पर आज उनके चहरे देश प्रेम से  चमक रहे थे मानो कह रहे हों की देश पर प्राण न्योछावर   करने वालों से मेरी पीड़ा बहुत  कम है. वे  बाहर निकल कर स्वतंत्रता दिवस न मना सकते थे .सो  उनके देश प्रेम  ने उन्हें वहीं ऐसा कुछ करने के लिए कहा . पूरा वार्ड ऐसे सजाया गया मानों  जन्म दिन हो . एक छोटी सी टेविल पर  फूलों से सजा  कागज से बना तिरंगा और हाँ एक फ़ैली हुई कटोरी में दीप जलाने  का प्रबंध भी  . यह सब प्रबंध किया था मोहम्मद अब्दुल   रूफ ने, इनका  भाई इकवाल कूल्हे  की टूटी हड्डी  के कारण अस्पताल में भर्ती है . भाई ,अब्दुल  रूफ ने पूरे उत्साह से  प्रवंध किया . राष्ट्र गान के बाद मुहम्मद रूफ ने अपने हाथो से सभी को मिठाई  बांटी .मुहम्मद रूफ खुद मिठाई  न ले रहे थे  क्योंकि यह रमजान  का महीना है . जितनी देर वार्ड में यह वातावरण था. किसी भी मरीज कि चहरे पर कोई शिकायत का भाव न था . सब भारत  माँ की जयकार में  डूबे रहे  .यह देख विश्वास गहरा हुआ कि देश पर प्राण अर्पित करने का ज़ज्बा कभी कम न होगा . कम से कम उस वर्ग में जिसके बल बूते पर हम बिना संदेह का भरोसा कर सकते हैं . कई बड़े -बड़ों से बहुत बड़ा है इन मजदूरों का देश प्रेम.. कम से कम उन से जो देश की सेवा करने के बहाने भ्रष्ट आचरण में डूबे हैं . [ आप सब को स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई ]